भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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शास्त्र-विहित कर्मोंको करनेसे और साथ ही शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंके त्यागसे जीवका कल्याण होता है; इसका विपरीत आचरण जीवके लिये नरकके मार्गको प्रशस्त करता है। शास्त्रोंके इस शासन-भयसे भक्तिमें जीवोंकी प्रवृत्ति होनेपर उसे वैधीभक्ति कहते हैं। भगवान्‌को चित्-अचित् जगत्‌का स्वामी और नियन्ता जानकर उनके ऐश्वर्यज्ञानके कारण जीव स्वयंको अति क्षुद्र मानता है। इस कारण उसका भगवान्‌के प्रति सम्भ्रम भाव और अपराधकी सम्भावनाका भय उसके हृदयमें रहता है। इस कारण उसका प्रेम सङ्कुचित हो जाता है। (भागवत १०/४४/५०-५१)—कंसके वधके पश्चात् देवकी-वसुदेवको कारागारसे मुक्त कराकर जब श्रीकृष्ण-बलरामने उनके चरणोंमें प्रणामकर वन्दना की, तब देवकी और वसुदेव उन प्रणत पुत्रोंको जगदीश्वर जानकर शङ्कित होकर उनको आलिङ्गन नहीं कर सके, परन्तु हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े रहे। इस प्रकार देवकी-वसुदेवका वात्सल्य भाव सङ्कुचित हो गया था। (गीता ११/४१-४२)—कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके विश्वरूपके दर्शन करके श्रीकृष्णसखा अर्जुनका सख्यभाव सङ्कुचित हो गया और वे श्रीकृष्णसे क्षमा याचना करने लगे—'आपकी इस महिमाको नहीं जानकर मैंने सखा मानकर प्रमादवश अथवा प्रणयवश हठपूर्वक आपको जो हे कृष्ण! हे यादव ! हे सखे ! आदिसे सम्बोधित किया है तथा हे अच्युत ! परिहासके लिये एकान्तमें अथवा अन्यान्य बन्धुओंके समक्ष विहार, शयन, आसन, भोजनादिके समय आप मेरे द्वारा जो असम्मानित हुए हैं, उन सबके लिये मैं आपसे अपरसीम क्षमा-याचना करता हूँ।' (भागवत १०/६०/१०-२४)—एक समय द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णने परिहासमें रुक्मिणीजीसे कहा—“राजकुमारी! बड़े-बड़े राजा, जिनके पास लोकपालोंके समान ऐश्वर्य है, सुन्दरता और बलमें भी बहुत आगे बढ़े हुए हैं, तुमसे विवाह करना चाहते थे और तुम्हारे पिता-भ्राताने उनके साथ विवाहके लिये वाग्दान भी कर दिया था। तुमने उनको छोड़कर मेरे जैसे व्यक्तिको, जो किसी प्रकारसे तुम्हारे समान नहीं है, अपना पति स्वीकार किया। सुन्दरी! मैं तो सदासे अकिञ्चन हूँ। ऐसे ही अकिञ्चन लोगोंसे मैं प्रेम भी करता हूँ और वे लोग भी मुझसे प्रेम करते हैं। जिनका धन, कुल, ऐश्वर्य, सौन्दर्य अपने समान होता है, उन्हींसे विवाह और मित्रताका सम्बन्ध करना चाहिये। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम अपने अनुरूप किसी श्रेष्ठ क्षत्रियका वरण कर लो।” जब रुक्मिणीजीने अपने परम प्रियतम पतिकी यह अप्रिय वाणी सुनी—जो पहले कभी नहीं सुनी थी, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गयीं और वियोगकी सम्भावनासे वे तत्क्षण इतनी दुबली हो गयीं कि उनकी कलाईका कङ्कन खिसक गया, हाथका चँवर गिर गया और वे एकाएक अचेत हो गयीं। अर्थात् उनका कान्ताप्रेम भी शिथिल हो गया। इसलिये जब भी कुछ सङ्कोच, भय अथवा गौरव-बुद्धि आकर भक्तके हृदयमें उपस्थित होती है, तभी श्रीकृष्णका आनन्द भी सङ्कुचित हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेमाभक्तिमें ही प्रीति होती है। उस प्रेमाभक्तिको पाकर भक्तगण सालोक्य, तीसरा अध्याय | १०१