श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/१७-१९ ] मुक्तिको ब्रह्म-सायुज्य कहते हैं। और भगवान्के किसी भी एक सविशेष स्वरूप (नारायण-नृसिंहादिके) साथ जो सायुज्य प्राप्त करते हैं, उनके सायुज्यको ईश्वर-सायुज्य कहते हैं। जो सायुज्य-मुक्ति प्राप्त करते हैं, वे ब्रह्मके अथवा ईश्वरके आनन्दमें ही निमग्न रहते हैं। इसलिये उनके स्वतन्त्र अस्तित्वका ज्ञान अथवा स्वरूपानुबन्धि कर्त्तव्य-भगवत्-सेवाका अनुसन्धान भी उनके चित्तमें प्राधान्य लाभ नहीं कर पाता; अथवा साधारणतः उदित भी नहीं हो पाता। किन्तु जो भक्त हैं, वे अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रखकर भगवान्की सेवाकी ही कामना करते हैं। इसलिये कोई भी भक्त सायुज्य-मुक्तिकी कामना नहीं करते हैं, भगवान्के देनेकी इच्छा होनेपर भी उसे ग्रहण नहीं करते। साधारणतः वैकुण्ठमें विष्णुके समान ऐश्वर्य प्राप्तिको 'सार्टि' मुक्ति कहा जाता है। किन्तु पार्षदोंका ऐश्वर्य भगवान्के समान कभी भी नहीं हो सकता। श्रीसनातन गोस्वामीने श्रीबृहद्भागवतामृतम् (२/४/१९९) की टीकामें लिखा है— “एवं पार्षदेभ्यस्तेभ्योऽपि सकाशाद्भगवत्ताभिधेय-स्वाभाविक-परमैश्वर्यविशेषापेक्षया, तथानन्यसाधारण- मधुरमधुरविचित्र-सौन्दर्यादि-महिमविशेष-दृष्ट्या भगवतो महान् विशेषः सिध्यत्येव; अन्यथा सदा परमभावेन तेषां तस्मिन् विचित्रभजनरसानुपपत्तेरिति दिक्।” अर्थात् “सच्चिदानन्दघन रूपमें पार्षदों और भगवान्में समानता रहनेपर भी पार्षदोंकी तुलनामें श्रीकृष्णकी भगवत्ताका प्रतिपादन करनेवाले स्वाभाविक परम-ऐश्वर्य विशेष तथा अनन्य (अर्थात् जिस सौन्दर्य-माधुर्यका एकमात्र स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त भगवान्के अन्य किसी स्वरूपमें प्रकाश नहीं है) और असाधारण, मधुरसे भी मधुर नाना-प्रकारके सौन्दर्य आदि विशेष महिमाओंको देखकर श्रीकृष्णकी महान विशेषता स्वतः ही सिद्ध होती है। अन्यथा उनके पार्षदोंके द्वारा सर्वदा ही परम भावोंके साथ श्रीकृष्णके नाना-प्रकारके भजनरसरूप सुखका अनुभव करना सम्भव नहीं होता।” उपर्युक्त सालोक्यादि जो चार प्रकारकी मुक्तियाँ हैं, उन्हें प्राप्तकर मुक्तजीव पार्षद देह धारणकर वैकुण्ठमें वास करते हैं। उनको उपास्यदेवके धामके स्वरूपगत धर्मके कारण वहाँके सुख और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। सालोक्यादि चार मुक्तियाँ सुखैश्वर्योत्तरा और प्रेम-सेवोत्तरा दो प्रकारकी होती हैं (भःरःसिः पूर्व विभाग २/५६)। जिनके चित्तमें अपने उपास्यके धामके सुख और ऐश्वर्यको प्राप्त करनेकी वासना ही प्रधानरूपमें रहती है, उनकी मुक्तिको 'सुखैश्वर्योत्तरा' कहा गया है। जिनके चित्तमें प्रेमके स्वभाववशतः उपास्यकी सेवा करनेकी वासनाकी प्रधानता रहती है, उनकी मुक्तिको 'प्रेम-सेवोत्तरा' कहा जाता है। वैकुण्ठकी जो प्रेम-सेवा है, वह केवल ऐश्वर्य-ज्ञान मिश्रित प्रेममयी-सेवा होती है। वह उपास्यको स्वजन जानकर उनके सुख विधान करनेवाली प्रेममयी सेवा नहीं होती; मदीयता-भावमयी सेवा नहीं होती, तदीयता-भावमयी सेवा रहती है। जो सेवा चाहते हैं, वे सुखैश्वर्योत्तरा मुक्तिको ग्रहण नहीं करते॥ १७-१८॥ अपने भजनकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं श्रीकृष्णकी इच्छा :— युगधर्म प्रवर्त्तामु नाम-सङ्कीर्त्तन। चारि भाव-भक्ति दिया नाचामु भुवन॥ १९॥ तीसरा अध्याय | १०५