श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/१०-१३ अमृतप्रवाह भाष्य-वैवस्वत-मन्वन्तरके अट्ठाइसवें चतुर्युगमें द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण अपने ब्रजतत्त्वके समस्त उपकरणों (धाम-परिकरादि) को लेकर प्रकट होते हैं॥१०॥ अनुभाष्य-वैवस्वत मन्वन्तरके इकहत्तर महायुगोंमें सत्ताइस महायुग पूर्ण होनेके बाद अट्ठाइसवें चतुर्युगमें सत्य और त्रेतायुगके बाद द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्णका आविर्भाव होता है। उस समय तक ब्रह्माका दिन प्रारम्भ होनेसे लेकर सन्धिसहित छह मनुओंके पूर्ण भोगकाल और वैवस्वत मनुके सत्ताईस महायुग तथा सत्य, त्रेता एवं द्वापरयुगके अन्ततक कुल (सृष्टिकालको छोड़कर) सौरवर्षकी संख्यासे एक अरब सत्तानवे करोड़ तिरपन लाख बीस हजार (१,९७,५३,२०,०००) वर्ष व्यतीत हो चुके होते हैं॥१०॥ शान्तरसके अतिरिक्त चार प्रकारके मुख्यरस :- दास्य, सख्य, वात्सल्य, शृङ्गार-चारि रस। चारि भावे भक्त यत, कृष्ण तार वश ॥ ११॥ अनुवाद-दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार-ये चार प्रकारके रस हैं। इन चार भावोंके जितने भक्त हैं, श्रीकृष्ण उनके द्वारा वशीभूत होते हैं॥११॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रस ही कृष्णलीलाके प्रकरण (मूल आधार) हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार नामक पाँच प्रकारके रस हैं। उसमेंसे दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररस-इन चार प्रकारके रसोंके भक्तोंके द्वारा ही श्रीकृष्ण सम्पूर्णरूपसे वशीभूत होते हैं॥११॥ अनुभाष्य-यहाँपर 'शान्त' रसका उल्लेख नहीं करनेका कारण यह है-यद्यपि जड़जगत्में शान्तरस सबसे उच्चस्थानमें अवस्थित है, तथापि चित् जगत्में इसका स्थान सबसे निम्न है। शान्तरस अप्राकृत होनेपर भी इस रसके आलम्बन विषय (भगवान्) और आश्रय (भक्त) में परस्पर ज्ञेय और ज्ञातृ-भावका विनिमय नहीं है। इसलिये दास्यसे सख्यमें, सख्यसे वात्सल्यमें और वात्सल्यसे मधुर रसमें श्रीकृष्णप्रीतिके उत्कर्षका तारतम्य विद्यमान है॥११॥ दास-सखा-पिता-माता-प्रेयसीगण लञा। व्रजे क्रीड़ा करे कृष्ण प्रेमाविष्ट हञा॥१२॥ अनुवाद-व्रजमें श्रीकृष्ण प्रेममें आविष्ट होकर अपने दास, सखा, पिता-माता तथा प्रेयसियोंके साथ लीलाएँ करते हैं॥१२॥ अमृतानुकणिका-'दास'-श्रीकृष्णके दास्यभावके भक्त नन्द महाराजके सेवक रक्तक-पत्रकादि; 'सखा'-सख्यभावके भक्त सुबल-मधुमङ्गलादि; 'पिता-माता'-वात्सल्य भावके भक्त, नन्द महाराज श्रीकृष्णके नित्य पिता और यशोदा उनकी नित्य माता; 'प्रेयसीगण'-मधुर भावके भक्त, श्रीराधादि व्रजसुन्दरियाँ ॥ १२ ॥ औदार्यप्रधान गौर-अवतारकी सूचना :- यथेष्ट विहरि' कृष्ण करे अन्तर्धान। अन्तर्धान करि' मने करे अनुमान ॥ १३ ॥ ९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत