श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/४-७ स्फुरित होकर ब्रजसुन्दरियोंके आनुगत्यमें श्रीकृष्ण-सेवा करनेके निमित्त सभीकी लालसा जागृत करें ॥४॥ अवतारकाल वर्णन :- पूर्ण भगवान् कृष्ण व्रजेन्द्रकुमार। गोलोके ब्रजेर सह नित्य विहार ॥५॥ ब्रह्मार एकदिने तिँहो एकबार। अवतीर्ण हञा करेन प्रकट विहार ॥६॥ अनुवाद-व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही पूर्ण भगवान् हैं। व्रजधाम समन्वित गोलोकमें वे नित्य विहार करते हैं। ब्रह्माके एक दिनमें वे एक बार इस जगत्में अवतीर्ण होकर प्रकट-लीला करते हैं॥५-६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिन व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णको पिछले अध्यायमें पूर्ण भगवान् कहकर प्रमाणित किया गया है, वे गोकुलके वैभवरूप गोलोकमें व्रजरस (दास्य-सख्य-वात्सल्य-शृङ्गाररस) के सभी उपकरणों (धाम-परिकरादि) के साथ नित्य विहार करते हैं। इसीका नाम अप्रकट-विहार है, क्योंकि यह बद्धजीवोंको दृष्टिगोचर नहीं है। जगत्में अवतीर्ण होकर प्रतिकल्पमें अर्थात् ब्रह्माके एक-एक दिनमें वे एक बार प्रकट-विहार करते हैं॥५-६॥ अमृतानुकणिका-स्वयं भगवान् श्रीगोविन्दका सर्वोपरि-स्थित, नित्यानन्द-लीलापूर्ण परमधाम गोलोक है। इस स्वधाम गोलोकमें वे स्वयंरूप, स्वयंप्रकाश और परिकरोंके साथ सतत विविध प्रेमलीलामें मग्न होकर परमानन्दसे विराज करते हैं। इस गोलोकके अन्य नाम-श्वेतद्वीप, श्रीवृन्दावन, श्रीगोकुल और व्रजधाम हैं (आदि ५/१७)। गोलोक और गोकुलमें कोई भी भेद नहीं है। श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिसे गोलोक जब प्रपञ्चमें प्रकटित होता है, तब उसे ही भौम-गोकुलादि कहते हैं। प्रपञ्चमें प्रकाशित होनेपर भी गोकुल चिन्मयधामरूपमें वर्तमान होता है। वह किसी प्रकारसे जड़-देश-कालादिके द्वारा कुण्ठित होकर अपने वैकुण्ठ-तत्त्व-रूप अविकुण्ठ अवस्थासे च्युत नहीं होता। किन्तु मायिक जीव जड़ेन्द्रियोंसे उसके उस अविकुण्ठ स्वरूपका दर्शन नहीं कर पाते, उसको भी सदोष प्रपञ्चके समान ही देखते हैं। इसलिये प्रपञ्चागत गोकुल-नायक श्रीकृष्णको भी वे साधारण मनुष्य रूपमें देखते हैं। किन्तु विज्ञानयुक्त बुद्धिमान् महात्मा दोनोंको एक समान प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं। श्रील रूपगोस्वामीने लघुभागवतामृतम्में कहा है- “यत्त गोलोकनाम स्यात् तच्च गोकुल-वैभवम्।” अर्थात् गोलोक गोकुलका वैभव है। किन्तु ऐसा होनेपर भी, बद्धजीवके पक्षमें भौम-गोकुलकी उपयोगिता ही अधिक है। उसका प्रभाव साक्षात् सम्बन्धसे हमारे जैसे जीवोंके ऊपर अधिक कार्यकारी है। भूलोक-अवतरित गोकुल-वृन्दावन ही हमारा परम आशा-स्थल है॥५-६॥ सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि-चारियुग जानि। सेइ चारियुगे दिव्य एकयुग मानि ॥७॥ ९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत