श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
३/१९-२१ ] इसमें जिन सब नामोंका उल्लेख है, उनसे निराश्रित व्यक्तियोंके आश्रयरूप श्रीकृष्णको ही लक्ष्य किया गया है। इसमें शान्त, दास्य, गौरव-सख्य भावका प्राबल्य दिखायी देता है। कलियुगका तारकब्रह्म नाम— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” इसको ही सर्वापेक्षा अधिक ममता विश्रम्भभाव व्यञ्जक नाममन्त्र कहा जायेगा। इसमें कोई प्रार्थना नहीं है। ममतायुक्त सभी रसोंकी उद्दीपकता इसमें दिखायी देती है। भगवान्का किसी प्रकारका विक्रम अथवा मुक्तिदाता होनेका परिचय नहीं है। केवल आत्मा जो परमात्माके द्वारा किसी अनिर्वचनीय प्रेमसूत्रसे आकृष्ट होती है, वही मात्र इसमें व्यक्त हुआ है। इसलिये माधुर्याश्रित विश्रम्भ-सेवाप्रार्थीजनोके सम्बन्धमें यह नाम एकमात्र मन्त्रस्वरूप हुआ है। इसकी अनुक्षण आलोचना ही एक मात्र उपासना है। सारग्राही व्यक्तियोंकी पूजा, व्रत, अध्ययनादि समस्त पारमार्थिक अनुशीलन इसी नामके अनुगत हैं। इसमें देश-काल-पात्रका भी विचार नहीं है। घोर पापसे आच्छादित इस कलियुगमें मनुष्यको अल्पायु, मन्दबुद्धि और बलहीन देखकर कलिकल्मषहारी पतितपावन श्रीभगवान् कृष्णचन्द्रने नवद्वीपधाममें श्रीगौराङ्गरूपमें अवतीर्ण होकर कलियुगमें एकमात्र आश्रय श्रीहरिनामको महापापियोंतक सभी श्रेणीके मनुष्योंके द्वार-द्वार जाकर प्रचार किया। उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करके नामरसका आस्वादन करके जीवोंको उसका आस्वादन करनेका उपदेश दिया। कलियुगमें जीव जिस प्रकार सर्वदोष-निधि हैं, हरिनाम उसी प्रकार सभी गुणोंके मूल हैं; जीव जिस प्रकार अत्यन्त शक्तिहीन हैं, हरिनाम उसी प्रकार सर्वशक्तिमान् हैं; जीव जिस प्रकार कठिन भव-महारोगसे पीड़ित हैं, हरिनाम भी उस रोगकी एकमात्र अमोघ औषधि हैं। इसलिये शास्त्रोंमें कलियुगके जीवोंके लिये युगधर्म एकमात्र हरिनामकी व्यवस्था की है। दोषोंकी निधि कलिमें एक महत्वपूर्ण गुण है, उससे शुकदेव गोस्वामीने महाराज परीक्षितसे कहा (भागवत १२/३/५१-५२)— “कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥५१॥ कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतोमखैः। द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥५२॥” अर्थात् “हे राजन्! कलियुगको दोषोंका सागर कहकर स्वीकार करनेपर भी उसमें एक प्रधान गुण है, जिसके द्वारा कलियुगको अन्यान्य युगोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि कलियुगमें भगवान् वासुदेवका गुण-कीर्तन करनेसे ही जीव संसार-बन्धनसे मुक्ति लाभकर परमपदको प्राप्त करता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सत्ययुगमें प्राणायामादि योगानुष्ठानसे भगवान्का ध्यान करनेका जो फल प्राप्त होता था, त्रेतायुगमें जो बड़े भव्य आयोजनोंके द्वारा बहुकाल और बड़े परिश्रमके द्वारा साध्य ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंका सम्पादन करनेसे जो फल प्राप्त होता था तथा द्वापरमें विविध आयोजनोंमें अर्चनके द्वारा जो सिद्धि लाभ की जाती थी, कलियुगमें श्रीहरिके सङ्कीर्तनसे वही फल प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है।” तीसरा अध्याय | १०७
[ ३/१९-२१ इस वर्तमान कलियुगमें परम दयालु पतितपावन श्रीगौराङ्गदेवके श्रीचरणयुगलका आश्रय करना प्रत्येक मनुष्यका कर्त्तव्य है। श्रीगौराङ्गदेवकी कृपाके बिना भवसागरसे पार होनेका अन्य कोई भी उपाय नहीं है। वे ही इस कलियुगके एकमात्र पतित उद्धारक अवतार हैं। उनमें जाति, धन, कुल, मान, विद्या, यश, स्त्री-पुरुष, अपाहिज, बहरे, अन्धे, विकलांग और आश्रमादिका कोई विचार नहीं है। जो एकान्त भावसे उनके अभय चरणकमलोंकी शरण ग्रहण करेंगे, वे सहज ही इस दुस्तर असीमित भवसमुद्रको गोखुरके समान पार कर जायेंगे। ऐसे पतितपावन अवतार श्रीगौराङ्गमें जिनकी रति नहीं उत्पन्न होती, उनकी करोड़ों युगोंमें भी उद्धार प्राप्त करनेकी कोई आशा नहीं है। एक दिन कलिके जीवोंको उपदेश देनेके छलसे परम दयालु महाप्रभुने स्वरूप दामोदर और रायरामानन्दको सम्बोधन करते हुए कहा- “ओहे स्वरूपदामोदर ! ओहे रायरामानन्द ! कलियुगका धर्म एकमात्र हरिनाम सङ्कीर्तन है। हरि सङ्कीर्तनसे ही जीवकी सर्वसिद्धि होती है। जो सुमेधा-सम्पन्न हैं, वे हरि सङ्कीर्तन यज्ञके द्वारा श्रीकृष्णकी आराधना करते हैं।” श्रीचैतन्यचरितामृत (अन्त्यलीला २०वाँ अध्याय) - “हर्षे प्रभु कहेन, - “शुन स्वरूप-रामराय । नाम सङ्कीर्त्तन-कलौ परम उपाय ॥ ८ ॥ सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन । सेई त' सुमेधा पाय कृष्णेर चरण ॥ ९ ॥ नामसङ्कीर्त्तने हय सर्वानर्थ-नाश । सर्व-शुभोदय, कृष्णे प्रेमेर उल्लास ॥ ११ ॥ सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार नाशन । चित्तशुद्धि, सर्वभक्तिसाधन-उद्गम ॥ १३॥” साक्षात् अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दन होनेपर भी श्रीगौरहरिने हमारे जैसे कलिहत जीवोंकी जिस प्रकार हरिनाममें दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न हो, वैसा उपदेश देनेके लिये स्वयंमें जीव अभिमान करके निम्नलिखित श्लोक पाठ किया (शिक्षाष्टक द्वितीय श्लोक) - “नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति- स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः । एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनी नानुरागः ॥ ” “हे भगवन् ! आपके नाम ही जीवोंके लिये सर्वमङ्गलप्रद हैं, अतः जीवोंके कल्याण हेतु आप अपने राम, नारायण, कृष्ण, मुकुन्द, माधव, गोविन्द, दामोदर आदि अनेक नामोंके रूपमें नित्य प्रकाशित हैं। आपने उन नामोंमें उन-उन स्वरूपोंकी सर्वशक्तियोंको स्थापित किया है। अहैतुकी कृपा हेतु आपने उन नामोंके स्मरणमें सन्ध्या-वन्दना आदिकी भाँति किसी निर्दिष्टकाल आदिका विचार भी नहीं रखा है अर्थात् दिन-रात किसी भी समय भगवन्नामका स्मरण-कीर्त्तन किया जा सकता है- ऐसा विधान भी बना दिया है। हे प्रभो ! आपकी तो जीवोंपर ऐसी अहैतुकी कृपा है, तथापि मेरा तो नामापराधस्वरूप ऐसा दुर्देव है कि आपके ऐसे सर्वफलप्रद सुलभ नाममें भी अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ।” १०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१९-२१ ] जिस प्रकार नाम लेनेसे प्रेम हृदयमें उपजेगा, उसका लक्षण इस श्लोकमें कह रहे हैं (शिक्षाष्टक तृतीय श्लोक)— “तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥” “सर्वपद-दलित अत्यन्त तुच्छ तृणसे भी अपनेको दीन-हीन नीच समझकर, वृक्षसे भी अधिक सहनशील बनकर, स्वयं अमानी होकर, दूसरोंको यथायोग्य मान देनेवाला बनकर सदा सर्वदा निरन्तर श्रीहरिनामसङ्कीर्तन करता रहे।” अन्यान्य कलियुगोंमें भी युगावतार कलियुग धर्म नाम-सङ्कीर्तनकी स्थापना करते हैं, परन्तु अवतारी श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित नाम-सङ्कीर्तनका उनसे वैशिष्ट्य है। सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीमुखसे निर्गत होनेके कारण श्रीहरिनाम भी सर्वशक्तिपूर्ण होकर जगत्में प्रचारित होता है। प्रेममय श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीमुखसे निःसृत नाम-सङ्कीर्तन ऐसा प्रेम-विमण्डित और अमृतसे भी सुमधुर है कि वह व्रजप्रेमतक प्रदान करता है। अन्य कलियुगोंका नाम-सङ्कीर्तन इस प्रकार प्रेम-मण्डित, मधुर, सर्वशक्तिसम्पन्न और प्रेम प्रदान करनेवाला नहीं है। चारि भाव-भक्ति दिया—प्रेमभक्ति श्रीकृष्णकी ह्लादिनी-शक्तिकी वृत्ति-विशेष है। श्रीकृष्णका सङ्कल्प यह है—उनके द्वारा प्रवर्तित श्रीनाम-सङ्कीर्तन करते-करते जीवका चित्त जब निर्मल होता है, तब वह ह्लादिनीको ग्रहण करनेके योग्य होता है। उस समय वे इस शुद्धचित्तमें अपनी ह्लादिनी शक्तिको निक्षेप करते हैं। भक्त-हृदयमें आकर यह ह्लादिनी प्रेमभक्तिके रूपमें परिणत होती है। यह प्रेमदानकी साधारण व्यवस्था है। किन्तु श्रीकृष्णचैतन्यरूपमें प्रकटकालमें अनेक समय, विशेषतः संन्यास ग्रहण करनेके बाद, महाप्रभुने श्रीमुखसे एक बार हरिनामका उपदेश देकर, किंवा केवलमात्र दर्शनदानसे असंख्य लोगोंको कृष्णप्रेम दान किया। इस लीलामें महाप्रभुने ऐसी अचिन्त्य महाशक्तिको प्रकट किया, जिसके प्रभावसे प्रेमदान और जीवके चित्तमें सञ्चित कल्मषादिका विनाश एक ही साथ सङ्घटित हुआ। तेजके घन विग्रह सूर्यदेवके आविर्भावसे उनके तेजरूप किरणजालके स्पर्शसे जैसे पृथ्वीका अन्धकार, चोर-डाकूका भय और शीतादि शीघ्र ही दूर हो जाते हैं और जीवोंके चित्तमें धर्म-कर्मादिके अनुष्ठानकी वासना जाग्रत हो जाती है तथा देहकी जड़ता दूर हो जाती है, उसी प्रकार प्रेमघन-विग्रह महाप्रभुके दर्शनसे उनके श्रीअङ्गसे निकली प्रेमकिरणपुञ्जके द्वारा ग्रथित और परिसिञ्चित होकर जीव भी एक अपूर्व प्रेमसम्पद लाभ करके कृतार्थ हुए और साथ-ही-साथ उनके पूर्व सञ्चित अपराध, दुर्वासनाजनित कल्मष भी अन्तर्हित हो गये तथा श्रीकृष्ण-सुखैकतात्पर्यमयी सेवावासनाने जाग्रत होकर उनके चित्तको समुज्ज्वल कर दिया। महाप्रभु जहाँ भी गये, वहाँ प्रेमकी बाढ़ ले आये और उस बाढ़में केवल मनुष्य ही नहीं अपितु पशु-पक्षी-कीट-पतङ्गादि, यहाँतक कि वृक्ष-गुल्म-तृणादि भी डूबकर कृतार्थ हो गये। झारिखण्डपथसे वृन्दावन जाते हुए महाप्रभुने अपने इस अपूर्व प्रभावको प्रकट किया था। आपनि करिमु भक्तभाव अङ्गीकारे—जीव स्वरूपसे श्रीकृष्णका दास है, इसलिये भक्तभाव अथवा सेवकभाव साधक-जीवका अपना भाव है। किन्तु श्रीकृष्ण स्वरूपतः सेव्य हैं, स्वरूपसे तीसरा अध्याय | १०९
[ ३/१९-२१ वे किसीके भी सेवक नहीं हैं; तभी भक्तभाव उनका स्वरूपानुबन्ध अथवा अपना भाव नहीं है, इसलिये उन्होंने भक्तभाव अङ्गीकार करनेकी बात कही है। आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय-आचार्यके आदर्शके बिना कभी भी साधारण दुर्बल जीव शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता है। कर्मराज्य हो अथवा भक्तिराज्य-दोनों क्षेत्रोंमें ही आदर्श आवश्यक है। जगत्में प्रत्येक व्यक्ति ही किसी-ना-किसीके आदर्शके द्वारा ज्ञात या अज्ञात रूपसे परिचालित होता है। कर्मी पुण्य-कार्य करनेके लिये जिस प्रकार किसी-ना-किसीको आदर्शके रूपमें अपने सम्मुख स्थापन करते हैं, उसी प्रकार पाप-कार्य करनेमें प्रवृत्त होनेपर भी किसी एक आदर्शको सम्मुख स्थापन करना होता है। पापी व्यक्ति भी आदर्शके बिना सुष्ठु-भावसे पापकर्म नहीं कर सकता। पृथ्वीपर स्थित वारवनिताएँ स्वर्गकी वेश्याओंको अपना आदर्श करके अधिकतर पाप कार्यमें लिप्त होती हैं। पृथ्वीपर राजा लोग देवेन्द्रके आदर्शको सामने स्थापित करते है। चार्वाक-पन्थियोंका जिस प्रकार आदर्श है, जैमिनीके अनुगतजनोंका भी उसी प्रकार आदर्श है। शिशु आदर्श प्राप्त नहीं करके कोई भी शिक्षा लाभ नहीं कर सकता-शिशु आदर्शका अनुकरण करके ही वाक्योंका उच्चारण तथा आहार-विहारादि करनेकी शिक्षा प्राप्त करता है। किसी नर शिशुका जन्मसे यदि बाघादि जन्तुके आदर्शमें पालन हो, तो उनके आदर्शको लेकर उसमें भी बाघके शावककी भाँति हिंसक स्वभाव, वैसे ही शब्दका अनुकरण और वैसी आहार-विहारकी प्रवृत्ति लक्षित होती है। शिशुको शब्दशास्त्रमें अथवा लिपिशिक्षामें शिक्षित करनेके लिये आदर्श-शब्द या आदर्श-लिपिकी आवश्यकता होती है; अन्यथा शिशु शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। जब हम तैरनेकी शिक्षा ग्रहण करते हैं, तब हमें जलमें उतरने अथवा नदीके प्रवाहमें बहुत दूर जानेसे भय लगता है, किन्तु यदि हम किसी व्यक्ति या अनेक व्यक्तियोंको इस इस कार्यमें प्रवृत्त अथवा हमारे लिये आदर्श स्थापित करते देखें, तब हममें साहसका सञ्चार होगा और हम धीरे-धीरे आदर्शके द्वारा उत्साह प्राप्तकर तैरनेकी विद्यामें सनिपुण हो सकते हैं। इस प्रकार इस जगत्में अनेक दृष्टान्त हम नित्य ही प्रत्यक्ष देखते हैं। अधोक्षजके सेवाराज्यमें भी आदर्शकी एकान्त आवश्यकता है, परन्तु वह अन्तरनिष्ठा अन्य प्रकारकी है; यही मात्र पार्थक्य है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने लिखा है-वैष्णवोंको 'जगद्-गुरु' कहा जाता है। वैष्णव जिस प्रकार उच्च पदपर स्थित हैं, उनका चरित्र भी उसी प्रकार उच्च और अनुकरण-योग्य होना आवश्यक है। वैष्णवोंका चरित्र अगर मन्द होगा, तो अन्यान्य दुर्बल जीव किस प्रकारसे सत्चरित्रकी शिक्षा ग्रहण करेंगे? महाप्रभुने भी हमें इसी प्रकार उपदेश दिया है (मध्यलीला १२/५१,५३)- “शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु यैछे ना लुकाय। संन्यासीर अल्प छिद्र सर्वलोके गाय॥५१॥ प्रभु कहे,-“पूर्ण यैछे दुग्धेर कलस। सुराबिन्दु-पाते केह ना करे परश॥५३॥” “श्वेत वस्त्रपर जैसे स्याहीका दाग छुपाया नहीं जा सकता, उसी प्रकार संन्यासीके अल्प ११० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/१९-२३ ] दोषका भी सभी गान करते हैं। जैसे दूधके कलशमें एक बूँद मदिरा डाल दी जाय, तो उसको कोई स्पर्श नहीं करेगा।” साधु-शिक्षा दो प्रकारकी है अर्थात् वाक्यके द्वारा उपदेश देना और चरित्रके द्वारा दूसरोंको साधु-चरित्रकी शिक्षा देना। मध्यलीला (१२/११७)में महाप्रभुने और भी कहा है— “तुमि भाल करियाछ, शिखाह अन्येरे। एइमत भाल कर्म सेइ येन करे॥” “हे वैष्णवगण! तुम साधु-चरित्रके द्वारा दूसरोंको शिक्षा दो। तुमने अच्छा कार्य किया है, यह उत्तम बात है। किन्तु जगत्के जीव तुम्हारे भ्रातागण हैं, तुम्हारे असत् कार्यके द्वारा उनका पतन होगा। तुम्हारा कर्तव्य यह है—अपना साधु-चरित्र दिखलाकर उनके द्वारा अपने चरित्रका अनुकरण करवाओ। तुम यदि गृहत्यागी वैष्णव हो, तब त्यागी वैष्णवके सम्बन्धमें मैंने जो सब उपदेश दिये हैं, वैसा आचरण करके अन्य गृहत्यागी वैष्णवोंको शिक्षा दो। तुम यदि वैष्णवगृहस्थ हो, तब गृही वैष्णवोंको मैंने जो उपदेश दिये है और अपने चरित्रके द्वारा जो आदर्श दिखलाये हैं, उसका आचरण करो और अन्यान्य गृहस्थोंको शिक्षा दो। वैष्णवोंका चरित्र निष्पाप होता है। उसमें कोई भी अंश गोपन करने योग्य नहीं है। सरलता ही वैष्णवोंका जीवन है। अपने चरित्रको सर्वत्र प्रकाश करके शिक्षा दो। चरित्र शुद्ध ना होनेपर कोई भी ‘वैष्णव’ पदवी प्राप्त करनेके योग्य नहीं होता। तुम्हारा शुद्ध चरित्र है, इसलिये सदा अच्छा आचरण करते रहना। और उसकी जगत्को शिक्षा देना। सभी वैष्णव ही जगत्के गुरुपदको प्राप्त हुए हैं। केवल कथाके द्वारा शिक्षा देना यथेष्ठ नहीं है, चरित्रके द्वारा शिक्षा देना ही प्रधान कार्य है। देखो, मेरे लिये कोई भी विधि नहीं है। मैं स्वेच्छामय ईश्वर हूँ। जो इच्छा हो, मैं वही कर सकता हूँ। तथापि मैं कलिकालमें जीवोंके चरित्रको पवित्र करनेके लिये श्रीशचीदेवीके गर्भसे जन्मग्रहण करके शिक्षा दे रहा हूँ। मैंने बाल्यचरित्रके द्वारा बालकोंको शिक्षा दी है। गृहस्थ चरित्रके द्वारा गृहीजनोंको शिक्षा दी है। संन्यास चरित्रके द्वारा गृहत्यागी लोगोंको शिक्षा दी है। तुम लोग मेरे चरित्रका अनुकरण करते हुए अन्यान्य जीवोंको शिक्षा दो। जब भी इस विषयमें कुछ भी सन्देह हो, तब मेरे चरित्रकी आलोचना करके अपने चरित्रका गठन करो।” श्रीमन्महाप्रभुके इस उपदेशका सभी वैष्णवोंको पालन करना उचित है॥१९-२१॥ अवतारकाल:— श्रीमद्भगवद्गीता (४/७-८)— यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ २२॥ अवतारका कार्य :— परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ २३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२२-२३॥ तीसरा अध्याय | १११
[ ३/२२-२४ अमृतप्रवाह भाष्य- हे अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि होती है और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं इस जगत्में प्रकट होता हूँ। साधुओंके परित्राण (रक्षा), दुष्कृतिजनोंके विनाश और धर्मकी संस्थापनाके लिये मैं प्रत्येक युगमें प्रकट होता हूँ॥ २२-२३ ॥ अनुभाष्य-पूर्वकालकी बात बताते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे बोले कि मैंने इस योगशास्त्रको पहले सूर्यको दिया था और समयके प्रभावसे इसके नष्ट हो जानेपर मैं तुम्हें पुनः यह ज्ञान प्रदान कर रहा हूँ। अर्जुनके विश्वासको दृढ़ करनेके लिये भगवान् अपने आविर्भावके प्रसङ्गमें कह रहे हैं- हे भारत! यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः (हानिः) अधर्मस्य अभ्युत्थानं (वृद्धिः) भवति, तदा [अहं द्वे सोढुमशक्नुवन् तयोर्वैपरीत्यं कर्त्तुं] आत्मानं सृजामि। साधूनां (मदनुशीलनपराणां) परित्राणाय (सेवनविघ्ननिवृत्तये) दुष्कृतां (भक्तद्रोहिणां मदन्यैरवध्यानां रावण-कंस-केश्यादीनां) विनाशाय, धर्मसंस्थापनार्थाय च (परिचर्यासाङ्कीर्त्तनलक्षण-भगवत्सेवनपर-निर्मत्सरधर्मस्य सम्यगाचरणार्थाय प्रचारार्थाय च) युगे युगे (तत्तत्काले) सम्भवामि। श्लोक-भावानुवाद-हे भरतवंशी! जब-जब भी धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, मैं उसे सहन नहीं कर सकता, इसलिये उसे विपरीत (शोधन) करनेके लिये स्वयंको प्रकट करता हूँ। (मेरे अनुशीलन परायण) साधुओंके मेरी सेवामें आनेवाले विघ्नोंकी निवृत्तिके लिये और (भक्तोंके द्रोही एवं मेरे अतिरिक्त किसी अन्यके द्वारा ना मारे जा सकनेवाले रावण, कंस, केशी आदि) असुरोंके विनाश तथा (परिचर्या और सङ्कीर्त्तनादि लक्षणोंसे युक्त भगवत्-सेवापरायण निर्मत्सर) धर्मके सम्यक् रूपसे आचार-प्रचारके लिये उस-उस उपयुक्त समयपर मैं स्वयंको प्रकट करता हूँ॥ २२-२३॥ अमृतानुकणिका- एक प्रश्न हो सकता है-भगवान्का निरपेक्ष होना स्वाभाविक है, किन्तु जब वे भक्तोंकी रक्षा करते हैं और असुरोंका संहार करते हैं, तब क्या वे पक्षपात करते नहीं दिखलायी देते? इसका समाधान यह है-भगवान्का असुरोंके प्रति जो निग्रह दिखलायी देता है, वह वास्तवमें उनका अनुग्रह ही है। भक्तविद्वेषी असुरोंके लिये भगवान्के शासनके अनुसार अनन्त नरक यातना भोगनेकी व्यवस्था है। भगवान् 'हतारिगतिदायक' (जिसका संहार करते हैं, उसे गति प्रदान करनेवाले) हैं, इसलिये उनके हाथों मारे जानेपर असुरोंको मुक्तिकी प्राप्ति होती है, और पापकर्मोंके फलस्वरूप उन्हें जो नरकादि भोग करना था, उससे उनका छुटकारा हो जाता है। इस प्रकारसे वे असुरोंपर भी अनुग्रह करते हैं॥ २२-२३ ॥ आचारके बिना प्रचारकी व्यर्थता और विषममय फल :- श्रीमद्भगवद्गीता (३/२४)— उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्। सङ्करस्य च कर्त्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यदि मैं अपने कर्म-आचरणके द्वारा कर्म व्यवस्थाकी रक्षा नहीं करूँ, तो इन लोकोंका विनाश हो जायेगा और वर्णसङ्करका कारण होकर मैं ही प्रजाका विनाशक बन जाऊँगा॥ २४॥ ११२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/२४-२६ ] अनुभाष्य—अर्जुनके इस प्रकार कर्मके विषयमें सन्देहात्मक प्रश्नके उत्तरमें भगवान् श्रीकृष्णने संसारकी भोग-वासनासे रहित अपने द्वारा कर्मका आचरण करनेका उद्देश्य कहा— चेत् (यदि) अहं कर्म न कुर्याम्, इमे लोकाः उत्सीदेयुः (मां दृष्टान्तीकृत्य भ्रंशयेयुः), सङ्करस्य च कर्त्ता स्याम्, इमाः प्रजाः उपहन्यां (मलिनाः कुर्याम्)। श्लोक-भावानुवाद—यदि मैं कर्म ना करूँ, तो ये सभी लोग मेरे दृष्टान्तको मानकर भ्रष्ट हो जायेंगे, इस प्रकार मैं वर्णसङ्करका प्रवर्तक बनकर इन सारी प्रजाओंको भ्रष्ट करनेवाला होऊँगा ॥ २४॥ आचार्यका आचरण सभी लोगोंका आदर्श :— श्रीमद्भगवद्गीता (३/२१)— यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते ॥ २५ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रेष्ठ पुरुष जिस प्रकारका आचरण करते हैं, उसीका ही अन्य लोग अनुकरण करते हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको 'प्रमाण' कहता है, सभी लोग उसीमें अनुरत होते हैं॥ २५ ॥ अनुभाष्य—श्रेष्ठः (महाजनः) यत् यत् आचरति, तत् तत् [कर्म] एव इतरः (अश्रेष्ठः) जनः [आचरति]; सः (श्रेष्ठः) यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः (इतरः जनः) तत् अनुवर्त्तते (अनुसरति)। श्लोक-भावानुवाद—श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, उस-उस कर्मका ही साधारण लोग आचरण करते हैं; वह श्रेष्ठ व्यक्ति जिसको प्रमाणित करता है, अन्य व्यक्ति उसका अनुसरण करते हैं॥ २५॥ अमृताणुकणिका—उपरोक्त श्लोकमें बतलाया है कि भगवान् प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर क्यों कर्म करते हैं। साधारणतः श्रेष्ठ व्यक्ति जो करते हैं, अन्यान्य लोग उसका अनुकरण करते हैं। इसलिये भगवान् यदि जगत्में अवतीर्ण होकर कोई कर्म ना करें, तो उनका दृष्टान्त देखकर अन्य लोग भी धर्म-कर्मका अनुष्ठान नहीं करेंगे। इससे उनमें पाप-पुण्यका विचार नहीं रहेगा और स्वच्छन्द रूपसे स्त्री-पुरुष विवाहके बिना सङ्ग करके वर्णसङ्कर सन्तानें उत्पन्न करेंगे, जो अधर्ममें प्रवृत्त होंगी। इस प्रकार पाप कर्मोंमें रत होकर सभी लोग विनाशको (नरक और निम्न योनियोंको) प्राप्त होंगे॥ २४-२५॥ युगधर्म प्रचार—विष्णुका कार्य, किन्तु श्रीकृष्णके बिना अन्य विष्णुतत्त्वका कृष्णप्रेमदान असम्भव :— युगधर्म-प्रवर्त्तन हय अंश हैते। आमा बिना अन्ये नारे व्रजप्रेम दिते॥ २६ ॥ अनुवाद—युगधर्मका प्रवर्तन तो मेरे अंशोंके द्वारा हो सकता है, किन्तु व्रजप्रेमको मेरे अतिरिक्त और कोई भी नहीं दे सकता है॥ २६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नाम-सङ्कीर्तन रूप युगधर्म और व्रजप्रेम—इन दोनोंका प्रचार करनेके लिये मैं प्रकट होनेकी इच्छा कर रहा हूँ। यद्यपि युगधर्मके प्रचारका कार्य मेरे अंशावतारके द्वारा तीसरा अध्याय | ११३
[ ३/२६-२७ हो सकता है, तो भी मुझ पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त व्रजप्रेमको अन्य कोई भी प्रदान नहीं कर सकता ॥ २६ ॥ लघुभागवत अन्तर्गत पूर्वखण्डमें (५/३७) बिल्वमङ्गल-वाक्य :- सन्त्ववतारा बहवः पङ्कजनाभस्य सर्वतो-भद्राः। कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ॥ २७॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके अंश पद्मनाभके सर्वमङ्गलमय विभिन्न प्रकारके अवतार रहनेपर भी एकमात्र श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कौन हैं, जो लताओंको भी प्रेम प्रदान कर सकें? अर्थात् अन्य कोई नहीं कर सकता ॥ २७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् पङ्कजनाभ (जिनकी नाभिसे कमलकी उत्पत्ति हुई) के अनेक मङ्गलमय अवतार क्यों ना हुए हों, श्रीकृष्णके अतिरिक्त लता अर्थात् आश्रितजनोंका प्रेमदाता और कौन है ? ॥ २७ ॥ अनुभाष्य—पङ्कजनाभस्य (पद्मनाभस्य भगवतः) सर्वतः भद्राः (मङ्गलप्रदाः) बहवः अवताराः सन्तुः अपि कृष्णात् अन्यः को वा लतासु (तदाश्रितासु) प्रेमदः (प्रेमभक्तिदाता) भवति ? श्लोक-भावानुवाद—भगवान् पद्मनाभके मङ्गल प्रदान करनेवाले बहुतसे अवतार हैं, तो भी श्रीकृष्णके अतिरिक्त कौन अपने आश्रित भक्तोंको प्रेमभक्ति देनेवाले हैं? ॥ २७ ॥ अमृतानुकणिका—स्वयं भगवान्के अनेक अवतार हैं और ये समस्त अवतार सभी प्रकारसे जीवको मङ्गलदान भी कर सकते हैं, किन्तु स्वयंरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य कोई भी भगवत्-स्वरूप प्रेमदान करनेमें समर्थ नहीं हैं। श्रीकृष्णने केवल मनुष्योंको ही प्रेमदान किया, ऐसा नहीं है, उन्होंने पशु, पक्षी, कीट-पतङ्ग, यहाँ तक कि लतादिको भी प्रेमदान किया। श्रीमद्भागवतमें इसका प्रमाण पाया जाता है। श्रीकृष्णके असमोर्द्ध रूप-माधुर्यका दर्शन करके पशु, पक्षी, वृक्षादि सभी प्रेममें पुलकित हो गये (भागवत १०/२९/४०)— “का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतवेणुगीत सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्त्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यविभ्रन्॥” अर्थात् “हे कृष्ण! तीनों लोकोंमें ऐसी कौन-सी रमणी है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तानको सुनकर तथा त्रिभुवनके सौभाग्यरूप तुम्हारे इस त्रिभङ्ग-ललित श्यामसुन्दर रूपको अपने नेत्रोंसे निहारकर सर्वथा मोहित हो अपनी आर्य-मर्यादासे विचलित ना हो जाय—नारीधर्म और लोक लज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त ना हो जाये ? स्त्रियोंकी बात ही क्या है, तुम्हारा त्रिभुवन-मोहन रूप तथा मुरली सङ्गीत ऐसा मोहक है कि इसे देख-सुनकर गौएँ, पक्षी, वृक्ष और मृगादि प्राणी भी परमानन्दसे पुलकित हो जाते हैं।” प्रश्न हो सकता है—श्रीरामचन्द्र जब वनमें गये, तब उनके लिये वृक्षादि भी रोदन कर रहे थे। इससे यह समझा जाता है कि श्रीरामचन्द्रने भी वृक्षोंको प्रेमदान किया था। यह तो सत्य ११४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
है, किन्तु वह तो केवल उनके विच्छेद-दुःखसे कातर होकर श्रीरामचन्द्रके वनगमनके समय था। सब समय, विशेषतः श्रीरामचन्द्रका सीताजीके साथ संयोगके समय वृक्षादिका इस प्रकार आचरण नहीं देखा जाता। परन्तु श्रीकृष्णके साथ गोपियोंके मिलन-समयमें भी प्रतिदिन ही पशु-पक्षी-वृक्ष-लता आदिके देहमें प्रेमविकार दिखलायी देते हैं॥ २७॥ ताहाते आपन भक्तगण करि' सङ्गे। पृथिवीते अवतरि' करिमु नाना रङ्गे॥ २८॥ एत भावि' कलिकाले प्रथम सन्ध्याय। अवतीर्ण हैला कृष्ण आपनि नदीयाय ॥ २९॥ चैतन्यसिंहेर नवद्वीपे अवतार। सिंहग्रीव, सिंहवीर्य, सिंहेर हुङ्कार ॥ ३०॥ सेइ सिंह वसुक जीवेर हृदय-कन्दरे। कल्मष-द्विरद नाशे याँहार हुङ्कारे ॥ ३१॥ अनुवाद-मैं अपने परिकरोंको साथ लेकर पृथ्वीपर अवतरित होकर विभिन्न प्रकारकी लीलाओंको प्रकाश करूँगा- इस प्रकार श्रीकृष्णने यह निर्णय लिया और वे श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें कलियुगकी प्रथम संध्यामें नदीयामें अवतीर्ण हुए। सिंहकी भाँति जिनकी बलिष्ठ गर्दन है, सिंहकी भाँति जिनकी शक्ति और प्रभाव है तथा सिंहकी भाँति जिनकी गम्भीर गर्जन है, ऐसे श्रीचैतन्य महाप्रभु रूप सिंहने नवद्वीपमें अवतार लिया। जैसे वनमें सिंहकी गर्जनसे हाथी पलायन करते हैं, वैसे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुरूपी सिंहकी गर्जनासे हृदयमें सभी पापराशियोंका नाश हो जाता है। वे (परम दयालु) श्रीचैतन्य महाप्रभुरूप सिंह जीवोंके हृदयरूपी गुफामें विराजमान हों ॥ २८-३१॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'कल्मष' - पाप, 'द्विरद' - हस्ती (हाथी) ॥ ३१॥ अनुभाष्य- [“क्रमात् कृतयुगादीनां षष्ठांशः संध्ययोः स्वकः"- श्रीसूर्यसिद्धान्त अन्तर्गत मध्यमाधिकारमें १७वाँ श्लोक] युगके आरम्भमें प्रथम भाग और युगके समाप्त होनेसे पूर्व अन्तिम भाग, इन दोनों भागोंको 'संध्या' कहा जाता है और इनका कुल समय युगके छठे भागके बराबर होता है। युगकी प्रथम और अन्तिम संध्या, दोनोंका परिमाण युगके कालका बारहवाँ भाग होता है। इसलिये कलिकालकी प्रथम संध्याका परिमाण छत्तीस हजार वर्ष है। श्रीगौरसुन्दर कलिकालके ४,५८६ वर्ष व्यतीत होनेपर प्रथम संध्यामें श्रीमायापुर नवद्वीपमें जन्म ग्रहणकर प्रकट होते हैं॥ २९॥ अभिधेयाधिदेवताका नाम "विश्वम्भर' है :- प्रथमलीलाय ताँर विश्वम्भर नाम। भक्तिरसे भरिल, धरिल भूतग्राम ॥ ३२॥ अनुवाद- प्रथम लीला अर्थात् आदिलीलामें उनका नाम 'विश्वम्भर' था। उन्होंने भक्तिरसके द्वारा समस्त जीवोंका पोषण किया और उन्हें इस (भक्तिरस) में स्थिर रखा॥ ३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'भूतग्राम' - जीवसमूह ॥ ३२ ॥
[ ३/३३-३४ डुभृञ् धातुर् अर्थ—पोषण, धारण। पुषिल, धरिल प्रेम दिया त्रिभुवन॥३३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘विश्वम्भर’ शब्द ‘डुभृञ्’ धातुसे बनता है। उस धातुका अर्थ पोषण और धारण करना है। महाप्रभुने अपना प्रेम देकर त्रिभुवनका पोषण किया और उसे धारण किया॥ ३३॥ अमृतानुक्रमणिका—पहले वराहावतारमें पृथ्वी जलमग्न होनेपर भगवन्नारायणने उसका उद्धारकर विश्वपालन किया, इसलिये भगवान्का नाम ‘विश्वम्भर’ हुआ। हयग्रीव अवतारके पूर्व जलमग्न पृथ्वीमें अधोक्षज वस्तुका परिचय विलुप्त होकर अक्षजज्ञानके समुद्रमें वेदशास्त्र डूब गये, तब भगवान् हयग्रीवने मधु और कैटभकी अक्षजज्ञानकी पहचान (स्मृतिचिह्न) और निसर्गवादका संहार करके अवतार-विचार वेदतात्पर्यरूपसे प्रचार किया था। तब भी उनका नाम ‘विश्वम्भर’ हुआ था। अनेक बार असुरोंके द्वारा देव-मानवादि सताये जानेपर नारायणके विभिन्न प्रकाशसमूह प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर विश्वकी रक्षा करते हैं, उन-उन अवतारोंका नाम भी ‘विश्वम्भर’ होता है। इसलिये महाप्रभुका नाम भी ‘विश्वम्भर’ रखना सङ्गत था। ये गौर-विश्वम्भर विष्णुके विभिन्न अवतारोंके दीपस्वरूप हैं। उनकी जन्मपत्रीसे भी कालविचारसे यह जाना जाता है कि वे स्वयंरूप और सभी विष्णुतत्त्वोंकी मूल वस्तु हैं। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है, इसलिये भक्तिरस ही उसका एकमात्र जीविका है। किन्तु अनादि-बहिर्मुख जीव श्रीकृष्णको भूलकर मायाके सुख-दुःखमें निमग्न हो गया है। श्रीकृष्ण-सेवाजनित भक्तिरसके अभावमें उसका स्वरूप क्षीण हो गया है। परम दयालु श्रीगौरसुन्दर उसकी बहिर्मुखता दूर करके उसको भक्तिरस दान करते हैं और उस भक्तिरसको पानकर उसका चिन्मय स्वरूप परिपुष्ट हो जाता है। इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर जीवोंका पोषण करते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु उसे भक्तिरस प्रदानकर जिस अवस्थामें लाते हैं, उसी अवस्थामें धारणकर उसे स्थिर रखते हैं और वह उस अवस्थासे च्युत नहीं होता अर्थात् वह पुनः मायिक सुखके लिये ललायित नहीं होता। इस प्रकार महाप्रभु जीवोंको धारण करते हैं। इस प्रकार भक्तिरसके द्वारा जीवोंका पोषण और उन्हें धारण करनेके कारण महाप्रभुका नाम हुआ है—‘विश्वम्भर’॥३३॥ सम्बन्धाधिदेवताका नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ है :- शेषलीलाय धरे नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’। श्रीकृष्ण जानाये सब विश्व कैल धन्य॥३४॥ अनुवाद—शेषलीलामें उनका नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ हुआ। इस लीलामें उन्होंने श्रीकृष्णके नाम-गुण-रूप-लीला और उनके गूढ़ रहस्योंको समस्त जगत्में प्रकाशित करके विश्वको धन्य किया॥ ३४॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने संन्यास ग्रहणके बाद चौबीस वर्षतक जो लीलाएँ की, उन्हें शेषलीला कहा जाता है। श्रीविष्णुस्वामि-सम्प्रदायमें दशनामी और अष्टोत्तरशतनामी त्रिदण्डि वैदिक-संन्यासी ११६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
श्रीशङ्कराचार्यके समयसे बहुत पहले वर्तमान थे, तो भी स्वयंको निर्विशेषवादी वैदान्तिक कहनेवाले शङ्कराचार्यके प्रकट होनेपर भारतमें पञ्चोपासक-समाज पुनर्गठित हुआ। श्रीमन्महाप्रभुने श्रीशङ्कराचार्य-सम्प्रदायमें दशनामी एकदण्डि-संन्यासकी प्रथाके अनुसार वैदिक संन्यास ग्रहण किया। आर्यावर्त्तमें वैदिकाभास अर्थात् स्वयंको वेदानुग कहनेवाले बहुतसे आर्यसमाज शङ्कराचार्यके अनुगामी हैं और शाङ्करसम्प्रदायके शासनानुसार पञ्चोपासक हैं। “तीर्थाश्रमवनारण्यगिरिपर्वतसागराः। सरस्वती भारती च पुरी नामानि वै दशः॥” दशनामी संन्यासियोंके नाम इस प्रकार हैं—“तीर्थ, आश्रम, वन, अरण्य, गिरि, पर्वत, सागर, सरस्वती, भारती और पुरी।” प्रत्येकके संन्यासको, स्थानको और ब्रह्मचारीकी उपाधिको यथाक्रम लिखा हुआ है (मञ्जुषा दूसरी संख्या, पृष्ठ १०४-१०७ द्रष्टव्य है)। संन्यासकी उपाधि-तीर्थ और आश्रम; स्थान-द्वारका; ब्रह्मचारी नाम-स्वरूप। संन्यासकी उपाधि-वन और अरण्य; स्थान-पुरुषोत्तम (जगन्नाथ पुरी); ब्रह्मचारी नाम-प्रकाश। संन्यासकी उपाधि-गिरि, पर्वत और सागर; स्थान-बदरिकाश्रम; ब्रह्मचारी नाम-आनन्द। संन्यासकी उपाधि-सरस्वती, भारती और पुरी; स्थान-शृङ्गेरी; ब्रह्मचारीनाम-चैतन्य। श्रीशङ्कराचार्यने सम्पूर्ण भारतमें (पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण प्रदेशमें) चार मठ स्थापित करके अपने चार शिष्योंको उनका मठाधीश नियुक्त किया। इस चार मूलमठोंके अधीन असंख्य शाखामठोंका विस्तार हुआ। श्रीशङ्कराचार्यने चारों मठोंमें समान विचारधाराका निर्देश किया था, परन्तु अनेक क्षेत्रोंमें इसका विपर्यय दिखायी देता है। इन चार मठोंमें आनन्दवार, भोगवार, कीटवार और भूमिवार चार प्रकारके सम्प्रदाय हैं। समयके प्रभावसे इन सम्प्रदायोंकी धारणामें भी परिवर्तन दिखायी देता है। शङ्कर-सम्प्रदायके चार महावाक्योंके भी अलग-अलग मठके अनुसार विभाग हैं। संन्यास ग्रहणसे पहले मठाधीश संन्यासी गुरुके पास जाकर ब्रह्मचारी बनना होता है। जिस प्रकारके वे संन्यासी होते हैं, उसीके अनुसार 'ब्रह्मचारी' नाम देते हैं। यह प्रथा आज भी सम्प्रदायमें विशेषरूपसे चली आ रही है। केशव भारतीसे संन्यास ग्रहण करनेपर श्रीमन्महाप्रभुका ब्रह्मचारी नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' हुआ था। संन्यास ग्रहण करनेके बाद भी भगवान्ने अपने ब्रह्मचारी नामका ही प्रचार किया। उनके द्वारा संन्यासी नाम 'भारती' ग्रहण करके भी उस नामसे अपना परिचय देनेकी बात उनके किसी भी लीलालेखकने नहीं लिखी है। शङ्कर-सम्प्रदायमें संन्यास-नामके साथ स्वयंमें ईश्वर होनेका अभिमान (जीव ब्रह्म ही है) जुड़ा है, ऐसा जानकर उस प्रकारके व्यवहारका श्रीमन्महाप्रभुने आदर नहीं किया। 'ब्रह्मचारी' नाममें गुरुदास्यका अभिमान संयुक्त होनेके कारण वह भक्तिके प्रतिकूल नहीं है। महाप्रभुने दण्ड और कमण्डलु आदि संन्यासके चिह्नोंको ग्रहण किया था, ऐसा उल्लेख है॥३४॥ ताँर युगावतार जानि' गर्ग महाशय। कृष्णेर नामकरणे करियाछे निर्णय॥ ३५॥ अनुवाद-गर्गाचार्यजीने श्रीकृष्णचैतन्यको कलियुगके युगावतार रूपमें जानकर श्रीकृष्णके नामकरणके समय यह भविष्यवाणी की थी॥ ३५॥
[ ३/३५-३८ अमृतप्रवाह भाष्य—गर्गाचार्यजीने श्रीकृष्णचैतन्यको कलियुगका अवतार जानकर निम्नलिखित श्लोकमें उनके वर्णका निरूपण किया है॥ ३५॥ चारयुगोंमें चार वर्ण अवतार :- श्रीमद्भागवत (१०/८/१७)— आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ ३६॥ अनुवाद—आपका यह पुत्र प्रत्येक युगमें श्रीविग्रह धारण अर्थात् अवतार ग्रहण करता है। यह सत्ययुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें रक्तवर्ण, कलिमें पीतवर्ण और अब द्वापरमें श्यामवर्ण है। अतः इसका नाम कृष्ण होगा॥ ३६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम्हारा यह बालक अन्य तीन युगोंमें शुक्ल, रक्त और पीतवर्ण धारण करता है। अभी द्वापर युगमें इसने कृष्णवर्ण धारण किया है॥ ३६॥ अनुभाष्य—गर्गाचार्यजी श्रीनन्दमहाराजको श्रीकृष्णके नामकरणके समय उनका वर्णन करते हुए उनके अन्य-अन्य अवतारों और उनके स्वयं अवतारी होनेकी बात कह रहे हैं— अनुयुगं (युगोचितं) तनूर्गृह्णतः अस्य (तव पुत्रस्य) शुक्लः रक्तः तथा (इति भविष्यन्निर्देशवाक्येन वैवस्वतमन्वन्तरस्याष्टाविंशमहायुगीयकलियुगस्य आदिसन्ध्यायां) पीतः (पीतवर्णः भविष्यति) त्रयो वर्णाः आसन्। इदानीं हि कृष्णतां गतः (प्राप्तः)। श्लोक-भावानुवाद—आपका पुत्र युगके अनुरूप श्रीविग्रह धारण करता है। (अन्य युगोंमें) आपके पुत्रके शुक्ल, रक्त और पीत [यह भविष्यवाणीरूप वाक्य है कि वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें महायुगके कलियुगकी प्रथम संध्यामें यह पीतवर्णमें आयेगा], ये तीन वर्ण होते हैं और अभी इसने कृष्णवर्णको प्राप्त किया है॥ ३६॥ शुक्ल, रक्त, पीतवर्ण—एइ तिन द्युति। सत्य-त्रेता-कलिकाले धरेन श्रीपति॥ ३७॥ इदानीं द्वापरे तिँहो हैला कृष्णवर्ण। एइ सब शास्त्रागम-पुराणेर मर्म॥ ३८॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण शुक्ल, रक्त और पीत, इन तीन वर्णोंको क्रमशः सत्य, त्रेता और कलियुगमें धारण करते हैं। अब इस द्वापरयुगमें वे कृष्णवर्ण हुए हैं, यह सभी शास्त्रों, आगम और पुराणोंका सार है॥ ३७-३८॥ अमृतानुकणिका—नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम करभाजन चारों युगोंमें भगवान्के वर्ण और विग्रहके रूपका वर्णन करते हुए कह रहे हैं (श्रीमद्भागवत ११/५/२१,२४)— “कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बरः। कृष्णाजिनोपवीताक्षन् बिभ्रद् दण्डकमण्डलू॥” अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रङ्ग श्वेत होता है। उनके चार भुजाएँ और सिरपर जटा होती है तथा वे वल्कलका ही वस्त्र पहनते हैं। वे काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं। उनका ब्रह्मचारी वेश होता है।” ११८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/३७-४० ]
“त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः। हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः ॥” अर्थात् “त्रेतायुगमें भगवान्का श्रीविग्रह लाल रङ्गका होता है। उनके चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं।”॥ ३७-३८॥ श्रीमद्भागवत (११/५/२७)— द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः। श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः॥ ३९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बर और वंशी आदि निज-आयुधधारी, श्रीवत्सादि चिह्नोंसे युक्त-इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ ३९॥ अनुभाष्य—‘किस कालमें किस रूपमें भगवान्का अवतार होता है', विदेहराज निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे श्रीकरभाजन सत्य और त्रेतायुगके अवतारोंका वर्णन करनेके बाद द्वापरके अवतारके सम्बन्धमें वर्णन कर रहे हैं,- द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासाः (पीतः वासो यस्य सः) निजायुधः (निजानि आयुधानि गदाचक्रादीनि यस्य सः) श्रीवत्सादिभिः अङ्कैः (आङ्गिकैश्चिह्नैः) लक्षणैः (बाह्यैः कौस्तुभादिभिश्च) उपलक्षितः। श्लोक-भावानुवाद—द्वापरमें भगवान् श्यामवर्णके, जिनके पीत वस्त्र हैं, गदा-चक्रादि निज अस्त्र हैं, अङ्गोंमें श्रीवत्सादि चिह्न हैं तथा बाहर कौस्तुभ आदि धारण करते हैं, वे इन लक्षणोंके साथ प्रकट होते हैं॥ ३९॥ कलियुगावतारका लक्षण :- कलियुगे युगधर्म—नामेर प्रचार। तथि लागि' पीतवर्ण चैतन्यावतार ॥४०॥ अनुवाद—कलियुगमें नाम-सङ्कीर्तन युगधर्म है और पीतवर्ण धारणकर श्रीचैतन्यमहाप्रभु इस युगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४०॥ अनुभाष्य—श्रीमध्वाचार्यने मुण्डकोपनिषद्के भाष्यमें श्रीनारायण-संहितासे प्रमाण लिखा है— “द्वापरियैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः ॥” अर्थात् “द्वापर युगमें भगवान् विष्णुकी पूजा नारद पञ्चरात्रादि शास्त्रोंकी विधिके अनुसार करनी चाहिये। कलियुगमें केवल नामके द्वारा श्रीहरिकी पूजा होती है।” कलिसन्तरणोपनिषद्में भी लिखा है— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते ॥” अर्थात् “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे;
तीसरा अध्याय | ११९
[ ३/४०-४३ ये सोलह नाम कलिके समस्त दोषोंका नाश करनेवाले हैं और इससे श्रेष्ठ उपाय सभी शास्त्रोंमें देखनेपर कहीं भी दिखलायी नहीं देता॥”४०॥ अमृतानुकणिका— “युगधर्म प्रवर्त्तन हय अंश हैते। आमा बिना अन्ये नारे व्रजप्रेम दिते॥” कलियुगमें हरिकीर्त्तन ही युगधर्म है। उसे श्रीगौरसुन्दरके अंशावतार ही स्थापित करते हैं, किन्तु श्वेतवराहकल्पमें वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें कलियुगमें श्रीनामप्रचार-रूप युगधर्मकी स्थापनाके उद्देश्यसे, किन्तु मुख्यतः व्रजप्रेम देनेके लिये जो अवतीर्ण होते हैं, वे ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ हैं। यहाँपर ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ कहकर निर्देश करनेका कारण यह है कि साधारणतः कलियुगमें जो युगावतार हैं, उनका नाम और वर्ण ‘कृष्ण’ होता है, किन्तु विशेष कलियुगमें जो श्रीचैतन्यावतार हैं, वे ही केवल पीतवर्ण हैं। लघुभागवतामृतमें युगावतारके प्रसङ्गमें उल्लेख किया गया है,– “कथ्यते वर्णनामाभ्यां शुक्लः सत्ययुगे हरिः। रक्तः श्यामः क्रमात् कृष्णस्त्रेतायां द्वापरे कलौ॥” अर्थात् “वर्ण और नामके द्वारा हरि सत्ययुगमें शुक्ल, त्रेतायुगमें रक्त, द्वापरयुगमें श्याम और कलियुगमें कृष्ण कहे जाते हैं।” श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु इसकी टीकाम्रें कहते हैं,– “सामान्यतः सभी कलियुगोंमें ही कृष्णवर्ण और उस नामके युगावतार—‘कृष्णः कलियुगे विभु’ इस हरिवंश प्रमाणके अनुसार हैं। इसलिये जिस कलियुगमें स्वर्णगौर-वर्ण श्रीकृष्णचैतन्य अवतीर्ण होते हैं, उस कलियुगमें वे ‘कृष्ण’ रूप युगावतार उनके भीतर समाहित होते हैं, यह समझना होगा।” श्रीमद्भागवतमें युगावतारके प्रसङ्गमें कहा गया है— “कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णम्” (भाः ११/५/३२)। इस श्लोककी व्याख्यामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं,— “सभी कलियुगोंके लिये ‘कृष्णवर्ण’ अर्थात् उनके अवतारोंकी देह कृष्णवर्णकी होती है, परन्तु इस विशेष कलियुगमें उनसे पार्थक्य दिखानेके लिये कहा गया है ‘त्विषाऽकृष्णं’ अर्थात् इन्द्रनीलमणिकी भाँति जो उज्ज्वल हैं। एक विशेष कलियुगके लिये कृष्णवर्ण, किन्तु कान्तिमें ‘अकृष्ण’ कहनेसे पीतवर्ण समझना चाहिये अर्थात् अन्तरमें कृष्णवर्ण किन्तु बाहर गौरवर्ण हैं, यह अर्थ है।”॥४०॥ तप्तहेम-सम कान्ति, प्रकाण्ड शरीर। नवमेघ-जिनि कण्ठध्वनि ये गम्भीर॥४१॥ अनुवाद—उनके दीर्घ तनु (शरीर) की कान्ति तपे हुए स्वर्णकी भाँति है और उनकी गम्भीर कण्ठध्वनि नवमेघोंकी मन्द-मन्द गर्जनको भी परास्त करनेवाली है॥४१॥ दैर्घ्य-विस्तारे येइ आपनार हात। चारि हस्त हय ‘महापुरुष’ विख्यात॥४२॥ ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ हय ताँर नाम। न्यग्रोधपरिमण्डल-तनु चैतन्य गुणधाम॥४३॥ अनुवाद—जिनके शरीरकी लम्बाई (पदतलसे शीशके ऊपरी भाग तक) और चौड़ाई (दोनों हाथ फैलाकर दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंके नखके सिरोंके बीच) अपने हाथसे मापकर चार हाथके बराबर होती है, वे ‘महापुरुष’ होते हैं। उन्हें ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ कहा जाता है। चैतन्य महाप्रभु जो सभी सद्गुणोंके धाम हैं, उनका शरीर न्यग्रोधपरिमण्डलका था॥४२-४३॥ १२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/४२-४९ ] अमृतप्रवाह भाष्य-जो अपने हाथसे मापकर चार हाथ लम्बे और चौड़े होते हैं, वे महापुरुष कहलाते हैं और उनका नाम 'न्यग्रोधपरिधिमण्डल' होता है॥४२-४३॥ अनुभाष्य-'न्यग्रोधपरिधिमण्डल'–जो अपने हाथके मापसे चार हाथ लम्बे और चार हाथ चौड़े अर्थात् जिनकी गोलाकार परिधि चार हाथकी होती है, वे 'महापुरुष' होते हैं। जिन्होंने सभी प्राणियोंको अपने अधीनकर अपनी मायाके द्वारा बद्ध किया है, इस प्रकार वे पूर्ण चतुर्व्यूहयुक्त विष्णु हैं॥४२-४३॥ आजानुलम्बित-भुज कमललोचन। तिलफुल-जिनि नासा, सुधांशु-वदन॥४४॥ शान्त, दान्त, कृष्णभक्ति-निष्ठापरायण। भक्तवत्सल, सुशील, सर्वभूते सम॥४५॥ चन्दनेर अङ्गद-बाला, चन्दन-भूषण। नृत्यकाले परि' करेन कृष्णसङ्कीर्त्तन॥४६॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी घुटनोंतक लम्बी भुजाएँ हैं, उनके नेत्र कमलपुष्पके समान हैं, तिलफूलसे अधिक सुन्दर उनकी नासिका है और उनका मुखमण्डल चन्द्रकी भाँति सुन्दर है। वे शान्त, जितेन्द्रिय, कृष्णभक्तिमें निष्ठापरायण, भक्तोंके प्रति विशेष स्नेहशील, सुशील और सभी प्राणियोंमें समदर्शी हैं। श्रीकृष्णसङ्कीर्तनके लिये विशेषरूपसे वे चन्दनके बाजूबन्द और कङ्कन पहनते हैं और अपने अङ्गोंमें चन्दनके तिलक धारण करते हैं॥४४-४६॥ एइ सब गुण लञा मुनि वैशम्पायन। सहस्रनामे कैल ताँर नाम-गणन॥४७॥ अनुवाद-इन सभी गुणोंको देखकर मुनि वैशम्पायनने विष्णु सहस्रनाममें उनके नामोंका उल्लेख किया है॥४७॥ अनुभाष्य-महाभारतके अन्तर्गत दानधर्मके १४९वें अध्यायमें विष्णुके सहस्रनाम दिये गये हैं। श्रीशङ्कराचार्य, श्रीबलदेव विद्याभूषण और अन्य-अन्य वैष्णवाचार्योंने महाभारतपर अपने-अपने भाष्य लिखे हैं॥४७॥ दुइ लीला चैतन्येर—आदि आर शेष। दुइ लीलाय चारि चारि नाम विशेष॥४८॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी 'आदिलीला' और 'शेषलीला' नामक दो लीलाएँ हैं। इन दोनों लीलाओंमें उनके चार-चार विशेष नाम हैं॥४८॥ अनुभाष्य-'आदि'-गृहस्थलीला (प्रथम चौबीस वर्ष) और 'शेष'-संन्यासलीला (अन्तिम चौबीस वर्ष) है। इसी अध्यायके पयार संख्या ३२-३४ द्रष्टव्य है। 'चारि चारि नाम'–अगले श्लोक संख्या ४९ में वर्णित है॥४८॥ महाभारतमें दान-धर्ममें (१२७ अ.) सहस्रनाममें (९२, ७५)– सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठाशान्तिपरायणः॥४९॥ तीसरा अध्याय | १२१
[ ३/४९ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग, सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित-ये चार लक्षण महाप्रभुकी गृहस्थलीलामें परिलक्षित होते हैं। संन्यासाश्रमी, हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्त्तनरूप महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान्, केवलाद्वैतवादी अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण-ये चार लक्षण महाप्रभुकी संन्यासलीलामें परिलक्षित होते हैं॥४९॥ अनुभाष्य-सुवर्णवर्णः (स्वर्णवर्णवत् पीतवर्णः यस्य सः) हेमाङ्ग (हेमवत् अङ्गं यस्य सः) वराङ्गः (महापुरुषबोधकं अङ्गं यस्य सः) चन्दनाङ्गदी (चन्दनाङ्गिते अङ्गदे विद्यते यस्य सः) [आदिलीलायां भगवतो गौरचन्द्रस्य एतानि चत्वारि नामानि]। संन्यासकृत् (यतिधर्मपरः) शमः (निर्विषयः) शान्तः (कृष्णैकनिष्ठचित्तः) निष्ठाशान्तिपरायणः (निष्ठा चित्तैकाग्र्यं च शान्ति च निष्ठाशान्ती परम् अयनं आश्रयो यस्य सः) [शेषलीलायां भगवतो गौरहरेर्नामानि चतुःसंख्यकानि सहस्रनाम्नि उदाहृतानि]। श्लोक-भावानुवाद-स्वर्णके वर्ण जैसा पीला रंग है जिनका, स्वर्ण जैसे अङ्ग हैं जिनके, जिनके अङ्गोंसे महापुरुष होनेका बोध होता है, तथा चन्दनसे अङ्कित तिलकादि जिनके अङ्गोंमें विद्यमान हैं, वे [आदिलीलामें भगवान् श्रीगौरचन्द्रके ये चार नाम हैं]; संन्यासधर्मपरायण, विषयोंसे विरक्त, श्रीकृष्णमें ही एकनिष्ठ चित्तवाले, एकाग्रचित्त और शान्त अथवा निष्ठा और शान्तिके परमाश्रय हैं जो, वे [विष्णु सहस्रनामोंसे उद्धृत भगवान् श्रीगौरहरिके शेषलीलाके ये चार नाम हैं]। विष्णुसहस्रनामका श्रीबलदेवविद्याभूषणके ‘नामार्थ-सुधाभिध’ भाष्यमें- “सुवर्णस्येव वर्णो रूपमस्येति सुवर्णवर्णः-“यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ इति श्रुतेः। हेमवत् स्पृहणीयानी वर्णाधिष्ठानान्यङ्गानि यस्य सः हेमाङ्गः। वराणि सौन्दर्यवन्त्यङ्गानि अस्येति वराङ्गः। चन्दने भक्तचित्ताह्लादके अङ्गदे अस्येति चन्दनाङ्गदी। सुवर्णवर्णादि चतुष्टयं केचित् कृष्णचैतन्यतायां योजयन्ति। अथ कृष्णचैतन्यतां द्योतयन्नाह षड्भिः-संन्यासं परिव्रज्यं करोतीति संन्यासकृत्। शमयत्यालोचयति रहस्यं हरेरिति शमः। शम आलोचने चुरादिमत्। शाम्यत्युपरमिति कृष्णान्यविषयादिति शान्तः। नितिष्ठन्त्यस्यां हरिकीर्त्तन-प्रधाना भक्तियज्ञा इति निष्ठा-“कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं’ इति स्मरणात्। शाम्यन्त्यनया भक्तिविरोधिनः केवलाद्वैतप्रमुखान् इति शान्तिः। महाभावान्तानां भावभेदानां परममयनमिति परायणम्।” अर्थात् “उनका सुवर्ण (स्वर्ण) की भाँति वर्ण अर्थात् रूप है, इसलिये वे ‘सुवर्णवर्ण’ हैं। मुण्डक-श्रुतिमें इसका प्रमाण इस प्रकार है-‘जिस समय साधक स्वर्णवर्णविग्रह, जगत्कर्त्ता, ब्रह्मयोनि परमपुरुष ईश्वरका दर्शन करते हैं’ आदि। हेम (स्वर्ण) के समान लोभनीय वर्णके अधिष्ठानस्वरूप जिनके अङ्ग हैं, वे ‘हेमाङ्ग’ हैं। उनके अङ्ग सर्वोत्तम सौन्दर्यमय हैं, इसलिये वे ‘वराङ्ग’ हैं। उनके चन्दन अर्थात् भक्तोंके चित्तको आनन्द प्रदान करनेवाले बाजूबन्द हैं, इसलिये वे ‘चन्दनाङ्गदी’ हैं। सुवर्णवर्णादि इन चार नामोंको भी कोई-कोई श्रीकृष्णचैतन्यके साथ जोड़ते हैं। अब श्रीकृष्णचैतन्यको प्रकाश करनेके लिये छह नाम कहे गये हैं। वे संन्यास अर्थात् परिव्रज्याको ग्रहण करनेवाले हैं, इसलिये ‘संन्यासकृत्’ है। वे श्रीहरिकी आलोचना करते हैं, इसलिये वे ‘शम’ हैं-चुरादिमें ‘शम’ धातु आलोचनाके लिये प्रयुक्त होता है। श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे निवृत्त होनेके कारण वे ‘शान्त’ हैं। उनमें हरिकीर्त्तन-प्रधान भक्तियज्ञ निश्चितरूपसे अवस्थान करता है, इसलिये वे ‘निष्ठा’ कहलाते हैं; ‘कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं’-भागवतका यह १२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
श्लोक इसका प्रमाण है। केवल-अद्वैतवादादि प्रमुख भक्तिविरोधी मतोंका उनके द्वारा उपशमन होता है, इसलिये वे 'शान्ति' कहलाते हैं। समस्त भावोंके परमाश्रय स्वरूप महाभावकी चरम सीमा हैं, इसलिये वे 'परायण' (परा अर्थात् परम और अयन अर्थात् आश्रय) कहलाते हैं।"॥४९॥ व्यक्त करि' भागवते कहे बार बार। कलियुगे कृष्ण-नामसङ्कीर्त्तन-सार॥५०॥ अनुवाद-भागवतमें बारम्बार यह स्पष्टरूपसे कहा गया है कि कलियुगमें श्रीकृष्ण-नामसङ्कीर्तन ही परम धर्म है॥५०॥ श्रीमद्भागवत (११/५/३२)- कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥५१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं। श्रीजीव गोस्वामीजीने क्रमसन्दर्भमें लिखा है- “त्विषा कान्त्या योऽकृष्णो गौरस्तं कलौ सुमेधसो यजन्ति। गौरत्वञ्चास्य “आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः” इत्यत्र पारिशेष्यप्रमाण-लब्धम्। 'इदानीम्' एतदवतारास्पदत्वेनाभिख्याते द्वापरे 'कृष्णतां गतः' इत्युक्तेः, शुक्लरक्तयोः सत्यत्रेतागतत्वेन दर्शितं पीतस्यातीतत्वं प्राचीनावतारापेक्षया। अत्र श्रीकृष्णस्य परिपूर्णरूपत्वेन वक्ष्यमाणत्वाद् युगावतारत्वम्, - तस्मिन् सर्वेऽप्यवतारा अन्तर्भूता इति तत्तत्प्रयोजनं तस्मिन्नेकस्मिन्नेव सिद्ध्यतीत्यपेक्षया। तदेवं यद्द्वापरे कृष्णोऽवतरति, तदेव कलौ श्रीगौरोऽप्यवतरतीति स्वारस्यलब्धेः श्रीकृष्णविर्भावविशेष एवायं गौर इत्यायाति, तदव्यभिचारात्।” “तदेतदाविर्भावत्वं तस्य स्वयमेव विशेषणद्वारा व्यनक्ति। 'कृष्णवर्णं'- कृष्णेत्येतौ वर्णौ च यत्र; यस्मिन् श्रीकृष्णचैतन्यदेव-नाम्नि कृष्णत्वाभिव्यञ्जकं कृष्णेति-वर्णयुगलं प्रयुक्तमस्तीत्यर्थः। तृतीये श्रीमदुद्धववाक्ये “समाहुता' इत्यादि-पद्ये 'श्रियः सवर्णेन' इत्यत्र टीकायां - "श्रियो रुक्मिण्याः समानवर्णद्वयं वाचकं यस्य सः, श्रियः सवर्णो रुक्मीत्यपि दृश्यते'; यद्वा, कृष्णं वर्णयति तादृशस्वपरमानन्दविलास-स्मरणोल्लासवतया स्वयं गायति, परमकारुणिकतया च सर्वेभ्योऽपि लोकेभ्यस्तमेवोपद्दिशति यस्तम्; अथवा स्वयमकृष्णं गौरं त्विषा स्वशोभा-विशेषेणैव कृष्णोपदेष्टारञ्च, यद्दर्शनेनैव सर्वेषां श्रीकृष्णः स्फुरतीत्यर्थः; किंवा, सर्वलोकद्रष्टावकृष्णं गौरमपि भक्त-विशेषदृष्टौ 'त्विषा' प्रकाशविशेषेण कृष्णवर्णं, तादृश-श्यामसुन्दरमेव सन्तमित्यर्थः। तस्मात्तस्मिन् सर्वथा श्रीकृष्णरूपस्यैव प्रकाशात् तस्यैवाविर्भाव-विशेषः स इति भावः। तस्य भगवत्वमेव स्पष्टयति-'साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्'- अङ्गान्येव परममनोहरत्वादुपाङ्गानि भूषणादीनि, महाप्रभावत्वात् तान्येवास्त्राणि, सर्वदैवैकान्तवासित्वात्तान्येव पार्षदाः। बहुभिर्महानुभावैरसकृदेव तथा दृष्टोऽसाविति गौड़-वरेन्द्र-बङ्गोत्कलादिदेशीयानां महाप्रसिद्धेः; यद्वा, अत्यन्तप्रेमास्पदत्वात्तत्तुल्या एव पार्षदाः श्रीमदद्वैताचार्य-महानुभावचरणप्रभृतयस्तैः सह वर्त्तमानमिति चार्थान्तरेण व्यक्तम्। तमेवम्भूतं कैर्यजन्ति? यज्ञैः पूजासम्भारैः,-'न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः' इत्युक्तेः। तत्र च विशेषणेन तमेवाभिधेयं व्यनक्ति, 'सङ्कीर्त्तन' बहुभिर्मिलित्वा तद्गानसुखं श्रीकृष्णगानं तत्प्रधानैः, तथा सङ्कीर्त्तन-प्रधान्यस्य तदाश्रितेष्वेव दर्शनात्, स एवात्राभिधेय इति स्पष्टम्। अतएव सहस्रनाम्नि तदवतारसूचकानि नामानि कथितानि-“सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो
[ ३/५१
वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। सन्न्यासकृच्छमः शान्तः" इत्येतानि। दर्शितञ्चैतत् परमविद्वच्छिरोमणिना श्रीसार्वभौमभट्टाचार्येण— “कालात्नष्टं भक्तियोगं निजं यः प्रादुष्कर्तुं कृष्णचैतन्यनामा। आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे गाढं गाढं लीयतां चित्तभृङ्गः॥” इति सर्वसंवादिन्याम्। 'त्विषा' अर्थात् जिनकी कान्ति 'अकृष्ण' अर्थात् गौरवर्ण है, कलियुगमें बुद्धिमान लोग उनकी उपासना करते हैं। उनके इस गौरवर्णकी बात गर्गाचार्यजीने परोक्षरूपसे श्रीनन्दमहाराजसे कही, — 'तुम्हारा यह पुत्र प्रत्येक युगमें विग्रह धारण करता है। अन्य तीन युगोंमें यह शुक्ल, रक्त और पीत, इन तीन वर्णोंका था, अभी इसने कृष्णवर्णको धारण किया है।' इस वाक्यमें वर्णित चार वर्णोंमें शुक्ल, रक्त और श्यामवर्णके अतिरिक्त जो 'पीतवर्ण' है, उससे महाप्रभुके अवतारका प्रमाण पाया जाता है। 