श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/१९-२१ उसके लिये ही भक्त और गुरुरूपमें अवतार, प्रचार और आचार :- आपनि करिमु भक्तभाव अङ्गीकारे। आपनि आचरि' भक्ति शिखामु सबारे॥२०॥ आचार बिना प्रचार निरर्थक :- आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय। एइ त' सिद्धान्त गीता-भागवते गाय॥२१॥ अनुवाद—मैं स्वयं नाम-सङ्कीर्तन रूपी कलियुगधर्मका प्रवर्तन करूँगा और चार प्रकारके भावोंसे युक्त प्रेमाभक्ति देकर इस जगत्को नचाऊँगा। मैं स्वयं भक्तका भाव ग्रहण करके अपने आचरणके द्वारा सभीको भक्तिकी शिक्षा दूँगा। स्वयं आचरण नहीं करनेसे धर्मकी शिक्षा नहीं दी जाती, इसी सिद्धान्तका गीता-भागवतादि गान करते हैं॥१९-२१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ऐश्वर्यज्ञानसे विधिमार्गमें जो लोग भजन करते हैं, वे साष्टि, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्यरूप चार प्रकारकी मुक्तियोंको प्राप्त करके वैकुण्ठलोकमें जाते हैं। ब्रह्मके साथ एक्यरूप (एक हो जाना) सायुज्य मुक्ति है, इसके लिये वैधीभक्ति करनेवाले भी प्रार्थना नहीं करते हैं। किन्तु प्रेमभक्ति पाकर पूर्व चार प्रकारकी मुक्तियोंका भी परित्याग करके मेरे भक्त मेरी सेवाके सुखको ही स्वीकार करते हैं। ऐसी वैधीभक्तिसे श्रेष्ठ प्रेमभक्तिको जगत्में प्रचार करना ही मेरा अभीष्ट है। मैं कलियुगका धर्म, जो नाम-सङ्कीर्तन है, उसे दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररसके साथ जगत्को देकर सभी लोगोंको नचाऊँगा और स्वयं भी भक्तभावको ग्रहण करके अपने आचरणके द्वारा जगत्के जीवोंको शिक्षा प्रदान करूँगा॥१७-२०॥ अमृतानुकणिका—'युगधर्म प्रवर्त्तामु नाम-सङ्कीर्तन'—पूर्व-पूर्व शास्त्रकारोंने मानव हृदयमें भगवद्भाव (श्रद्धा) उदयकालसे अबतक जो सब क्रम-उन्नतिको लक्ष्य किया है, उसकी आलोचनापूर्वक युगभेदसे तारकब्रह्म नामके ही क्रम-विकासका दर्शन किया है। सत्ययुगका तारकब्रह्म नाम— “नारायण परावेदाः नारायण पराक्षराः। नारायण परामुक्तिः नारायण परागतिः ॥” इसका तात्पर्य यह है—विज्ञान, भाषा, मुक्ति और चरम गति, इन समस्त विषयोंके आस्पद नारायण हैं। ऐश्वर्यगत परब्रह्मका नाम नारायण है। वैकुण्ठमें जितने भी पार्षदोंका वर्णन है, उनमें नारायणरूप भगवद्भाव सम्पूर्ण रूपसे उपलब्ध होता है। इस अवस्थामें शुद्ध शान्तभाव देखा जाता है। त्रेतायुगका तारकब्रह्म नाम— “रामनारायणानन्त मुकुन्द मधुसूदन। कृष्ण केशव कंसारे हरे वैकुण्ठ वामन ॥” इसमें जो सब नामोंका उल्लेख है, उनमें ऐश्वर्यगत नारायणके सभी विविध विक्रम सूचित होते हैं। यह शान्त और दास्य भावपर है। द्वापरयुगका तारकब्रह्म नाम— “हरे मुरारे मधुकैटभारे गोपाल गोविन्द मुकुन्द शौरे। यज्ञेश नारायण कृष्ण विष्णो निराश्रयं मां जगदीश रक्ष।” १०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत