श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/१९-२१ ] इसमें जिन सब नामोंका उल्लेख है, उनसे निराश्रित व्यक्तियोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णको ही लक्ष्य किया गया है। इसमें शान्त, दास्य, गौरव-सख्य भावका प्राबल्य दिखायी देता है। कलियुगका तारकब्रह्म नाम— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” इसको ही सर्वापेक्षा अधिक ममता विश्रम्भभाव व्यञ्जक नाममन्त्र कहा जायेगा। इसमें कोई प्रार्थना नहीं है। ममतायुक्त सभी रसोंकी उद्दीपकता इसमें दिखायी देती है। भगवान्का किसी प्रकारका विक्रम अथवा मुक्तिदाता होनेका परिचय नहीं है। केवल आत्मा जो परमात्माके द्वारा किसी अनिर्वचनीय प्रेमसूत्रसे आकृष्ट होती है, वही मात्र इसमें व्यक्त हुआ है। इसलिये माधुर्याश्रित विश्रम्भ-सेवाप्रार्थीजनोके सम्बन्धमें यह नाम एकमात्र मन्त्रस्वरूप हुआ है। इसकी अनुक्षण आलोचना ही एक मात्र उपासना है। सारग्राही व्यक्तियोंकी पूजा, व्रत, अध्ययनादि समस्त पारमार्थिक अनुशीलन इसी नामके अनुगत हैं। इसमें देश-काल-पात्रका भी विचार नहीं है। घोर पापसे आच्छादित इस कलियुगमें मनुष्यको अल्पायु, मन्दबुद्धि और बलहीन देखकर कलिकल्मषहारी पतितपावन श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रने नवद्वीपधाममें श्रीगौराङ्गरूपमें अवतीर्ण होकर कलियुगमें एकमात्र आश्रय श्रीहरिनामको महापापियोंतक सभी श्रेणीके मनुष्योंके द्वार-द्वार जाकर प्रचार किया। उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करके नामरसका आस्वादन करके जीवोंको उसका आस्वादन करनेका उपदेश दिया। कलियुगमें जीव जिस प्रकार सर्वदोष-निधि हैं, हरिनाम उसी प्रकार सभी गुणोंके मूल हैं; जीव जिस प्रकार अत्यन्त शक्तिहीन हैं, हरिनाम उसी प्रकार सर्वशक्तिमान् हैं; जीव जिस प्रकार कठिन भव-महारोगसे पीड़ित हैं, हरिनाम भी उस रोगकी एकमात्र अमोघ औषधि हैं। इसलिये शास्त्रोंमें कलियुगके जीवोंके लिये युगधर्म एकमात्र हरिनामकी व्यवस्था की है। दोषोंकी निधि कलिमें एक महत्वपूर्ण गुण है, उससे शुकदेव गोस्वामीने महाराज परीक्षितसे कहा (भागवत १२/३/५१-५२)— “कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥५१॥ कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतोमखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥५२॥” अर्थात् “हे राजन्! कलियुगको दोषोंका सागर कहकर स्वीकार करनेपर भी उसमें एक प्रधान गुण है, जिसके द्वारा कलियुगको अन्यान्य युगोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि कलियुगमें भगवान् वासुदेवका गुण-कीर्तन करनेसे ही जीव संसार-बन्धनसे मुक्ति लाभकर परमपदको प्राप्त करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सत्ययुगमें प्राणायामादि योगानुष्ठानसे भगवान्का ध्यान करनेका जो फल प्राप्त होता था, त्रेतायुगमें जो बड़े भव्य आयोजनोंके द्वारा बहुकाल और बड़े परिश्रमके द्वारा साध्य ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंका सम्पादन करनेसे जो फल प्राप्त होता था तथा द्वापरमें विविध आयोजनोंमें अर्चनके द्वारा जो सिद्धि लाभ की जाती थी, कलियुगमें श्रीहरिके सङ्कीर्तनसे वही फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।” तीसरा अध्याय | १०७