श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/७-१० ] एकात्तर चतुर्युगे एक मन्वन्तर। चौद्द मन्वन्तर ब्रह्मार दिवस भितर ॥८॥ अनुवाद—सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, ये चार युग होते हैं। ये चारों युग मिलकर एक दिव्य-युग कहलाते हैं। इकहत्तर चतुर्युगोंका एक मन्वन्तर होता है और ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं॥७-८॥ अनुभाष्य—[“चतुर्युगमुदाहृतम्। सूर्याब्दसंख्यया द्वित्रिसागरैरयुताहतैः। युगानां सप्ततिः सैका मन्वन्तरमिहोच्यते॥ ससन्ध्यस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाचतुर्दश। कृतप्रमाणः कल्पादौ सन्धिः पञ्चदशः स्मृतः॥ इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः। कल्पो ब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती॥”—सूर्यासिद्धान्ते मध्यमाधिकारः] अर्थात् “चार लाख बत्तीस हजार (४,३२,०००) सौरवर्षोंका एक कलियुग होता है। कलियुगसे दो गुणा द्वापरयुगका [८,६४,००० सौरवर्षोंका], तीन गुणा त्रेतायुगका [१२,९६,००० सौरवर्षोंका] और चार गुणा सत्ययुगका [१७,२८,००० सौरवर्षोंका] काल है। इसलिये चतुर्युग (सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग) का कुल परिमाण तैंतालीस लाख बीस हजार (४३,२०,०००) सौरवर्ष है; इसीको एक महायुग कहा जाता है। इस महायुगको दिव्ययुग भी कहते हैं। इकहत्तर महायुगोंका एक मन्वन्तर होता हैं। चौदह मन्वन्तरोंका काल (१४x७१=) नौ सौ चौरानवे (९९४) महायुग है। इन चौदह मन्वन्तरोंके अन्तर्गत पन्द्रह सत्ययुगके परिमाणका सन्धिकाल होता है। यह सन्धिकाल अर्थात् पन्द्रह सत्ययुगोंके परिमाणका काल [१५x१७,२८,०००=२,५९,२०,००० सौरवर्ष] छह महायुगोंके काल [६x४३,२०,०००=२,५९,२०,००० सौरवर्ष] के बराबर होता है। इस प्रकार चौदह मन्वन्तरों और तदन्तर्गत सन्धिकालको मिलाकर एक हजार महायुगोंके कालके बराबर ब्रह्माका एक दिन अथवा एक कल्प होता है और इतने ही कालके बराबर ब्रह्माकी रात्रि होती है॥”७-८॥ ‘वैवस्वत’-नाम एइ सप्तम मन्वन्तर। साताइश चतुर्युग गेले ताहार अन्तर ॥९॥ अनुवाद—वर्तमान सप्तम मन्वन्तरका नाम ‘वैवस्वत’ है और इसके सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके हैं॥९॥ अनुभाष्य—वैवस्वत-नामके सातवें मनुके मन्वन्तरमें श्रीमन्महाप्रभुका आविर्भाव होता है। “स्वायम्भुवाख्यो मनुराद्य आसीत्, स्वारोचिषश्चोत्तम-तामसाख्यौ। जातौ ततो रैवतचाक्षुषौ च वैवस्वतः सम्प्रति सप्तमोऽयम्॥ सावर्णिर्दक्षसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिकस्ततः। धर्मसावर्णिको रुद्रपुत्रो रौच्यश्च भौत्यकः॥” (१) स्वायम्भुव, (२) स्वारोचिष, (३) उत्तम, (४) तामस, (५) रैवत, (६) चाक्षुष, (७) वैवस्वत, (८) सावर्णि, (९) दक्षसावर्णि, (१०) ब्रह्मसावर्णि, (११) धर्मसावर्णि, (१२) रुद्रपुत्र (सावर्णि), (१३) रौच्य (देवसावर्णि) और (१४) भौत्यक (इन्द्रसावर्णि)—ये चौदह मनु हैं। प्रत्येक मनुका भोगकाल इकहत्तर महायुग है॥९॥ अष्टाविंश चतुर्युगे द्वापरेर शेषे। व्रजेर सहिते हय कृष्णेर प्रकाशे ॥१०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०॥ तीसरा अध्याय | ९७