भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ३/१३-१६

जब जैसी क्रीड़ा करनेकी इच्छा करते हैं, हम भी प्रभुकी उस क्रीड़ाके अनुरूप स्वरूप धारण करते हैं। इसलिये भगवान्‌की भाँति हमारा भी एक स्वरूप होते हुए भी हम अनेक स्वरूप धारण करते हैं।” एक ही पार्षदकी इस प्रकार बहुमूर्ति होनेपर भी ऐक्यकी हानि नहीं होती। प्रकट-व्रजके परिकरोंका अप्रकट-गोकुलमें स्थित उस-उस स्वरूपके साथ एकीभूत हो जाना ही प्रकट-लीलाका अन्तर्धान है। 'भक्तिबिना जगतेर नाहि अवस्थान' - मायिक वस्तुओंमें अभिनिवेशके कारण ही जीव नाना योनियोंमें भ्रमण करते हुए अनेक दुःख भोग करता है। इसलिये किसी भी एक अवस्थामें तब तक जीव नित्य अवस्थान नहीं कर पाता। केवल ज्ञान-कर्म-योगादिसे अनावृत शुद्धभक्तिके द्वारा ही मायिक अभिनिवेश दूर होनेपर जीव अपने स्वरूपमें अवस्थित हो सकता है। भक्तिकी सहायतासे योग-ज्ञानादिके द्वारा मोक्ष प्राप्त करने पर भी जीवका आत्यन्तिक कल्याण नहीं होता। मुक्त होनेपर भी जीवकी तब प्रेमभक्तिसहित श्रीकृष्ण सेवाकी भावना उत्पन्न हो सकती है, क्योंकि उसे अपनी उस मुक्तावस्थामें भी परितृप्ति नहीं होती। श्रीकृष्ण सेवाके निमित्त मुक्त जीवोंमें वे किसी-किसीकी भजन करनेकी बात सुनी जाती है। 'मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते'। - नृसिंहतापनी २/५/१६का शङ्करभाष्य। इसलिये अपनी-अपनी अवस्थामें मुक्त पुरुषोंका भी ऐकान्तिक अवस्थान नहीं दिखायी देता है। (भागवत १०/८९/५९) कारणोदशायी विष्णु-वचन-'द्विजात्मजा मे युवयोर्दिदृक्षुणा मयोपनीता' अर्थात् 'श्रीकृष्ण और अर्जुन ! मैं तुम दोनोंके दर्शनके लिये ही ब्राह्मणके बालक अपने पास लाया था।' और (भागवत १०/१६/३६) नागपत्नियोंके वचन- 'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत् तपो, विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता' अर्थात् 'हे देव ! जिस पद-रेणुकी प्राप्तिकी आशासे ललना लक्ष्मीजीने समस्त विषय-भोगोंका परित्याग करके बहुत दिनोंतक व्रत-नियमोंको धारण करते हुए तपस्या की थी'; इन श्लोकोंसे यह समझा जाता है कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णका सर्वचित्तहारी माधुर्य परव्योममें स्थित भगवत्-स्वरूपों और उनकी लक्ष्मियोंको भी आकर्षित करता है। तब जिन्होंने ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा भक्तिके साधनसे सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करके परव्योममें वास करनेका सौभाग्य प्राप्त किया है, श्रीकृष्ण-माधुर्यकी कथा सुनकर उसके आस्वादनका लोभ उनके भी चित्तको चञ्चल करेगा, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। किन्तु जिन्होंने व्रजके श्रीकृष्णकी प्रेमसेवाका अधिकार प्राप्त किया है, उनकी भगवान्‌के अन्य किसी भी स्वरूपकी सेवा अथवा अन्य किसी भी धाममें अवस्थानके निमित्त उनकी कोई भी वासना जाग्रत होती देखी नहीं जाती। व्रजमें श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा प्राप्त होनेपर जीवकी आत्यन्तिकी स्थिरता सिद्ध होती है॥१३-१४॥ शास्त्रोंमें जीवोंके लिये जो कर्त्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उसे विधि कहते हैं और जिन्हें करनेके लिये मना किया गया है, उसे निषेध कहते हैं। विधिको पालन और निषेधका त्याग ही जीवोंके लिये वैध धर्म है। भगवान् विष्णुको सर्वदा स्मरण करना चाहिये - यही मूलविधि है। वर्ण और आश्रमकी समस्त विधियाँ इस मूलविधिके अनुगत हैं। भगवान्‌को कभी मत भूलो - यही मूल निषेध है। पापोंका निषेध, विमुखताका वर्जन, पापोंका प्रायश्चित्तादि उक्त मूल निषेध-विधिके अनुगत हैं। इन विधि-निषेधोंका पालन करना ही शास्त्रोंका शासन मानना है।

१०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत