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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

सार्ष्टि, सामीप्य और सारूप्य मुक्तियोंका भी आदर नहीं करते हैं, वे श्रीकृष्णके सेवासुखको ही चरम प्राप्य मानते हैं। यह प्रेमाभक्ति रागमार्गमें ही साध्य है। श्रीकृष्णलीलाके माधुर्यके द्वारा रागमार्गमें रुचि सिद्ध होती है; इसमें ऐश्वर्य ज्ञानका कोई स्थान नहीं है। इसलिये प्राक्तन और आधुनिक, दोनों प्रकारके लोभविशिष्ट भक्तजन जब श्रीकृष्णके नित्य परिकरोंके भाव-प्राप्ति हेतु उपाय जाननेके लिये जिज्ञासु होते हैं, तब उसी अवस्थामें शास्त्र और तदनुकूल युक्तिकी अपेक्षा देखी जाती है; क्योंकि केवल शास्त्र-प्रतिपादित युक्तिके द्वारा निर्दिष्ट उपायसे ही उक्त लोभनीय भावकी प्राप्ति हो सकती है। इसके अतिरिक्त उक्त भावको पानेके लिये कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उदाहरण स्वरूप कह रहे हैं— “जैसे किसी व्यक्तिको दूध पीनेके लिये लोभ हुआ, तब दूध कैसे मिले? इसके लिये उपाय जाननेके लिये इच्छा होती है। उसी समय दूध-लोभी व्यक्तिको एक ऐसे विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशकी आवश्यकता होती है, जिससे वह सहज ही दूध प्राप्त कर सके। तदनन्तर गाय खरीद करे, उसे खिलाये-पिलाये, फिर बच्चा होनेपर गायका दूध दोहन करे और फिर उस दूधको पिये। इस प्रकार उस विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशानुसार लोभी व्यक्तिको गाय खरीदने, घास-भूसा खिलाने तथा गो-दोहन आदिके विषयमें विविध प्रकारकी शिक्षाओंको सीखना होता है। इसी प्रकार लोभ-विशिष्ट साधकको शिक्षा लाभ करनी होती है। उपदेश श्रवणके बिना स्वतः ज्ञान लाभ नहीं होता। श्रीमद्भागवतम् (८/६/१२ श्लोक)में ब्रह्माजीने ऐसा ही कहा है—मनुष्य जैसे उपाय परम्पराके द्वारा लकड़ीसे अग्नि, गायसे दूध, पृथ्वीसे अन्न और जल, वाणिज्य-व्यवसायसे अपनी जीविका प्राप्त करता है, उसी प्रकार हे विष्णो! पण्डितगण बुद्धिके द्वारा सत्त्वादि गुणोंसे आप निर्गुणको प्राप्त होते हैं।” उसी प्रकार हरिभजनमें लोभोत्पत्ति होनेपर उसके लिये उपाय जाननेके लिये शास्त्रोंके उपदेशोंकी और साधु-गुरु पदाश्रयकी अपेक्षा दिखलायी देती है। साधुमार्गका अनुसरण एकान्त आवश्यक है, उसका उल्लङ्घन करनेसे हरिभजनका उपाय नहीं जाना जा सकता। कोई-कोई व्यक्ति साधुमार्गका उल्लङ्घन करके कहते हैं कि मुझे अनुराग हो गया है और वे नयी-नयी प्रणाली प्रवर्तन करके उसके द्वारा प्रतिष्ठा अर्जनमें तत्पर हो जाते हैं। वे अपने अनुगत लोगोंको कहते है कि वे सिद्ध हो गये हैं और ऐसा प्रचार करके सरल लोगोंको भ्रान्त पथमें ले जाते है। अपनी (पुरुष) जड़देहको स्त्री रूपमें सजाकर निजभजन-प्रणालीको उदाहरण स्वरूपमें निर्देश करते हैं। ऐसे साधुमार्गके उल्लङ्घनकारियोंको लक्ष्य करके शास्त्रमें उपदेश दिया गया है (भक्तिसन्दर्भ २८४)— “श्रुतिस्मृतिपुराणादिपञ्चरात्रविधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातयैव केवलं॥” अर्थात् “श्रुति-स्मृति पुराणादि एवं पञ्चरात्रकी विधिका त्याग करके ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न ही उत्पादन किया करती है।” ऐकान्तिकी हरिभक्ति ही तो प्रार्थनीय वस्तु है, तो शास्त्रोंमें इसे किस प्रकार उत्पातका कारण बतलाया गया है? इस श्लोकका उद्दिष्ट मर्म इस प्रकार है—यदि कोई शास्त्रशासन ना मानकर

३/१३-१८ ] लोभमें ही प्रवृत्त होकर शुद्धभजन-प्रणालीका उल्लङ्घन करके नयी प्रणालीका अवलम्बन और प्रवर्त्तन करे, तब उसके फलस्वरूप उत्पात ही प्राप्त होगा, हरिभक्ति प्राप्त नहीं होगी। ऐसा रागात्मिका भक्तिके रसाचार्य स्वयं श्रील विश्वनाथ चक्रवर्त्तीपादने इस प्रकार हठात् भक्तोंको सावधान किया है। जो स्वयंको गौड़ीय सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त मानते हैं, वे कभी भी श्रील चक्रवर्त्तीपादके उपदेशका उल्लङ्घन करके अपने स्वतन्त्र मतकी बुद्धि पोषण नहीं करते हैं। जो इस प्रकार करते हैं, वे गौड़ीय भक्त नहीं है, अथवा चारों सत्सम्प्रदायोंमें किसी भी सम्प्रदायके भक्त नहीं हैं। इसलिये वे भक्त ही नहीं हैं, क्योंकि सम्प्रदाय-भिन्न शुद्धभक्त नहीं होते, “सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते विफला मताः।” श्रीरूपगोस्वामीने श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु (श्लोक १/२/२९५)में स्पष्ट कहा है- “सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि। तद्भावालिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः ॥” रागानुगा भक्तिका अनुष्ठान दो प्रकारसे किया जाता है-साधकरूपसे अर्थात् यथावस्थित देह (बाह्यदेह) के द्वारा, सिद्धरूपसे अर्थात् अपने अभिलषित प्रेमसेवाके उपयोगी अन्तश्चिन्तित देहके द्वारा व्रजस्थित अपने अभीष्ट श्रीकृष्णके और श्रीकृष्णके प्रियकरोंके भाव या श्रीकृष्ण-विषयक रति प्राप्त करनेके लिये लुब्ध होकर उन व्रजलोकके परिकरों, श्रीकृष्णके अत्यन्त प्रियजनों, श्रीराधिका-ललिता-विशाखा-श्रीरूपमञ्जरी आदि एवं उनके अनुगत श्रीरूपगोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी आदिके अनुसार करना होता है। सिद्धरूपसे मानसी-सेवा श्रीराधा-ललिता- विशाखा-श्रीरूपमञ्जरी आदि व्रजवासियोंके अनुसार करनी होगी तथा साधकरूपसे कायकी सेवा श्रीरूप-सनातनादि व्रजवासी महानुभावोंके अनुसार करनी होगी। लोभनीय-भावप्राप्तिकी आकाङ्क्षावाले व्यक्ति रागमार्गमें व्रजवासियोंके अर्थात् शुद्ध मधुररसके उपासकजनोंके अनुसरणमें साधक रूपमें और यहाँ तक कि सिद्धावस्थामें भी सेवारत होंगे, स्वयं कोई नयी प्रणालीका आविष्कार नहीं करेंगे ॥ १३-१६॥ गौरव-भावमयी वैधीभक्तिके फलसे चतुर्विध मुक्ति और वैकुण्ठमें नारायण-प्राप्ति :- ऐश्वर्यज्ञाने विधि भजन करिया। वैकुण्ठके याय चतुर्विध मुक्ति पाञा ॥ १७॥ सार्ष्टि, सारूप्य आर सामीप्य, सालोक्य। सायुज्य ना लय भक्त याते ब्रह्म-ऐक्य ॥ १८ ॥ अनुवाद-ऐश्वर्य-ज्ञानसे वैधी-भक्ति करके भक्तलोग चार प्रकारकी मुक्तियोंमें किसी एक प्रकारकी मुक्तिको पाकर वैकुण्ठमें जाते हैं। सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्य, इन चार प्रकारकी मुक्तियोंको तो भक्त ग्रहण करते हैं, किन्तु वे 'जीव-ब्रह्म-ऐक्य' कहलानेवाली सायुज्य मुक्तिको कभी स्वीकार नहीं करते ॥ १७-१८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सार्ष्टि'-विष्णुके समान ऐश्वर्यकी प्राप्ति; 'सारूप्य'-विष्णुकी भाँति चतुर्भुजादि रूप और वर्णकी प्राप्ति; 'सामीप्य'-विष्णुके निकट अवस्थिति; 'सालोक्य'-विष्णुलोकमें वास करना ॥ १८॥ तीसरा अध्याय | १०३

[ ३/१७-१८ अनुभाष्य- (भा: ३/२९/१३)- “सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥” अर्थात् “सालोक्य, सार्ष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सायुज्य मुक्तिको मेरे द्वारा दिये जानेपर भी मेरे भक्त मेरी सेवाको त्याग करके उन्हें ग्रहण नहीं करते।” (भा: ९/७/६७) भी द्रष्टव्य है॥ १८ ॥ अमृतानुक्रमणिका - यहाँ प्रश्न हो सकता है - ऐश्वर्य ज्ञानसे शिथिल प्रेममें श्रीकृष्णकी प्रीति नहीं है, तो क्या ऐश्वर्य ज्ञानसे वैधी भक्तिका अनुष्ठान करनेवालोंका भजन सम्पूर्णतया व्यर्थ है ? इसके उत्तरमें ग्रन्थकार कह रहे हैं- “नहीं उनका भजन व्यर्थ नहीं है। वे यद्यपि व्रजभावसे श्रीकृष्णकी सेवा लाभ नहीं कर सकते, तथापि वे चार प्रकारकी मुक्तियोंमेंसे किसी एक प्रकारकी मुक्तिको प्राप्तकर वैकुण्ठमें विष्णुकी अपने रसके अनुरूप सेवा लाभ करते हैं। ऐश्वर्य-प्रधान भक्तोंकी ऐश्वर्य-प्रधान वैकुण्ठमें ही गति है।” (भःरःसिः पूर्व विभाग चतुर्थ लहरी-१४)- “महिमेज्ञानयुक्तः स्याद्विधिमार्गानुसारिणाम्।” अर्थात् “विधिमार्गके भजनमें भगवान्‌के माधुर्यका ज्ञान प्रधान ना होकर उनकी महिमाका ज्ञान ही प्रधान होता है।” (भःरःसिः पूर्व विभाग चतुर्थ लहरी-१२)- “माहात्म्यज्ञानयुक्तस्तु सुदृढ़ सर्वतोऽधिकः। स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया साष्ट्र्यादि नान्यथा ॥” अर्थात् “माहात्म्यज्ञानयुक्त, सुदृढ़ और सर्वतोभावसे अधिक जो स्नेह है, उसे प्रेम-भक्ति कहा जाता है। उससे सार्ष्टि आदि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त की जा सकती है, उस मुक्तिको पानेका और कोई उपाय नहीं है।” बृहद्भागवतामृतम् (२/४/१३२) में श्रीनारदकी गोपकुमारके प्रति उक्ति- “स वै विनोदः सकलोपरिष्टाल्लोके क्वचिद्भाति विलोभयन् स्वान्। सम्पाद्य भक्तिं जगदीश-भक्त्या वैकुण्ठमेत्यात्र कथं त्वयेक्ष्यः ॥” अर्थात् “श्रीकृष्णकी वैसी क्रीड़ा समस्त लोकोंके ऊपर विराजमान किसी एक एकान्त स्थानपर अपने समस्त भक्तोंके मनका हरण करते हुए प्रकाशित रहती है। तुमने प्रभुके प्रति जगदीश बुद्धिसे भक्तिकर इस वैकुण्ठलोकको प्राप्त किया है, इसलिये यहाँपर वैसी क्रीड़ाका सुख किस प्रकार अनुभव करोगे?” अवश्य किसी शुद्धभक्त-वैष्णवकी कृपा होनेपर विधिमार्गके भजनमें भी ऐश्वर्यज्ञानहीना शुद्धभक्तिकी कृपा प्राप्त हो सकती है।” सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्तियोंके अतिरिक्त एक प्रकारकी मुक्ति है, जिसे सायुज्य मुक्ति कहते हैं; उपास्यके स्वरूपके साथ मिलित होनेका नाम 'सायुज्य' है। वास्तवमें सायुज्य मुक्तिमें जीव उपास्य स्वरूपके साथ तादात्म मात्र ही प्राप्त करता है (अग्निके संयोगसे जैसे लोहा अग्नि-तादात्म्य प्राप्त करता है, उसी प्रकार); उपास्यके स्वरूपके साथ अभेदत्व प्राप्त नहीं करता है और कर भी नहीं सकता, क्योंकि जीव स्वरूपतः ब्रह्म अथवा ईश्वर नहीं हो सकता। किसीके भी स्वरूपका व्यतिक्रम कभी भी नहीं हो सकता। यह सायुज्य मुक्ति दो प्रकारकी है-ब्रह्म-सायुज्य और ईश्वर-सायुज्य। निर्विशेष-ब्रह्मके साथ जो सायुज्य प्राप्त करते हैं, उनकी १०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/१७-१९ ] मुक्तिको ब्रह्म-सायुज्य कहते हैं। और भगवान्‌के किसी भी एक सविशेष स्वरूप (नारायण-नृसिंहादिके) साथ जो सायुज्य प्राप्त करते हैं, उनके सायुज्यको ईश्वर-सायुज्य कहते हैं। जो सायुज्य-मुक्ति प्राप्त करते हैं, वे ब्रह्मके अथवा ईश्वरके आनन्दमें ही निमग्न रहते हैं। इसलिये उनके स्वतन्त्र अस्तित्वका ज्ञान अथवा स्वरूपानुबन्धि कर्त्तव्य-भगवत्-सेवाका अनुसन्धान भी उनके चित्तमें प्राधान्य लाभ नहीं कर पाता; अथवा साधारणतः उदित भी नहीं हो पाता। किन्तु जो भक्त हैं, वे अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रखकर भगवान्‌की सेवाकी ही कामना करते हैं। इसलिये कोई भी भक्त सायुज्य-मुक्तिकी कामना नहीं करते हैं, भगवान्‌के देनेकी इच्छा होनेपर भी उसे ग्रहण नहीं करते। साधारणतः वैकुण्ठमें विष्णुके समान ऐश्वर्य प्राप्तिको 'सार्टि' मुक्ति कहा जाता है। किन्तु पार्षदोंका ऐश्वर्य भगवान्‌के समान कभी भी नहीं हो सकता। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबृहद्भागवतामृतम् (२/४/१९९) की टीकामें लिखा है— “एवं पार्षदेभ्यस्तेभ्योऽपि सकाशाद्भगवत्ताभिधेय-स्वाभाविक-परमैश्वर्यविशेषापेक्षया, तथानन्यसाधारण- मधुरमधुरविचित्र-सौन्दर्यादि-महिमविशेष-दृष्ट्या भगवतो महान् विशेषः सिध्यत्येव; अन्यथा सदा परमभावेन तेषां तस्मिन् विचित्रभजनरसानुपपत्तेरिति दिक्।” अर्थात् “सच्चिदानन्दघन रूपमें पार्षदों और भगवान्‌में समानता रहनेपर भी पार्षदोंकी तुलनामें श्रीकृष्णकी भगवत्ताका प्रतिपादन करनेवाले स्वाभाविक परम-ऐश्वर्य विशेष तथा अनन्य (अर्थात् जिस सौन्दर्य-माधुर्यका एकमात्र स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त भगवान्‌के अन्य किसी स्वरूपमें प्रकाश नहीं है) और असाधारण, मधुरसे भी मधुर नाना-प्रकारके सौन्दर्य आदि विशेष महिमाओंको देखकर श्रीकृष्णकी महान विशेषता स्वतः ही सिद्ध होती है। अन्यथा उनके पार्षदोंके द्वारा सर्वदा ही परम भावोंके साथ श्रीकृष्णके नाना-प्रकारके भजनरसरूप सुखका अनुभव करना सम्भव नहीं होता।” उपर्युक्त सालोक्यादि जो चार प्रकारकी मुक्तियाँ हैं, उन्हें प्राप्तकर मुक्तजीव पार्षद देह धारणकर वैकुण्ठमें वास करते हैं। उनको उपास्यदेवके धामके स्वरूपगत धर्मके कारण वहाँके सुख और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। सालोक्यादि चार मुक्तियाँ सुखैश्वर्योत्तरा और प्रेम-सेवोत्तरा दो प्रकारकी होती हैं (भःरःसिः पूर्व विभाग २/५६)। जिनके चित्तमें अपने उपास्यके धामके सुख और ऐश्वर्यको प्राप्त करनेकी वासना ही प्रधानरूपमें रहती है, उनकी मुक्तिको 'सुखैश्वर्योत्तरा' कहा गया है। जिनके चित्तमें प्रेमके स्वभाववशतः उपास्यकी सेवा करनेकी वासनाकी प्रधानता रहती है, उनकी मुक्तिको 'प्रेम-सेवोत्तरा' कहा जाता है। वैकुण्ठकी जो प्रेम-सेवा है, वह केवल ऐश्वर्य-ज्ञान मिश्रित प्रेममयी-सेवा होती है। वह उपास्यको स्वजन जानकर उनके सुख विधान करनेवाली प्रेममयी सेवा नहीं होती; मदीयता-भावमयी सेवा नहीं होती, तदीयता-भावमयी सेवा रहती है। जो सेवा चाहते हैं, वे सुखैश्वर्योत्तरा मुक्तिको ग्रहण नहीं करते॥ १७-१८॥ अपने भजनकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं श्रीकृष्णकी इच्छा :— युगधर्म प्रवर्त्तामु नाम-सङ्कीर्त्तन। चारि भाव-भक्ति दिया नाचामु भुवन॥ १९॥ तीसरा अध्याय | १०५

[ ३/१९-२१ उसके लिये ही भक्त और गुरुरूपमें अवतार, प्रचार और आचार :- आपनि करिमु भक्तभाव अङ्गीकारे। आपनि आचरि' भक्ति शिखामु सबारे॥२०॥ आचार बिना प्रचार निरर्थक :- आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय। एइ त' सिद्धान्त गीता-भागवते गाय॥२१॥ अनुवाद—मैं स्वयं नाम-सङ्कीर्तन रूपी कलियुगधर्मका प्रवर्तन करूँगा और चार प्रकारके भावोंसे युक्त प्रेमाभक्ति देकर इस जगत्‌को नचाऊँगा। मैं स्वयं भक्तका भाव ग्रहण करके अपने आचरणके द्वारा सभीको भक्तिकी शिक्षा दूँगा। स्वयं आचरण नहीं करनेसे धर्मकी शिक्षा नहीं दी जाती, इसी सिद्धान्तका गीता-भागवतादि गान करते हैं॥१९-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ऐश्वर्यज्ञानसे विधिमार्गमें जो लोग भजन करते हैं, वे साष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्यरूप चार प्रकारकी मुक्तियोंको प्राप्त करके वैकुण्ठलोकमें जाते हैं। ब्रह्मके साथ एक्यरूप (एक हो जाना) सायुज्य मुक्ति है, इसके लिये वैधीभक्ति करनेवाले भी प्रार्थना नहीं करते हैं। किन्तु प्रेमभक्ति पाकर पूर्व चार प्रकारकी मुक्तियोंका भी परित्याग करके मेरे भक्त मेरी सेवाके सुखको ही स्वीकार करते हैं। ऐसी वैधीभक्तिसे श्रेष्ठ प्रेमभक्तिको जगत्‌में प्रचार करना ही मेरा अभीष्ट है। मैं कलियुगका धर्म, जो नाम-सङ्कीर्तन है, उसे दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररसके साथ जगत्‌को देकर सभी लोगोंको नचाऊँगा और स्वयं भी भक्तभावको ग्रहण करके अपने आचरणके द्वारा जगत्‌के जीवोंको शिक्षा प्रदान करूँगा॥१७-२०॥ अमृतानुकणिका—'युगधर्म प्रवर्त्तामु नाम-सङ्कीर्तन'—पूर्व-पूर्व शास्त्रकारोंने मानव हृदयमें भगवद्भाव (श्रद्धा) उदयकालसे अबतक जो सब क्रम-उन्नतिको लक्ष्य किया है, उसकी आलोचनापूर्वक युगभेदसे तारकब्रह्म नामके ही क्रम-विकासका दर्शन किया है। सत्ययुगका तारकब्रह्म नाम— “नारायण परावेदाः नारायण पराक्षराः। नारायण परामुक्तिः नारायण परागतिः ॥” इसका तात्पर्य यह है—विज्ञान, भाषा, मुक्ति और चरम गति, इन समस्त विषयोंके आस्पद नारायण हैं। ऐश्वर्यगत परब्रह्मका नाम नारायण है। वैकुण्ठमें जितने भी पार्षदोंका वर्णन है, उनमें नारायणरूप भगवद्भाव सम्पूर्ण रूपसे उपलब्ध होता है। इस अवस्थामें शुद्ध शान्तभाव देखा जाता है। त्रेतायुगका तारकब्रह्म नाम— “रामनारायणानन्त मुकुन्द मधुसूदन। कृष्ण केशव कंसारे हरे वैकुण्ठ वामन ॥” इसमें जो सब नामोंका उल्लेख है, उनमें ऐश्वर्यगत नारायणके सभी विविध विक्रम सूचित होते हैं। यह शान्त और दास्य भावपर है। द्वापरयुगका तारकब्रह्म नाम— “हरे मुरारे मधुकैटभारे गोपाल गोविन्द मुकुन्द शौरे। यज्ञेश नारायण कृष्ण विष्णो निराश्रयं मां जगदीश रक्ष।” १०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/१९-२१ ] इसमें जिन सब नामोंका उल्लेख है, उनसे निराश्रित व्यक्तियोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णको ही लक्ष्य किया गया है। इसमें शान्त, दास्य, गौरव-सख्य भावका प्राबल्य दिखायी देता है। कलियुगका तारकब्रह्म नाम— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” इसको ही सर्वापेक्षा अधिक ममता विश्रम्भभाव व्यञ्जक नाममन्त्र कहा जायेगा। इसमें कोई प्रार्थना नहीं है। ममतायुक्त सभी रसोंकी उद्दीपकता इसमें दिखायी देती है। भगवान्‌का किसी प्रकारका विक्रम अथवा मुक्तिदाता होनेका परिचय नहीं है। केवल आत्मा जो परमात्माके द्वारा किसी अनिर्वचनीय प्रेमसूत्रसे आकृष्ट होती है, वही मात्र इसमें व्यक्त हुआ है। इसलिये माधुर्याश्रित विश्रम्भ-सेवाप्रार्थीजनोके सम्बन्धमें यह नाम एकमात्र मन्त्रस्वरूप हुआ है। इसकी अनुक्षण आलोचना ही एक मात्र उपासना है। सारग्राही व्यक्तियोंकी पूजा, व्रत, अध्ययनादि समस्त पारमार्थिक अनुशीलन इसी नामके अनुगत हैं। इसमें देश-काल-पात्रका भी विचार नहीं है। घोर पापसे आच्छादित इस कलियुगमें मनुष्यको अल्पायु, मन्दबुद्धि और बलहीन देखकर कलिकल्मषहारी पतितपावन श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रने नवद्वीपधाममें श्रीगौराङ्गरूपमें अवतीर्ण होकर कलियुगमें एकमात्र आश्रय श्रीहरिनामको महापापियोंतक सभी श्रेणीके मनुष्योंके द्वार-द्वार जाकर प्रचार किया। उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करके नामरसका आस्वादन करके जीवोंको उसका आस्वादन करनेका उपदेश दिया। कलियुगमें जीव जिस प्रकार सर्वदोष-निधि हैं, हरिनाम उसी प्रकार सभी गुणोंके मूल हैं; जीव जिस प्रकार अत्यन्त शक्तिहीन हैं, हरिनाम उसी प्रकार सर्वशक्तिमान् हैं; जीव जिस प्रकार कठिन भव-महारोगसे पीड़ित हैं, हरिनाम भी उस रोगकी एकमात्र अमोघ औषधि हैं। इसलिये शास्त्रोंमें कलियुगके जीवोंके लिये युगधर्म एकमात्र हरिनामकी व्यवस्था की है। दोषोंकी निधि कलिमें एक महत्वपूर्ण गुण है, उससे शुकदेव गोस्वामीने महाराज परीक्षितसे कहा (भागवत १२/३/५१-५२)— “कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥५१॥ कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतोमखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥५२॥” अर्थात् “हे राजन्! कलियुगको दोषोंका सागर कहकर स्वीकार करनेपर भी उसमें एक प्रधान गुण है, जिसके द्वारा कलियुगको अन्यान्य युगोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि कलियुगमें भगवान् वासुदेवका गुण-कीर्तन करनेसे ही जीव संसार-बन्धनसे मुक्ति लाभकर परमपदको प्राप्त करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सत्ययुगमें प्राणायामादि योगानुष्ठानसे भगवान्‌का ध्यान करनेका जो फल प्राप्त होता था, त्रेतायुगमें जो बड़े भव्य आयोजनोंके द्वारा बहुकाल और बड़े परिश्रमके द्वारा साध्य ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंका सम्पादन करनेसे जो फल प्राप्त होता था तथा द्वापरमें विविध आयोजनोंमें अर्चनके द्वारा जो सिद्धि लाभ की जाती थी, कलियुगमें श्रीहरिके सङ्कीर्तनसे वही फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।” तीसरा अध्याय | १०७

[ ३/१९-२१ इस वर्तमान कलियुगमें परम दयालु पतितपावन श्रीगौराङ्गदेवके श्रीचरणयुगलका आश्रय करना प्रत्येक मनुष्यका कर्त्तव्य है। श्रीगौराङ्गदेवकी कृपाके बिना भवसागरसे पार होनेका अन्य कोई भी उपाय नहीं है। वे ही इस कलियुगके एकमात्र पतित उद्धारक अवतार हैं। उनमें जाति, धन, कुल, मान, विद्या, यश, स्त्री-पुरुष, अपाहिज, बहरे, अन्धे, विकलांग और आश्रमादिका कोई विचार नहीं है। जो एकान्त भावसे उनके अभय चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करेंगे, वे सहज ही इस दुस्तर असीमित भवसमुद्रको गोखुरके समान पार कर जायेंगे। ऐसे पतितपावन अवतार श्रीगौराङ्गमें जिनकी रति नहीं उत्पन्न होती, उनकी करोड़ों युगोंमें भी उद्धार प्राप्त करनेकी कोई आशा नहीं है। एक दिन कलिके जीवोंको उपदेश देनेके छलसे परम दयालु महाप्रभुने स्वरूप दामोदर और रायरामानन्दको सम्बोधन करते हुए कहा- “ओहे स्वरूपदामोदर ! ओहे रायरामानन्द ! कलियुगका धर्म एकमात्र हरिनाम सङ्कीर्तन है। हरि सङ्कीर्तनसे ही जीवकी सर्वसिद्धि होती है। जो सुमेधा-सम्पन्न हैं, वे हरि सङ्कीर्तन यज्ञके द्वारा श्रीकृष्णकी आराधना करते हैं।” श्रीचैतन्यचरितामृत (अन्त्यलीला २०वाँ अध्याय) - “हर्षे प्रभु कहेन, - “शुन स्वरूप-रामराय । नाम सङ्कीर्त्तन-कलौ परम उपाय ॥ ८ ॥ सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन । सेई त' सुमेधा पाय कृष्णेर चरण ॥ ९ ॥ नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ-नाश । सर्व-शुभोदय, कृष्णे प्रेमेर उल्लास ॥ ११ ॥ सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार नाशन । चित्तशुद्धि, सर्वभक्तिसाधन-उद्गम ॥ १३॥” साक्षात् अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दन होनेपर भी श्रीगौरहरिने हमारे जैसे कलिहत जीवोंकी जिस प्रकार हरिनाममें दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न हो, वैसा उपदेश देनेके लिये स्वयंमें जीव अभिमान करके निम्नलिखित श्लोक पाठ किया (शिक्षाष्टक द्वितीय श्लोक) - “नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति- स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः । एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनी नानुरागः ॥ ” “हे भगवन् ! आपके नाम ही जीवोंके लिये सर्वमङ्गलप्रद हैं, अतः जीवोंके कल्याण हेतु आप अपने राम, नारायण, कृष्ण, मुकुन्द, माधव, गोविन्द, दामोदर आदि अनेक नामोंके रूपमें नित्य प्रकाशित हैं। आपने उन नामोंमें उन-उन स्वरूपोंकी सर्वशक्तियोंको स्थापित किया है। अहैतुकी कृपा हेतु आपने उन नामोंके स्मरणमें सन्ध्या-वन्दना आदिकी भाँति किसी निर्दिष्टकाल आदिका विचार भी नहीं रखा है अर्थात् दिन-रात किसी भी समय भगवन्नामका स्मरण-कीर्त्तन किया जा सकता है- ऐसा विधान भी बना दिया है। हे प्रभो ! आपकी तो जीवोंपर ऐसी अहैतुकी कृपा है, तथापि मेरा तो नामापराधस्वरूप ऐसा दुर्देव है कि आपके ऐसे सर्वफलप्रद सुलभ नाममें भी अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ।” १०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/१९-२१ ] जिस प्रकार नाम लेनेसे प्रेम हृदयमें उपजेगा, उसका लक्षण इस श्लोकमें कह रहे हैं (शिक्षाष्टक तृतीय श्लोक)— “तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥” “सर्वपद-दलित अत्यन्त तुच्छ तृणसे भी अपनेको दीन-हीन नीच समझकर, वृक्षसे भी अधिक सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरोंको यथायोग्य मान देनेवाला बनकर सदा सर्वदा निरन्तर श्रीहरिनामसङ्कीर्तन करता रहे।” अन्यान्य कलियुगोंमें भी युगावतार कलियुग धर्म नाम-सङ्कीर्तनकी स्थापना करते हैं, परन्तु अवतारी श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित नाम-सङ्कीर्तनका उनसे वैशिष्ट्य है। सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीमुखसे निर्गत होनेके कारण श्रीहरिनाम भी सर्वशक्तिपूर्ण होकर जगत्‌में प्रचारित होता है। प्रेममय श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीमुखसे निःसृत नाम-सङ्कीर्तन ऐसा प्रेम-विमण्डित और अमृतसे भी सुमधुर है कि वह व्रजप्रेमतक प्रदान करता है। अन्य कलियुगोंका नाम-सङ्कीर्तन इस प्रकार प्रेम-मण्डित, मधुर, सर्वशक्तिसम्पन्न और प्रेम प्रदान करनेवाला नहीं है। चारि भाव-भक्ति दिया—प्रेमभक्ति श्रीकृष्णकी ह्लादिनी-शक्तिकी वृत्ति-विशेष है। श्रीकृष्णका सङ्कल्प यह है—उनके द्वारा प्रवर्तित श्रीनाम-सङ्कीर्तन करते-करते जीवका चित्त जब निर्मल होता है, तब वह ह्लादिनीको ग्रहण करनेके योग्य होता है। उस समय वे इस शुद्धचित्तमें अपनी ह्लादिनी शक्तिको निक्षेप करते हैं। भक्त-हृदयमें आकर यह ह्लादिनी प्रेमभक्तिके रूपमें परिणत होती है। यह प्रेमदानकी साधारण व्यवस्था है। किन्तु श्रीकृष्णचैतन्यरूपमें प्रकटकालमें अनेक समय, विशेषतः संन्यास ग्रहण करनेके बाद, महाप्रभुने श्रीमुखसे एक बार हरिनामका उपदेश देकर, किंवा केवलमात्र दर्शनदानसे असंख्य लोगोंको कृष्णप्रेम दान किया। इस लीलामें महाप्रभुने ऐसी अचिन्त्य महाशक्तिको प्रकट किया, जिसके प्रभावसे प्रेमदान और जीवके चित्तमें सञ्चित कल्मषादिका विनाश एक ही साथ सङ्घटित हुआ। तेजके घन विग्रह सूर्यदेवके आविर्भावसे उनके तेजरूप किरणजालके स्पर्शसे जैसे पृथ्वीका अन्धकार, चोर-डाकूका भय और शीतादि शीघ्र ही दूर हो जाते हैं और जीवोंके चित्तमें धर्म-कर्मादिके अनुष्ठानकी वासना जाग्रत हो जाती है तथा देहकी जड़ता दूर हो जाती है, उसी प्रकार प्रेमघन-विग्रह महाप्रभुके दर्शनसे उनके श्रीअङ्गसे निकली प्रेमकिरणपुञ्जके द्वारा ग्रथित और परिसिञ्चित होकर जीव भी एक अपूर्व प्रेमसम्पद लाभ करके कृतार्थ हुए और साथ-ही-साथ उनके पूर्व सञ्चित अपराध, दुर्वासनाजनित कल्मष भी अन्तर्हित हो गये तथा श्रीकृष्ण-सुखैकतात्पर्यमयी सेवावासनाने जाग्रत होकर उनके चित्तको समुज्ज्वल कर दिया। महाप्रभु जहाँ भी गये, वहाँ प्रेमकी बाढ़ ले आये और उस बाढ़में केवल मनुष्य ही नहीं अपितु पशु-पक्षी-कीट-पतङ्गादि, यहाँतक कि वृक्ष-गुल्म-तृणादि भी डूबकर कृतार्थ हो गये। झारिखण्डपथसे वृन्दावन जाते हुए महाप्रभुने अपने इस अपूर्व प्रभावको प्रकट किया था। आपनि करिमु भक्तभाव अङ्गीकारे—जीव स्वरूपसे श्रीकृष्णका दास है, इसलिये भक्तभाव अथवा सेवकभाव साधक-जीवका अपना भाव है। किन्तु श्रीकृष्ण स्वरूपतः सेव्य हैं, स्वरूपसे तीसरा अध्याय | १०९

[ ३/१९-२१ वे किसीके भी सेवक नहीं हैं; तभी भक्तभाव उनका स्वरूपानुबन्ध अथवा अपना भाव नहीं है, इसलिये उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करनेकी बात कही है। आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय-आचार्यके आदर्शके बिना कभी भी साधारण दुर्बल जीव शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है। कर्मराज्य हो अथवा भक्तिराज्य-दोनों क्षेत्रोंमें ही आदर्श आवश्यक है। जगत्में प्रत्येक व्यक्ति ही किसी-ना-किसीके आदर्शके द्वारा ज्ञात या अज्ञात रूपसे परिचालित होता है। कर्मी पुण्य-कार्य करनेके लिये जिस प्रकार किसी-ना-किसीको आदर्शके रूपमें अपने सम्मुख स्थापन करते हैं, उसी प्रकार पाप-कार्य करनेमें प्रवृत्त होनेपर भी किसी एक आदर्शको सम्मुख स्थापन करना होता है। पापी व्यक्ति भी आदर्शके बिना सुष्ठु-भावसे पापकर्म नहीं कर सकता। पृथ्वीपर स्थित वारवनिताएँ स्वर्गकी वेश्याओंको अपना आदर्श करके अधिकतर पाप कार्यमें लिप्त होती हैं। पृथ्वीपर राजा लोग देवेन्द्रके आदर्शको सामने स्थापित करते है। चार्वाक-पन्थियोंका जिस प्रकार आदर्श है, जैमिनीके अनुगतजनोंका भी उसी प्रकार आदर्श है। शिशु आदर्श प्राप्त नहीं करके कोई भी शिक्षा लाभ नहीं कर सकता-शिशु आदर्शका अनुकरण करके ही वाक्योंका उच्चारण तथा आहार-विहारादि करनेकी शिक्षा प्राप्त करता है। किसी नर शिशुका जन्मसे यदि बाघादि जन्तुके आदर्शमें पालन हो, तो उनके आदर्शको लेकर उसमें भी बाघके शावककी भाँति हिंसक स्वभाव, वैसे ही शब्दका अनुकरण और वैसी आहार-विहारकी प्रवृत्ति लक्षित होती है। शिशुको शब्दशास्त्रमें अथवा लिपिशिक्षामें शिक्षित करनेके लिये आदर्श-शब्द या आदर्श-लिपिकी आवश्यकता होती है; अन्यथा शिशु शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। जब हम तैरनेकी शिक्षा ग्रहण करते हैं, तब हमें जलमें उतरने अथवा नदीके प्रवाहमें बहुत दूर जानेसे भय लगता है, किन्तु यदि हम किसी व्यक्ति या अनेक व्यक्तियोंको इस इस कार्यमें प्रवृत्त अथवा हमारे लिये आदर्श स्थापित करते देखें, तब हममें साहसका सञ्चार होगा और हम धीरे-धीरे आदर्शके द्वारा उत्साह प्राप्तकर तैरनेकी विद्यामें सनिपुण हो सकते हैं। इस प्रकार इस जगत्में अनेक दृष्टान्त हम नित्य ही प्रत्यक्ष देखते हैं। अधोक्षजके सेवाराज्यमें भी आदर्शकी एकान्त आवश्यकता है, परन्तु वह अन्तरनिष्ठा अन्य प्रकारकी है; यही मात्र पार्थक्य है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने लिखा है-वैष्णवोंको 'जगद्-गुरु' कहा जाता है। वैष्णव जिस प्रकार उच्च पदपर स्थित हैं, उनका चरित्र भी उसी प्रकार उच्च और अनुकरण-योग्य होना आवश्यक है। वैष्णवोंका चरित्र अगर मन्द होगा, तो अन्यान्य दुर्बल जीव किस प्रकारसे सत्चरित्रकी शिक्षा ग्रहण करेंगे? महाप्रभुने भी हमें इसी प्रकार उपदेश दिया है (मध्यलीला १२/५१,५३)- “शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु यैछे ना लुकाय। संन्यासीर अल्प छिद्र सर्वलोके गाय॥५१॥ प्रभु कहे,-“पूर्ण यैछे दुग्धेर कलस। सुराबिन्दु-पाते केह ना करे परश॥५३॥” “श्वेत वस्त्रपर जैसे स्याहीका दाग छुपाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार संन्यासीके अल्प ११० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/१९-२३ ] दोषका भी सभी गान करते हैं। जैसे दूधके कलशमें एक बूँद मदिरा डाल दी जाय, तो उसको कोई स्पर्श नहीं करेगा।” साधु-शिक्षा दो प्रकारकी है अर्थात् वाक्यके द्वारा उपदेश देना और चरित्रके द्वारा दूसरोंको साधु-चरित्रकी शिक्षा देना। मध्यलीला (१२/११७)में महाप्रभुने और भी कहा है— “तुमि भाल करियाछ, शिखाह अन्येरे। एइमत भाल कर्म सेइ येन करे॥” “हे वैष्णवगण! तुम साधु-चरित्रके द्वारा दूसरोंको शिक्षा दो। तुमने अच्छा कार्य किया है, यह उत्तम बात है। किन्तु जगत्के जीव तुम्हारे भ्रातागण हैं, तुम्हारे असत् कार्यके द्वारा उनका पतन होगा। तुम्हारा कर्तव्य यह है—अपना साधु-चरित्र दिखलाकर उनके द्वारा अपने चरित्रका अनुकरण करवाओ। तुम यदि गृहत्यागी वैष्णव हो, तब त्यागी वैष्णवके सम्बन्धमें मैंने जो सब उपदेश दिये हैं, वैसा आचरण करके अन्य गृहत्यागी वैष्णवोंको शिक्षा दो। तुम यदि वैष्णवगृहस्थ हो, तब गृही वैष्णवोंको मैंने जो उपदेश दिये है और अपने चरित्रके द्वारा जो आदर्श दिखलाये हैं, उसका आचरण करो और अन्यान्य गृहस्थोंको शिक्षा दो। वैष्णवोंका चरित्र निष्पाप होता है। उसमें कोई भी अंश गोपन करने योग्य नहीं है। सरलता ही वैष्णवोंका जीवन है। अपने चरित्रको सर्वत्र प्रकाश करके शिक्षा दो। चरित्र शुद्ध ना होनेपर कोई भी ‘वैष्णव’ पदवी प्राप्त करनेके योग्य नहीं होता। तुम्हारा शुद्ध चरित्र है, इसलिये सदा अच्छा आचरण करते रहना। और उसकी जगत्को शिक्षा देना। सभी वैष्णव ही जगत्के गुरुपदको प्राप्त हुए हैं। केवल कथाके द्वारा शिक्षा देना यथेष्ठ नहीं है, चरित्रके द्वारा शिक्षा देना ही प्रधान कार्य है। देखो, मेरे लिये कोई भी विधि नहीं है। मैं स्वेच्छामय ईश्वर हूँ। जो इच्छा हो, मैं वही कर सकता हूँ। तथापि मैं कलिकालमें जीवोंके चरित्रको पवित्र करनेके लिये श्रीशचीदेवीके गर्भसे जन्मग्रहण करके शिक्षा दे रहा हूँ। मैंने बाल्यचरित्रके द्वारा बालकोंको शिक्षा दी है। गृहस्थ चरित्रके द्वारा गृहीजनोंको शिक्षा दी है। संन्यास चरित्रके द्वारा गृहत्यागी लोगोंको शिक्षा दी है। तुम लोग मेरे चरित्रका अनुकरण करते हुए अन्यान्य जीवोंको शिक्षा दो। जब भी इस विषयमें कुछ भी सन्देह हो, तब मेरे चरित्रकी आलोचना करके अपने चरित्रका गठन करो।” श्रीमन्महाप्रभुके इस उपदेशका सभी वैष्णवोंको पालन करना उचित है॥१९-२१॥ अवतारकाल:— श्रीमद्भगवद्गीता (४/७-८)— यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ २२॥ अवतारका कार्य :— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ २३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२-२३॥ तीसरा अध्याय | १११

[ ३/२२-२४ अमृतप्रवाह भाष्य- हे अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि होती है और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं इस जगत्में प्रकट होता हूँ। साधुओंके परित्राण (रक्षा), दुष्कृतिजनोंके विनाश और धर्मकी संस्थापनाके लिये मैं प्रत्येक युगमें प्रकट होता हूँ॥ २२-२३ ॥ अनुभाष्य-पूर्वकालकी बात बताते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे बोले कि मैंने इस योगशास्त्रको पहले सूर्यको दिया था और समयके प्रभावसे इसके नष्ट हो जानेपर मैं तुम्हें पुनः यह ज्ञान प्रदान कर रहा हूँ। अर्जुनके विश्वासको दृढ़ करनेके लिये भगवान् अपने आविर्भावके प्रसङ्गमें कह रहे हैं- हे भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः (हानिः) अधर्मस्य अभ्युत्थानं (वृद्धिः) भवति, तदा [अहं द्वे सोढुमशक्नुवन् तयोर्वैपरीत्यं कर्त्तुं] आत्मानं सृजामि। साधूनां (मदनुशीलनपराणां) परित्राणाय (सेवनविघ्ननिवृत्तये) दुष्कृतां (भक्तद्रोहिणां मदन्यैरवध्यानां रावण-कंस-केश्यादीनां) विनाशाय, धर्मसंस्थापनार्थाय च (परिचर्यासाङ्कीर्त्तनलक्षण-भगवत्सेवनपर-निर्मत्सरधर्मस्य सम्यगाचरणार्थाय प्रचारार्थाय च) युगे युगे (तत्तत्काले) सम्भवामि। श्लोक-भावानुवाद-हे भरतवंशी! जब-जब भी धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, मैं उसे सहन नहीं कर सकता, इसलिये उसे विपरीत (शोधन) करनेके लिये स्वयंको प्रकट करता हूँ। (मेरे अनुशीलन परायण) साधुओंके मेरी सेवामें आनेवाले विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये और (भक्तोंके द्रोही एवं मेरे अतिरिक्त किसी अन्यके द्वारा ना मारे जा सकनेवाले रावण, कंस, केशी आदि) असुरोंके विनाश तथा (परिचर्या और सङ्कीर्त्तनादि लक्षणोंसे युक्त भगवत्-सेवापरायण निर्मत्सर) धर्मके सम्यक् रूपसे आचार-प्रचारके लिये उस-उस उपयुक्त समयपर मैं स्वयंको प्रकट करता हूँ॥ २२-२३॥ अमृतानुकणिका- एक प्रश्न हो सकता है-भगवान्का निरपेक्ष होना स्वाभाविक है, किन्तु जब वे भक्तोंकी रक्षा करते हैं और असुरोंका संहार करते हैं, तब क्या वे पक्षपात करते नहीं दिखलायी देते? इसका समाधान यह है-भगवान्का असुरोंके प्रति जो निग्रह दिखलायी देता है, वह वास्तवमें उनका अनुग्रह ही है। भक्तविद्वेषी असुरोंके लिये भगवान्के शासनके अनुसार अनन्त नरक यातना भोगनेकी व्यवस्था है। भगवान् 'हतारिगतिदायक' (जिसका संहार करते हैं, उसे गति प्रदान करनेवाले) हैं, इसलिये उनके हाथों मारे जानेपर असुरोंको मुक्तिकी प्राप्ति होती है, और पापकर्मोंके फलस्वरूप उन्हें जो नरकादि भोग करना था, उससे उनका छुटकारा हो जाता है। इस प्रकारसे वे असुरोंपर भी अनुग्रह करते हैं॥ २२-२३ ॥ आचारके बिना प्रचारकी व्यर्थता और विषममय फल :- श्रीमद्भगवद्गीता (३/२४)— उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्त्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यदि मैं अपने कर्म-आचरणके द्वारा कर्म व्यवस्थाकी रक्षा नहीं करूँ, तो इन लोकोंका विनाश हो जायेगा और वर्णसङ्करका कारण होकर मैं ही प्रजाका विनाशक बन जाऊँगा॥ २४॥ ११२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/२४-२६ ] अनुभाष्य—अर्जुनके इस प्रकार कर्मके विषयमें सन्देहात्मक प्रश्नके उत्तरमें भगवान् श्रीकृष्णने संसारकी भोग-वासनासे रहित अपने द्वारा कर्मका आचरण करनेका उद्देश्य कहा— चेत् (यदि) अहं कर्म न कुर्याम्, इमे लोकाः उत्सीदेयुः (मां दृष्टान्तीकृत्य भ्रंशयेयुः), सङ्करस्य च कर्त्ता स्याम्, इमाः प्रजाः उपहन्यां (मलिनाः कुर्याम्)। श्लोक-भावानुवाद—यदि मैं कर्म ना करूँ, तो ये सभी लोग मेरे दृष्टान्तको मानकर भ्रष्ट हो जायेंगे, इस प्रकार मैं वर्णसङ्करका प्रवर्तक बनकर इन सारी प्रजाओंको भ्रष्ट करनेवाला होऊँगा ॥ २४॥ आचार्यका आचरण सभी लोगोंका आदर्श :— श्रीमद्भगवद्गीता (३/२१)— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते ॥ २५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रेष्ठ पुरुष जिस प्रकारका आचरण करते हैं, उसीका ही अन्य लोग अनुकरण करते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको 'प्रमाण' कहता है, सभी लोग उसीमें अनुरत होते हैं॥ २५ ॥ अनुभाष्य—श्रेष्ठः (महाजनः) यत् यत् आचरति, तत् तत् [कर्म] एव इतरः (अश्रेष्ठः) जनः [आचरति]; सः (श्रेष्ठः) यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः (इतरः जनः) तत् अनुवर्त्तते (अनुसरति)। श्लोक-भावानुवाद—श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, उस-उस कर्मका ही साधारण लोग आचरण करते हैं; वह श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको प्रमाणित करता है, अन्य व्यक्ति उसका अनुसरण करते हैं॥ २५॥ अमृताणुकणिका—उपरोक्त श्लोकमें बतलाया है कि भगवान् प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर क्यों कर्म करते हैं। साधारणतः श्रेष्ठ व्यक्ति जो करते हैं, अन्यान्य लोग उसका अनुकरण करते हैं। इसलिये भगवान् यदि जगत्में अवतीर्ण होकर कोई कर्म ना करें, तो उनका दृष्टान्त देखकर अन्य लोग भी धर्म-कर्मका अनुष्ठान नहीं करेंगे। इससे उनमें पाप-पुण्यका विचार नहीं रहेगा और स्वच्छन्द रूपसे स्त्री-पुरुष विवाहके बिना सङ्ग करके वर्णसङ्कर सन्तानें उत्पन्न करेंगे, जो अधर्ममें प्रवृत्त होंगी। इस प्रकार पाप कर्मोंमें रत होकर सभी लोग विनाशको (नरक और निम्न योनियोंको) प्राप्त होंगे॥ २४-२५॥ युगधर्म प्रचार—विष्णुका कार्य, किन्तु श्रीकृष्णके बिना अन्य विष्णुतत्त्वका कृष्णप्रेमदान असम्भव :— युगधर्म-प्रवर्त्तन हय अंश हैते। आमा बिना अन्ये नारे व्रजप्रेम दिते॥ २६ ॥ अनुवाद—युगधर्मका प्रवर्तन तो मेरे अंशोंके द्वारा हो सकता है, किन्तु व्रजप्रेमको मेरे अतिरिक्त और कोई भी नहीं दे सकता है॥ २६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नाम-सङ्कीर्तन रूप युगधर्म और व्रजप्रेम—इन दोनोंका प्रचार करनेके लिये मैं प्रकट होनेकी इच्छा कर रहा हूँ। यद्यपि युगधर्मके प्रचारका कार्य मेरे अंशावतारके द्वारा तीसरा अध्याय | ११३

[ ३/२६-२७ हो सकता है, तो भी मुझ पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त व्रजप्रेमको अन्य कोई भी प्रदान नहीं कर सकता ॥ २६ ॥ लघुभागवत अन्तर्गत पूर्वखण्डमें (५/३७) बिल्वमङ्गल-वाक्य :- सन्त्ववतारा बहवः पङ्कजनाभस्य सर्वतो-भद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ॥ २७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके अंश पद्मनाभके सर्वमङ्गलमय विभिन्न प्रकारके अवतार रहनेपर भी एकमात्र श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कौन हैं, जो लताओंको भी प्रेम प्रदान कर सकें? अर्थात् अन्य कोई नहीं कर सकता ॥ २७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् पङ्कजनाभ (जिनकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति हुई) के अनेक मङ्गलमय अवतार क्यों ना हुए हों, श्रीकृष्णके अतिरिक्त लता अर्थात् आश्रितजनोंका प्रेमदाता और कौन है ? ॥ २७ ॥ अनुभाष्य—पङ्कजनाभस्य (पद्मनाभस्य भगवतः) सर्वतः भद्राः (मङ्गलप्रदाः) बहवः अवताराः सन्तुः अपि कृष्णात् अन्यः को वा लतासु (तदाश्रितासु) प्रेमदः (प्रेमभक्तिदाता) भवति ? श्लोक-भावानुवाद—भगवान् पद्मनाभके मङ्गल प्रदान करनेवाले बहुतसे अवतार हैं, तो भी श्रीकृष्णके अतिरिक्त कौन अपने आश्रित भक्तोंको प्रेमभक्ति देनेवाले हैं? ॥ २७ ॥ अमृतानुकणिका—स्वयं भगवान्के अनेक अवतार हैं और ये समस्त अवतार सभी प्रकारसे जीवको मङ्गलदान भी कर सकते हैं, किन्तु स्वयंरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य कोई भी भगवत्-स्वरूप प्रेमदान करनेमें समर्थ नहीं हैं। श्रीकृष्णने केवल मनुष्योंको ही प्रेमदान किया, ऐसा नहीं है, उन्होंने पशु, पक्षी, कीट-पतङ्ग, यहाँ तक कि लतादिको भी प्रेमदान किया। श्रीमद्भागवतमें इसका प्रमाण पाया जाता है। श्रीकृष्णके असमोर्द्ध रूप-माधुर्यका दर्शन करके पशु, पक्षी, वृक्षादि सभी प्रेममें पुलकित हो गये (भागवत १०/२९/४०)— “का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतवेणुगीत सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यविभ्रन्॥” अर्थात् “हे कृष्ण! तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी रमणी है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तानको सुनकर तथा त्रिभुवनके सौभाग्यरूप तुम्हारे इस त्रिभङ्ग-ललित श्यामसुन्दर रूपको अपने नेत्रोंसे निहारकर सर्वथा मोहित हो अपनी आर्य-मर्यादासे विचलित ना हो जाय—नारीधर्म और लोक लज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त ना हो जाये ? स्त्रियोंकी बात ही क्या है, तुम्हारा त्रिभुवन-मोहन रूप तथा मुरली सङ्गीत ऐसा मोहक है कि इसे देख-सुनकर गौएँ, पक्षी, वृक्ष और मृगादि प्राणी भी परमानन्दसे पुलकित हो जाते हैं।” प्रश्न हो सकता है—श्रीरामचन्द्र जब वनमें गये, तब उनके लिये वृक्षादि भी रोदन कर रहे थे। इससे यह समझा जाता है कि श्रीरामचन्द्रने भी वृक्षोंको प्रेमदान किया था। यह तो सत्य ११४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

है, किन्तु वह तो केवल उनके विच्छेद-दुःखसे कातर होकर श्रीरामचन्द्रके वनगमनके समय था। सब समय, विशेषतः श्रीरामचन्द्रका सीताजीके साथ संयोगके समय वृक्षादिका इस प्रकार आचरण नहीं देखा जाता। परन्तु श्रीकृष्णके साथ गोपियोंके मिलन-समयमें भी प्रतिदिन ही पशु-पक्षी-वृक्ष-लता आदिके देहमें प्रेमविकार दिखलायी देते हैं॥ २७॥ ताहाते आपन भक्तगण करि' सङ्गे। पृथिवीते अवतरि' करिमु नाना रङ्गे॥ २८॥ एत भावि' कलिकाले प्रथम सन्ध्याय। अवतीर्ण हैला कृष्ण आपनि नदीयाय ॥ २९॥ चैतन्यसिंहेर नवद्वीपे अवतार। सिंहग्रीव, सिंहवीर्य, सिंहेर हुङ्कार ॥ ३०॥ सेइ सिंह वसुक जीवेर हृदय-कन्दरे। कल्मष-द्विरद नाशे याँहार हुङ्कारे ॥ ३१॥ अनुवाद-मैं अपने परिकरोंको साथ लेकर पृथ्वीपर अवतरित होकर विभिन्न प्रकारकी लीलाओंको प्रकाश करूँगा- इस प्रकार श्रीकृष्णने यह निर्णय लिया और वे श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें कलियुगकी प्रथम संध्यामें नदीयामें अवतीर्ण हुए। सिंहकी भाँति जिनकी बलिष्ठ गर्दन है, सिंहकी भाँति जिनकी शक्ति और प्रभाव है तथा सिंहकी भाँति जिनकी गम्भीर गर्जन है, ऐसे श्रीचैतन्य महाप्रभु रूप सिंहने नवद्वीपमें अवतार लिया। जैसे वनमें सिंहकी गर्जनसे हाथी पलायन करते हैं, वैसे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुरूपी सिंहकी गर्जनासे हृदयमें सभी पापराशियोंका नाश हो जाता है। वे (परम दयालु) श्रीचैतन्य महाप्रभुरूप सिंह जीवोंके हृदयरूपी गुफामें विराजमान हों ॥ २८-३१॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'कल्मष' - पाप, 'द्विरद' - हस्ती (हाथी) ॥ ३१॥ अनुभाष्य- [“क्रमात् कृतयुगादीनां षष्ठांशः संध्ययोः स्वकः"- श्रीसूर्यसिद्धान्त अन्तर्गत मध्यमाधिकारमें १७वाँ श्लोक] युगके आरम्भमें प्रथम भाग और युगके समाप्त होनेसे पूर्व अन्तिम भाग, इन दोनों भागोंको 'संध्या' कहा जाता है और इनका कुल समय युगके छठे भागके बराबर होता है। युगकी प्रथम और अन्तिम संध्या, दोनोंका परिमाण युगके कालका बारहवाँ भाग होता है। इसलिये कलिकालकी प्रथम संध्याका परिमाण छत्तीस हजार वर्ष है। श्रीगौरसुन्दर कलिकालके ४,५८६ वर्ष व्यतीत होनेपर प्रथम संध्यामें श्रीमायापुर नवद्वीपमें जन्म ग्रहणकर प्रकट होते हैं॥ २९॥ अभिधेयाधिदेवताका नाम "विश्वम्भर' है :- प्रथमलीलाय ताँर विश्वम्भर नाम। भक्तिरसे भरिल, धरिल भूतग्राम ॥ ३२॥ अनुवाद- प्रथम लीला अर्थात् आदिलीलामें उनका नाम 'विश्वम्भर' था। उन्होंने भक्तिरसके द्वारा समस्त जीवोंका पोषण किया और उन्हें इस (भक्तिरस) में स्थिर रखा॥ ३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'भूतग्राम' - जीवसमूह ॥ ३२ ॥

[ ३/३३-३४ डुभृञ् धातुर् अर्थ—पोषण, धारण। पुषिल, धरिल प्रेम दिया त्रिभुवन॥३३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘विश्वम्भर’ शब्द ‘डुभृञ्’ धातुसे बनता है। उस धातुका अर्थ पोषण और धारण करना है। महाप्रभुने अपना प्रेम देकर त्रिभुवनका पोषण किया और उसे धारण किया॥ ३३॥ अमृतानुक्रमणिका—पहले वराहावतारमें पृथ्वी जलमग्न होनेपर भगवन्नारायणने उसका उद्धारकर विश्वपालन किया, इसलिये भगवान्का नाम ‘विश्वम्भर’ हुआ। हयग्रीव अवतारके पूर्व जलमग्न पृथ्वीमें अधोक्षज वस्तुका परिचय विलुप्त होकर अक्षजज्ञानके समुद्रमें वेदशास्त्र डूब गये, तब भगवान् हयग्रीवने मधु और कैटभकी अक्षजज्ञानकी पहचान (स्मृतिचिह्न) और निसर्गवादका संहार करके अवतार-विचार वेदतात्पर्यरूपसे प्रचार किया था। तब भी उनका नाम ‘विश्वम्भर’ हुआ था। अनेक बार असुरोंके द्वारा देव-मानवादि सताये जानेपर नारायणके विभिन्न प्रकाशसमूह प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर विश्वकी रक्षा करते हैं, उन-उन अवतारोंका नाम भी ‘विश्वम्भर’ होता है। इसलिये महाप्रभुका नाम भी ‘विश्वम्भर’ रखना सङ्गत था। ये गौर-विश्वम्भर विष्णुके विभिन्न अवतारोंके दीपस्वरूप हैं। उनकी जन्मपत्रीसे भी कालविचारसे यह जाना जाता है कि वे स्वयंरूप और सभी विष्णुतत्त्वोंकी मूल वस्तु हैं। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है, इसलिये भक्तिरस ही उसका एकमात्र जीविका है। किन्तु अनादि-बहिर्मुख जीव श्रीकृष्णको भूलकर मायाके सुख-दुःखमें निमग्न हो गया है। श्रीकृष्ण-सेवाजनित भक्तिरसके अभावमें उसका स्वरूप क्षीण हो गया है। परम दयालु श्रीगौरसुन्दर उसकी बहिर्मुखता दूर करके उसको भक्तिरस दान करते हैं और उस भक्तिरसको पानकर उसका चिन्मय स्वरूप परिपुष्ट हो जाता है। इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर जीवोंका पोषण करते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु उसे भक्तिरस प्रदानकर जिस अवस्थामें लाते हैं, उसी अवस्थामें धारणकर उसे स्थिर रखते हैं और वह उस अवस्थासे च्युत नहीं होता अर्थात् वह पुनः मायिक सुखके लिये ललायित नहीं होता। इस प्रकार महाप्रभु जीवोंको धारण करते हैं। इस प्रकार भक्तिरसके द्वारा जीवोंका पोषण और उन्हें धारण करनेके कारण महाप्रभुका नाम हुआ है—‘विश्वम्भर’॥३३॥ सम्बन्धाधिदेवताका नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ है :- शेषलीलाय धरे नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’। श्रीकृष्ण जानाये सब विश्व कैल धन्य॥३४॥ अनुवाद—शेषलीलामें उनका नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ हुआ। इस लीलामें उन्होंने श्रीकृष्णके नाम-गुण-रूप-लीला और उनके गूढ़ रहस्योंको समस्त जगत्में प्रकाशित करके विश्वको धन्य किया॥ ३४॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने संन्यास ग्रहणके बाद चौबीस वर्षतक जो लीलाएँ की, उन्हें शेषलीला कहा जाता है। श्रीविष्णुस्वामि-सम्प्रदायमें दशनामी और अष्टोत्तरशतनामी त्रिदण्डि वैदिक-संन्यासी ११६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

