भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

३/१३-१६ ] चिरकाल नाहि करि प्रेमभक्ति दान। भक्तिबिना जगतेर नाहि अवस्थान॥१४॥ जगत् वैधीभक्तिके द्वारा ही परिचालित; इसलिये श्रीकृष्णप्रेमसे अनभिज्ञ :- सकल जगते मोरे करे विधि भक्ति। विधि-भक्त्ये व्रजभाव पाइते नाहि शक्ति॥१५॥ ऐश्वर्य-ज्ञाने सब जगत् मिश्रित। ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत॥१६॥ अनुवाद- श्रीकृष्ण प्रकटलीलामें यथेष्ट विहार करके जब अन्तर्धान हो गये, तब वे मनमें कुछ विचार करने लगे, - “मैंने चिरकालसे इस प्रेमभक्तिका दान जगत्में नहीं किया है, भक्तिके बिना जगत्के अस्तित्त्वका कोई प्रयोजन नहीं है, अर्थात् भक्तिके बिना जीवोंका इस संसारसे उद्धार नहीं होगा। सारा जगत् मेरी वैधी अर्थात् शास्त्रके शासनानुसार भक्ति करता है, किन्तु वैधी-भक्तिसे व्रजभावको प्राप्त करना सम्भव नहीं है। सारे जगत्की भक्ति मेरे ऐश्वर्य-ज्ञानसे मिश्रित है, किन्तु इस ऐश्वर्यज्ञानसे शिथिल प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥१३-१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य- [श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं]- अभी तक मैंने जगत्को अपनी प्रेमभक्तिका दान नहीं किया है। शास्त्रोंका अध्ययनकर जगत्में सभी लोग वैधीभक्तिके द्वारा मेरा भजन करते हैं। किन्तु मेरा परमभाव जो व्रजभाव है, उसे वैधीभक्तिके द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। वैधीभक्तिमें ऐश्वर्यज्ञान ही प्रबल है। ऐश्वर्यभावसे प्रेम शिथिल हो जाता है अर्थात् प्रेममें गाढ़ता नहीं रहती। इसलिये ऐसे प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥१४-१६॥ अमृताणुकणिका- अप्रकट गोकुलका ही एक प्रकाश मायिक-ब्रह्माण्डमें जब लोगोंके दृष्टिगोचर होता है, तब उसे प्रकट-प्रकाश कहते हैं। इस प्रकट प्रकाशमें सभी लीलाएँ करनेके बाद श्रीकृष्ण जब अप्रकट-प्रकाशके साथ प्रकट-प्रकाशको एकीभूत करते हैं, तब मायिक ब्रह्माण्डमें लीला दिखायी नहीं देती; यही प्रकट-लीलाका अन्तर्धान होना है। श्रीकृष्ण जब ब्रह्माण्डमें लीला प्रकट करते हैं, तब भी अप्रकट गोकुलमें एक स्वरूपसे नित्य परिकरोंके साथ लीला करते हैं। परिकर भी एक स्वरूपसे अप्रकट गोकुलमें और एक स्वरूपसे प्रकट लीलामें रहते हैं। बृहद्भागवतामृतम् (२/५/५२, २/५/५४) में श्रीसनातन गोस्वामीने भी श्रीनारदकी उक्तिमें यह प्रकाश किया है- “यथा हि भगवानेकः श्रीकृष्णो बहुमूर्त्तिभिः। बहुस्थानेषु वर्त्तत तथा तत्सेवका वयम्॥५२॥ सर्वेऽपि नित्यं किल तस्य पार्षदाः, सेवापराः क्रीड़नकानुरूपाः। प्रत्येकमेते बहुरूपवन्तोऽ- प्यैक्यं भजामो भगवान् यथासौ ॥” ५४॥ अर्थात् “जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण एक होते हुए भी भिन्न-भिन्न स्थानोंपर भिन्न-भिन्न मूर्तियोंमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार उनके सेवक हम भी अनेक स्थानोंपर अनेक स्वरूपोंसे रहते हैं। हम सभी भगवान्के नित्य पार्षद हैं और सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहते हैं। प्रभु तीसरा अध्याय | ९९