भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

सार्ष्टि, सामीप्य और सारूप्य मुक्तियोंका भी आदर नहीं करते हैं, वे श्रीकृष्णके सेवासुखको ही चरम प्राप्य मानते हैं। यह प्रेमाभक्ति रागमार्गमें ही साध्य है। श्रीकृष्णलीलाके माधुर्यके द्वारा रागमार्गमें रुचि सिद्ध होती है; इसमें ऐश्वर्य ज्ञानका कोई स्थान नहीं है। इसलिये प्राक्तन और आधुनिक, दोनों प्रकारके लोभविशिष्ट भक्तजन जब श्रीकृष्णके नित्य परिकरोंके भाव-प्राप्ति हेतु उपाय जाननेके लिये जिज्ञासु होते हैं, तब उसी अवस्थामें शास्त्र और तदनुकूल युक्तिकी अपेक्षा देखी जाती है; क्योंकि केवल शास्त्र-प्रतिपादित युक्तिके द्वारा निर्दिष्ट उपायसे ही उक्त लोभनीय भावकी प्राप्ति हो सकती है। इसके अतिरिक्त उक्त भावको पानेके लिये कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उदाहरण स्वरूप कह रहे हैं— “जैसे किसी व्यक्तिको दूध पीनेके लिये लोभ हुआ, तब दूध कैसे मिले? इसके लिये उपाय जाननेके लिये इच्छा होती है। उसी समय दूध-लोभी व्यक्तिको एक ऐसे विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशकी आवश्यकता होती है, जिससे वह सहज ही दूध प्राप्त कर सके। तदनन्तर गाय खरीद करे, उसे खिलाये-पिलाये, फिर बच्चा होनेपर गायका दूध दोहन करे और फिर उस दूधको पिये। इस प्रकार उस विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशानुसार लोभी व्यक्तिको गाय खरीदने, घास-भूसा खिलाने तथा गो-दोहन आदिके विषयमें विविध प्रकारकी शिक्षाओंको सीखना होता है। इसी प्रकार लोभ-विशिष्ट साधकको शिक्षा लाभ करनी होती है। उपदेश श्रवणके बिना स्वतः ज्ञान लाभ नहीं होता। श्रीमद्भागवतम् (८/६/१२ श्लोक)में ब्रह्माजीने ऐसा ही कहा है—मनुष्य जैसे उपाय परम्पराके द्वारा लकड़ीसे अग्नि, गायसे दूध, पृथ्वीसे अन्न और जल, वाणिज्य-व्यवसायसे अपनी जीविका प्राप्त करता है, उसी प्रकार हे विष्णो! पण्डितगण बुद्धिके द्वारा सत्त्वादि गुणोंसे आप निर्गुणको प्राप्त होते हैं।” उसी प्रकार हरिभजनमें लोभोत्पत्ति होनेपर उसके लिये उपाय जाननेके लिये शास्त्रोंके उपदेशोंकी और साधु-गुरु पदाश्रयकी अपेक्षा दिखलायी देती है। साधुमार्गका अनुसरण एकान्त आवश्यक है, उसका उल्लङ्घन करनेसे हरिभजनका उपाय नहीं जाना जा सकता। कोई-कोई व्यक्ति साधुमार्गका उल्लङ्घन करके कहते हैं कि मुझे अनुराग हो गया है और वे नयी-नयी प्रणाली प्रवर्तन करके उसके द्वारा प्रतिष्ठा अर्जनमें तत्पर हो जाते हैं। वे अपने अनुगत लोगोंको कहते है कि वे सिद्ध हो गये हैं और ऐसा प्रचार करके सरल लोगोंको भ्रान्त पथमें ले जाते है। अपनी (पुरुष) जड़देहको स्त्री रूपमें सजाकर निजभजन-प्रणालीको उदाहरण स्वरूपमें निर्देश करते हैं। ऐसे साधुमार्गके उल्लङ्घनकारियोंको लक्ष्य करके शास्त्रमें उपदेश दिया गया है (भक्तिसन्दर्भ २८४)— “श्रुतिस्मृतिपुराणादिपञ्चरात्रविधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातयैव केवलं॥” अर्थात् “श्रुति-स्मृति पुराणादि एवं पञ्चरात्रकी विधिका त्याग करके ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न ही उत्पादन किया करती है।” ऐकान्तिकी हरिभक्ति ही तो प्रार्थनीय वस्तु है, तो शास्त्रोंमें इसे किस प्रकार उत्पातका कारण बतलाया गया है? इस श्लोकका उद्दिष्ट मर्म इस प्रकार है—यदि कोई शास्त्रशासन ना मानकर