श्रीशङ्कराचार्यके समयसे बहुत पहले वर्तमान थे, तो भी स्वयंको निर्विशेषवादी वैदान्तिक कहनेवाले शङ्कराचार्यके प्रकट होनेपर भारतमें पञ्चोपासक-समाज पुनर्गठित हुआ। श्रीमन्महाप्रभुने श्रीशङ्कराचार्य-सम्प्रदायमें दशनामी एकदण्डि-संन्यासकी प्रथाके अनुसार वैदिक संन्यास ग्रहण किया। आर्यावर्त्तमें वैदिकाभास अर्थात् स्वयंको वेदानुग कहनेवाले बहुतसे आर्यसमाज शङ्कराचार्यके अनुगामी हैं और शाङ्करसम्प्रदायके शासनानुसार पञ्चोपासक हैं। “तीर्थाश्रमवनारण्यगिरिपर्वतसागराः। सरस्वती भारती च पुरी नामानि वै दशः॥” दशनामी संन्यासियोंके नाम इस प्रकार हैं—“तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती और पुरी।” प्रत्येकके संन्यासको, स्थानको और ब्रह्मचारीकी उपाधिको यथाक्रम लिखा हुआ है (मञ्जुषा दूसरी संख्या, पृष्ठ १०४-१०७ द्रष्टव्य है)। संन्यासकी उपाधि-तीर्थ और आश्रम; स्थान-द्वारका; ब्रह्मचारी नाम-स्वरूप। संन्यासकी उपाधि-वन और अरण्य; स्थान-पुरुषोत्तम (जगन्नाथ पुरी); ब्रह्मचारी नाम-प्रकाश। संन्यासकी उपाधि-गिरि, पर्वत और सागर; स्थान-बदरिकाश्रम; ब्रह्मचारी नाम-आनन्द। संन्यासकी उपाधि-सरस्वती, भारती और पुरी; स्थान-शृङ्गेरी; ब्रह्मचारीनाम-चैतन्य। श्रीशङ्कराचार्यने सम्पूर्ण भारतमें (पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण प्रदेशमें) चार मठ स्थापित करके अपने चार शिष्योंको उनका मठाधीश नियुक्त किया। इस चार मूलमठोंके अधीन असंख्य शाखामठोंका विस्तार हुआ। श्रीशङ्कराचार्यने चारों मठोंमें समान विचारधाराका निर्देश किया था, परन्तु अनेक क्षेत्रोंमें इसका विपर्यय दिखायी देता है। इन चार मठोंमें आनन्दवार, भोगवार, कीटवार और भूमिवार चार प्रकारके सम्प्रदाय हैं। समयके प्रभावसे इन सम्प्रदायोंकी धारणामें भी परिवर्तन दिखायी देता है। शङ्कर-सम्प्रदायके चार महावाक्योंके भी अलग-अलग मठके अनुसार विभाग हैं। संन्यास ग्रहणसे पहले मठाधीश संन्यासी गुरुके पास जाकर ब्रह्मचारी बनना होता है। जिस प्रकारके वे संन्यासी होते हैं, उसीके अनुसार 'ब्रह्मचारी' नाम देते हैं। यह प्रथा आज भी सम्प्रदायमें विशेषरूपसे चली आ रही है। केशव भारतीसे संन्यास ग्रहण करनेपर श्रीमन्महाप्रभुका ब्रह्मचारी नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' हुआ था। संन्यास ग्रहण करनेके बाद भी भगवान्ने अपने ब्रह्मचारी नामका ही प्रचार किया। उनके द्वारा संन्यासी नाम 'भारती' ग्रहण करके भी उस नामसे अपना परिचय देनेकी बात उनके किसी भी लीलालेखकने नहीं लिखी है। शङ्कर-सम्प्रदायमें संन्यास-नामके साथ स्वयंमें ईश्वर होनेका अभिमान (जीव ब्रह्म ही है) जुड़ा है, ऐसा जानकर उस प्रकारके व्यवहारका श्रीमन्महाप्रभुने आदर नहीं किया। 'ब्रह्मचारी' नाममें गुरुदास्यका अभिमान संयुक्त होनेके कारण वह भक्तिके प्रतिकूल नहीं है। महाप्रभुने दण्ड और कमण्डलु आदि संन्यासके चिह्नोंको ग्रहण किया था, ऐसा उल्लेख है॥३४॥ ताँर युगावतार जानि' गर्ग महाशय। कृष्णेर नामकरणे करियाछे निर्णय॥ ३५॥ अनुवाद-गर्गाचार्यजीने श्रीकृष्णचैतन्यको कलियुगके युगावतार रूपमें जानकर श्रीकृष्णके नामकरणके समय यह भविष्यवाणी की थी॥ ३५॥

[ ३/३५-३८ अमृतप्रवाह भाष्य—गर्गाचार्यजीने श्रीकृष्णचैतन्यको कलियुगका अवतार जानकर निम्नलिखित श्लोकमें उनके वर्णका निरूपण किया है॥ ३५॥ चारयुगोंमें चार वर्ण अवतार :- श्रीमद्भागवत (१०/८/१७)— आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ ३६॥ अनुवाद—आपका यह पुत्र प्रत्येक युगमें श्रीविग्रह धारण अर्थात् अवतार ग्रहण करता है। यह सत्ययुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें रक्तवर्ण, कलिमें पीतवर्ण और अब द्वापरमें श्यामवर्ण है। अतः इसका नाम कृष्ण होगा॥ ३६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम्हारा यह बालक अन्य तीन युगोंमें शुक्ल, रक्त और पीतवर्ण धारण करता है। अभी द्वापर युगमें इसने कृष्णवर्ण धारण किया है॥ ३६॥ अनुभाष्य—गर्गाचार्यजी श्रीनन्दमहाराजको श्रीकृष्णके नामकरणके समय उनका वर्णन करते हुए उनके अन्य-अन्य अवतारों और उनके स्वयं अवतारी होनेकी बात कह रहे हैं— अनुयुगं (युगोचितं) तनूर्गृह्णतः अस्य (तव पुत्रस्य) शुक्लः रक्तः तथा (इति भविष्यन्निर्देशवाक्येन वैवस्वतमन्वन्तरस्याष्टाविंशमहायुगीयकलियुगस्य आदिसन्ध्यायां) पीतः (पीतवर्णः भविष्यति) त्रयो वर्णाः आसन्। इदानीं हि कृष्णतां गतः (प्राप्तः)। श्लोक-भावानुवाद—आपका पुत्र युगके अनुरूप श्रीविग्रह धारण करता है। (अन्य युगोंमें) आपके पुत्रके शुक्ल, रक्त और पीत [यह भविष्यवाणीरूप वाक्य है कि वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें महायुगके कलियुगकी प्रथम संध्यामें यह पीतवर्णमें आयेगा], ये तीन वर्ण होते हैं और अभी इसने कृष्णवर्णको प्राप्त किया है॥ ३६॥ शुक्ल, रक्त, पीतवर्ण—एइ तिन द्युति। सत्य-त्रेता-कलिकाले धरेन श्रीपति॥ ३७॥ इदानीं द्वापरे तिँहो हैला कृष्णवर्ण। एइ सब शास्त्रागम-पुराणेर मर्म॥ ३८॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण शुक्ल, रक्त और पीत, इन तीन वर्णोंको क्रमशः सत्य, त्रेता और कलियुगमें धारण करते हैं। अब इस द्वापरयुगमें वे कृष्णवर्ण हुए हैं, यह सभी शास्त्रों, आगम और पुराणोंका सार है॥ ३७-३८॥ अमृतानुकणिका—नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम करभाजन चारों युगोंमें भगवान्‌के वर्ण और विग्रहके रूपका वर्णन करते हुए कह रहे हैं (श्रीमद्भागवत ११/५/२१,२४)— “कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बरः। कृष्णाजिनोपवीताक्षन् बिभ्रद् दण्डकमण्डलू॥” अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान्‌के श्रीविग्रहका रङ्ग श्वेत होता है। उनके चार भुजाएँ और सिरपर जटा होती है तथा वे वल्कलका ही वस्त्र पहनते हैं। वे काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं। उनका ब्रह्मचारी वेश होता है।” ११८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/३७-४० ]

“त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः। हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः ॥” अर्थात् “त्रेतायुगमें भगवान्‌का श्रीविग्रह लाल रङ्गका होता है। उनके चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं।”॥ ३७-३८॥ श्रीमद्भागवत (११/५/२७)— द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः। श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः॥ ३९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बर और वंशी आदि निज-आयुधधारी, श्रीवत्सादि चिह्नोंसे युक्त-इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ ३९॥ अनुभाष्य—‘किस कालमें किस रूपमें भगवान्‌का अवतार होता है', विदेहराज निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे श्रीकरभाजन सत्य और त्रेतायुगके अवतारोंका वर्णन करनेके बाद द्वापरके अवतारके सम्बन्धमें वर्णन कर रहे हैं,- द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासाः (पीतः वासो यस्य सः) निजायुधः (निजानि आयुधानि गदाचक्रादीनि यस्य सः) श्रीवत्सादिभिः अङ्कैः (आङ्गिकैश्चिह्नैः) लक्षणैः (बाह्यैः कौस्तुभादिभिश्च) उपलक्षितः। श्लोक-भावानुवाद—द्वापरमें भगवान् श्यामवर्णके, जिनके पीत वस्त्र हैं, गदा-चक्रादि निज अस्त्र हैं, अङ्गोंमें श्रीवत्सादि चिह्न हैं तथा बाहर कौस्तुभ आदि धारण करते हैं, वे इन लक्षणोंके साथ प्रकट होते हैं॥ ३९॥ कलियुगावतारका लक्षण :- कलियुगे युगधर्म—नामेर प्रचार। तथि लागि' पीतवर्ण चैतन्यावतार ॥४०॥ अनुवाद—कलियुगमें नाम-सङ्कीर्तन युगधर्म है और पीतवर्ण धारणकर श्रीचैतन्यमहाप्रभु इस युगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४०॥ अनुभाष्य—श्रीमध्वाचार्यने मुण्डकोपनिषद्के भाष्यमें श्रीनारायण-संहितासे प्रमाण लिखा है— “द्वापरियैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः ॥” अर्थात् “द्वापर युगमें भगवान् विष्णुकी पूजा नारद पञ्चरात्रादि शास्त्रोंकी विधिके अनुसार करनी चाहिये। कलियुगमें केवल नामके द्वारा श्रीहरिकी पूजा होती है।” कलिसन्तरणोपनिषद्‌में भी लिखा है— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते ॥” अर्थात् “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे;

तीसरा अध्याय | ११९

[ ३/४०-४३ ये सोलह नाम कलिके समस्त दोषोंका नाश करनेवाले हैं और इससे श्रेष्ठ उपाय सभी शास्त्रोंमें देखनेपर कहीं भी दिखलायी नहीं देता॥”४०॥ अमृतानुकणिका— “युगधर्म प्रवर्त्तन हय अंश हैते। आमा बिना अन्ये नारे व्रजप्रेम दिते॥” कलियुगमें हरिकीर्त्तन ही युगधर्म है। उसे श्रीगौरसुन्दरके अंशावतार ही स्थापित करते हैं, किन्तु श्वेतवराहकल्पमें वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें कलियुगमें श्रीनामप्रचार-रूप युगधर्मकी स्थापनाके उद्देश्यसे, किन्तु मुख्यतः व्रजप्रेम देनेके लिये जो अवतीर्ण होते हैं, वे ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ हैं। यहाँपर ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ कहकर निर्देश करनेका कारण यह है कि साधारणतः कलियुगमें जो युगावतार हैं, उनका नाम और वर्ण ‘कृष्ण’ होता है, किन्तु विशेष कलियुगमें जो श्रीचैतन्यावतार हैं, वे ही केवल पीतवर्ण हैं। लघुभागवतामृतमें युगावतारके प्रसङ्गमें उल्लेख किया गया है,– “कथ्यते वर्णनामाभ्यां शुक्लः सत्ययुगे हरिः। रक्तः श्यामः क्रमात् कृष्णस्त्रेतायां द्वापरे कलौ॥” अर्थात् “वर्ण और नामके द्वारा हरि सत्ययुगमें शुक्ल, त्रेतायुगमें रक्त, द्वापरयुगमें श्याम और कलियुगमें कृष्ण कहे जाते हैं।” श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु इसकी टीकाम्रें कहते हैं,– “सामान्यतः सभी कलियुगोंमें ही कृष्णवर्ण और उस नामके युगावतार—‘कृष्णः कलियुगे विभु’ इस हरिवंश प्रमाणके अनुसार हैं। इसलिये जिस कलियुगमें स्वर्णगौर-वर्ण श्रीकृष्णचैतन्य अवतीर्ण होते हैं, उस कलियुगमें वे ‘कृष्ण’ रूप युगावतार उनके भीतर समाहित होते हैं, यह समझना होगा।” श्रीमद्भागवतमें युगावतारके प्रसङ्गमें कहा गया है— “कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णम्” (भाः ११/५/३२)। इस श्लोककी व्याख्यामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं,— “सभी कलियुगोंके लिये ‘कृष्णवर्ण’ अर्थात् उनके अवतारोंकी देह कृष्णवर्णकी होती है, परन्तु इस विशेष कलियुगमें उनसे पार्थक्य दिखानेके लिये कहा गया है ‘त्विषाऽकृष्णं’ अर्थात् इन्द्रनीलमणिकी भाँति जो उज्ज्वल हैं। एक विशेष कलियुगके लिये कृष्णवर्ण, किन्तु कान्तिमें ‘अकृष्ण’ कहनेसे पीतवर्ण समझना चाहिये अर्थात् अन्तरमें कृष्णवर्ण किन्तु बाहर गौरवर्ण हैं, यह अर्थ है।”॥४०॥ तप्तहेम-सम कान्ति, प्रकाण्ड शरीर। नवमेघ-जिनि कण्ठध्वनि ये गम्भीर॥४१॥ अनुवाद—उनके दीर्घ तनु (शरीर) की कान्ति तपे हुए स्वर्णकी भाँति है और उनकी गम्भीर कण्ठध्वनि नवमेघोंकी मन्द-मन्द गर्जनको भी परास्त करनेवाली है॥४१॥ दैर्घ्य-विस्तारे येइ आपनार हात। चारि हस्त हय ‘महापुरुष’ विख्यात॥४२॥ ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ हय ताँर नाम। न्यग्रोधपरिमण्डल-तनु चैतन्य गुणधाम॥४३॥ अनुवाद—जिनके शरीरकी लम्बाई (पदतलसे शीशके ऊपरी भाग तक) और चौड़ाई (दोनों हाथ फैलाकर दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंके नखके सिरोंके बीच) अपने हाथसे मापकर चार हाथके बराबर होती है, वे ‘महापुरुष’ होते हैं। उन्हें ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ कहा जाता है। चैतन्य महाप्रभु जो सभी सद्गुणोंके धाम हैं, उनका शरीर न्यग्रोधपरिमण्डलका था॥४२-४३॥ १२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/४२-४९ ] अमृतप्रवाह भाष्य-जो अपने हाथसे मापकर चार हाथ लम्बे और चौड़े होते हैं, वे महापुरुष कहलाते हैं और उनका नाम 'न्यग्रोधपरिधिमण्डल' होता है॥४२-४३॥ अनुभाष्य-'न्यग्रोधपरिधिमण्डल'–जो अपने हाथके मापसे चार हाथ लम्बे और चार हाथ चौड़े अर्थात् जिनकी गोलाकार परिधि चार हाथकी होती है, वे 'महापुरुष' होते हैं। जिन्होंने सभी प्राणियोंको अपने अधीनकर अपनी मायाके द्वारा बद्ध किया है, इस प्रकार वे पूर्ण चतुर्व्यूहयुक्त विष्णु हैं॥४२-४३॥ आजानुलम्बित-भुज कमललोचन। तिलफुल-जिनि नासा, सुधांशु-वदन॥४४॥ शान्त, दान्त, कृष्णभक्ति-निष्ठापरायण। भक्तवत्सल, सुशील, सर्वभूते सम॥४५॥ चन्दनेर अङ्गद-बाला, चन्दन-भूषण। नृत्यकाले परि' करेन कृष्णसङ्कीर्त्तन॥४६॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी घुटनोंतक लम्बी भुजाएँ हैं, उनके नेत्र कमलपुष्पके समान हैं, तिलफूलसे अधिक सुन्दर उनकी नासिका है और उनका मुखमण्डल चन्द्रकी भाँति सुन्दर है। वे शान्त, जितेन्द्रिय, कृष्णभक्तिमें निष्ठापरायण, भक्तोंके प्रति विशेष स्नेहशील, सुशील और सभी प्राणियोंमें समदर्शी हैं। श्रीकृष्णसङ्कीर्तनके लिये विशेषरूपसे वे चन्दनके बाजूबन्द और कङ्कन पहनते हैं और अपने अङ्गोंमें चन्दनके तिलक धारण करते हैं॥४४-४६॥ एइ सब गुण लञा मुनि वैशम्पायन। सहस्रनामे कैल ताँर नाम-गणन॥४७॥ अनुवाद-इन सभी गुणोंको देखकर मुनि वैशम्पायनने विष्णु सहस्रनाममें उनके नामोंका उल्लेख किया है॥४७॥ अनुभाष्य-महाभारतके अन्तर्गत दानधर्मके १४९वें अध्यायमें विष्णुके सहस्रनाम दिये गये हैं। श्रीशङ्कराचार्य, श्रीबलदेव विद्याभूषण और अन्य-अन्य वैष्णवाचार्योंने महाभारतपर अपने-अपने भाष्य लिखे हैं॥४७॥ दुइ लीला चैतन्येर—आदि आर शेष। दुइ लीलाय चारि चारि नाम विशेष॥४८॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी 'आदिलीला' और 'शेषलीला' नामक दो लीलाएँ हैं। इन दोनों लीलाओंमें उनके चार-चार विशेष नाम हैं॥४८॥ अनुभाष्य-'आदि'-गृहस्थलीला (प्रथम चौबीस वर्ष) और 'शेष'-संन्यासलीला (अन्तिम चौबीस वर्ष) है। इसी अध्यायके पयार संख्या ३२-३४ द्रष्टव्य है। 'चारि चारि नाम'–अगले श्लोक संख्या ४९ में वर्णित है॥४८॥ महाभारतमें दान-धर्ममें (१२७ अ.) सहस्रनाममें (९२, ७५)– सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठाशान्तिपरायणः॥४९॥ तीसरा अध्याय | १२१