'इदानीं' अर्थात् वर्तमान अवतारकाल रूपमें वर्णित द्वापरयुगमें 'वे कृष्णवर्णको प्राप्त हुए हैं'—इस उक्तिके कारण और सत्यमें शुक्ल एवं त्रेतायुगमें रक्तवर्णकी प्राप्तिके कारण भगवान्के पूर्व-पूर्व कलियुगोंमें पीतवर्णधारी अवतारको लक्ष्य करके ही इस पीतवर्णका प्रयोग भूतकालमें हुआ है। यहाँपर श्रीकृष्णका युगावतारके रूपमें वर्णन हुआ है और उनके परिपूर्णरूपकी व्याख्या बादमें होगी कि सभी अवतार उन्हींमें समाहित हैं और सभी अवतारोंकी प्रयोजनीयता केवल एक उनसे ही सिद्ध होती है। इसी प्रकार जिस द्वापरमें श्रीकृष्ण अवतीर्ण होते हैं, उसी चतुर्युगके कलियुगमें ही श्रीगौरसुन्दर भी अवतीर्ण होते हैं—इस प्रकार तात्पर्य होनेसे ऐसा कह सकते हैं कि श्रीगौरसुन्दर ही श्रीकृष्णके आविर्भाव-विशेष हैं, यह सिद्ध होता है, क्योंकि इनके अवतार लेनेका क्रम कभी भङ्ग नहीं होता। श्रीगौरसुन्दरके अवतारकी बात ऋषिवर करभाजनने स्वयं उनके सम्बन्धमें कहे गये विशेषणके द्वारा व्यक्त की है, जैसे,—'कृष्णवर्णं'—'कृ' और 'ष्ण' ये दो वर्ण जिनमें अर्थात् जिनके नाम श्रीकृष्णचैतन्यके मध्य कृष्णत्वसूचक इन दो वर्णोंका प्रयोग हुआ है। (इस प्रकारकी व्याख्या काल्पनिक नहीं है, इसलिये दृष्टान्तरूपमें कह रहे हैं) जैसे, श्रीधरस्वामीने अपनी टीकामें श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें उद्धवजीके द्वारा कहे गये 'समाहुता----' पद्यमें 'श्रियः सवर्णेन' अंशकी व्याख्या की है—'श्री अर्थात् रुक्मिणीजीके समान दो वर्ण जिनके वाचक हैं, वे रुक्मी।' (यहाँपर श्लोकका अर्थ इस प्रकार हुआ है—श्रीरुक्मिणी नामके समान दो वर्ण जिनके नामके मध्य हैं, उन्हीं रुक्मीके द्वारा राजागण आमन्त्रित हुए थे)। इसलिये जैसे 'श्रियः सवर्णः' कहनेसे 'रुक्मी' का बोध होता है, उसी प्रकार 'कृ' और 'ष्ण' वर्णोंसे श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुको समझना चाहिये। अथवा 'कृष्णवर्णं' पदसे सूचित होता है कि जो 'कृष्ण'-नामका 'वर्णन' करते हैं अर्थात् अपने परमानन्द-विलासके स्मरणजनित उल्लासवशतः स्वयं इस नामका कीर्तन करते हैं और परम करुणावशतः समस्त जीवोंको जो इस नामका उपदेश करते हैं, वे ही श्रीगौरसुन्दर हैं। अथवा वे स्वयं 'अकृष्ण' अर्थात् गौर होकर भी 'त्विषा' अर्थात् अपनी शोभाविशेषके द्वारा ही 'कृष्ण'-सम्बन्धमें उपदेशदाता हैं अर्थात् जिनके दर्शनसे सभीको श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुणादिकी स्फूर्ति होती है; किम्वा सभीकी दृष्टिमें वे 'अकृष्ण' अर्थात् गौर होनेपर भी भक्त-विशेषकी दृष्टिमें 'त्विषा' विशेषप्रकाशयोगसे 'कृष्णवर्णं' अर्थात् उनके जैसे श्यामसुन्दर रूपमें ही स्थित हैं, ये वही श्रीगौरसुन्दर हैं। इसलिये उनमें सभी प्रकारसे श्रीकृष्णरूपका ही प्रकाश होनेपर, ये श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं, यही भावार्थ है।
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३/५१-५२ ]
‘साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्’—इस वाक्यमें उनकी भगवत्ताको स्पष्ट कर रहे हैं। उनके अभिन्न ‘अङ्ग’ समूह परम मनोहर हैं और ‘उपाङ्ग’ या भूषणादि महाप्रभावयुक्त हैं, ये सभी उनके ‘अस्त्र’ हैं। तथा जो सदा ही एकान्तरूपसे उनके सान्निध्यमें वास करते हैं, वे सभी उनके ‘पार्षद’ हैं। उनकी इस प्रकार रूपकी शोभाका जिन बहुतसे महाजनोंने अनेक बार दर्शन किया है, वे गौड़, वरेन्द्र, बङ्ग, उत्कलादि देशवासियोंके मध्यमें भी विशेष प्रसिद्ध हैं। अथवा अङ्ग, उपाङ्ग और अस्त्रतुल्य उनके अतिशय प्रेमके पात्र श्रीअद्वैताचार्य आदि अतिप्रभावशाली पार्षदोंके साथ वे सदा विद्यमान रहते हैं, इस प्रकार अन्य अर्थ ग्रहण करनेसे भी वे ही व्यक्त होते हैं। इस प्रकारसे वर्णित उन गौरसुन्दरकी सुमेधा लोग किस-किस उपायसे आराधना करते हैं? वे यज्ञरूप पूजा-सामग्रीके द्वारा उनकी आराधना करते हैं, क्योंकि ‘जिस स्थानमें श्रीकृष्णकीर्तनरूप महोत्सव नहीं होता है, वह स्थान स्वर्गलोक होनेपर भी रहने योग्य नहीं है’, देवोंका यह वाक्य (भाः ५/१९/२३) इसका प्रमाण है। उसमें ‘सङ्कीर्त्तनप्रायैः’ इस विशेषणके द्वारा सङ्कीर्तनप्रधान यज्ञको ही आराधनाके उपायरूपमें व्यक्त कर रहे हैं। ‘सङ्कीर्तन’ अर्थात् अनेक लोगोंके द्वारा मिलकर जो श्रीकृष्णकीर्तन होता है, वही उस यज्ञमें प्रधान सामग्री है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके आश्रित भक्तोंमें ही सङ्कीर्तनका प्राधान्य दिखलायी देता है, इसलिये सङ्कीर्तन ही आराधनाका उपाय है, यह स्पष्ट है। इसलिये श्रीविष्णुसहस्रनामोंमें उनके अवतार सूचक—सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वराङ्ग, चन्दनाङ्गदी, संन्यासकृत, शान्तादि नामोंका वर्णन हुआ है। परमपण्डित-शिरोमणि श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भी इसीको व्यक्त किया है—‘कालक्रमसे लुप्त अपने भक्तियोगको जो पुनः प्रकटित करनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य नामसे आविर्भूत हुए हैं, उनके चरणकमलोंमें मेरा मनरूपी भृङ्ग गाढ़रूपसे लीन हो।”॥५१॥ अनुभाष्य—‘कौनसे युगमें भगवान् किस रूपमें अवतीर्ण होते हैं?’—राजा निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीकरभाजन कलिकालके अवतारी और उनका भजन करनेकी प्रणालीका वर्णन करते हुए कह रहे हैं— सुमेधसः (बुद्धिमन्तः) त्विषा (कान्त्या) अकृष्णं (विद्युद्गौरं शुक्लरक्तवर्णद्वयावशेषं तृतीयं पीतवर्णं) कृष्णवर्णं (कृष्णं वर्णयति गायति यः तम्; यद्वा, कृष्णेति एतौ वर्णौ च यस्मिन् तं) साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् (अङ्गे नित्यानन्दाद्वैतौ, उपाङ्गानि श्रीवासादि-भक्ताः, अस्त्राणि हरिनामादीनि, पार्षदाः गदाधरदामोदरस्वरूपादयः, तैः सहितं) सङ्कीर्त्तनप्रायैः (बहुभिर्मिलित्वा हरिकथा-नाम-गानैः) यज्ञैः यजन्ति। श्लोक-भावानुवाद—शुक्ल और रक्त—इन दो वर्णोंके अतिरिक्त तीसरे विद्युतके समान पीतवर्ण जिनकी कान्ति है, जो ‘कृ’ और ‘ष्ण’, इन दो वर्णोंका गान करते हैं अथवा ये दो वर्ण जिनके नाम श्रीकृष्णचैतन्यमें हैं, अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षदसहित उन श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी बुद्धिमान लोग मिलकर हरिकथा-नाम-गानरूपी सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा आराधना करते हैं। [अङ्ग—श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु; उपाङ्ग—श्रीवासादि भक्त; अस्त्र—हरिनामादि; पार्षद—गदाधर पण्डित-स्वरूप दामोदरादि हैं]॥५१॥ शुन, भाइ, एइ सब चैतन्य-महिमा। एइ श्लोके कहे ताँर महिमार् सीमा॥५२॥
तीसरा अध्याय | १२५
[ ३/५२-५७ अनुवाद-हे भाइयों! अब श्रीचैतन्य महाप्रभुकी यह सब महिमा श्रवण कीजिये। इस श्लोकमें उनकी महिमाकी चरम सीमाका वर्णन किया गया है॥५२॥ 'कृष्णवर्णं'-श्लोककी व्याख्या :- 'कृष्ण' एइ दुइ वर्ण सदा याँर मुखे। अथवा, कृष्णके तिँहो वर्णे निज सुखे॥५३॥ कृष्णवर्ण-शब्देर अर्थ दुइ त' प्रमाण। कृष्ण बिनु ताँर मुखे नाहि आइसे आन॥५४॥ केह ताँरे बले यदि कृष्ण-वरण। आर विशेषणे तारे करे निवारण॥५५॥ अनुवाद-'कृष्ण'-ये दो वर्ण जिनके मुखमें सदा रहते हैं अथवा श्रीकृष्णका जो सदा सुखपूर्वक अपने श्रीमुखसे वर्णन करते हैं। कृष्णवर्ण शब्दके उपरोक्त ये दो अर्थ हैं। उनके मुखसे 'कृष्ण' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं निकलता है। यदि कोई यह कहे कि उनके शरीरका वर्ण कृष्ण है, तो यह बात इसके अगले विशेषणसे खण्डित हो जाती है॥५३-५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मूल श्लोकमें यदि कोई 'कृष्णवर्णं' शब्दसे कलियुगके उपास्य पुरुषको कृष्ण (अर्थात् कृष्णरूप कान्तियुक्त) कहते हैं, तो 'त्विषाऽकृष्णं' इस दूसरे विशेषणके अनुसार 'कृष्णवर्णं' का यह अर्थ नहीं हो सकता॥५५॥ देहकान्त्ये हय तैँहो अकृष्णवरण। अकृष्णवरणे ताँर कहे पीतवरण॥५६॥ अनुवाद-उनके शरीरका वर्ण निःसन्देह अकृष्ण अर्थात् कृष्ण नहीं है। 'अकृष्णवर्ण' कहनेसे यह पीतवर्णको सूचित करता है॥५६॥ स्तवमालामें द्वितीय-चैतन्याष्टकमें (१)- कलौ यं विद्वांसः स्फुटमभियजन्ते द्युतिभरा- दकृष्णाङ्गं कृष्णं मखविधिभिरुत्कीर्त्तनमयैः। उपास्यञ्च प्राहुर्यमखिलचतुर्थाश्रमजुषां स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥५७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाकी भावरूप द्युतिका आधिक्य होनेसे अकृष्ण अर्थात् गौररूपको प्राप्त श्रीकृष्णका कीर्त्तनमय यज्ञके द्वारा सभी पण्डित कलिकालमें स्पष्टरूपसे आराधना करते हैं। वे संन्यासके अन्तर्गत परमहंसरूप चतुर्थाश्रमका आश्रय ग्रहण करनेवालोंके एकमात्र उपास्यतत्त्व हैं। वही चैतन्याकृति परमपुरुष शीघ्र ही मेरे प्रति कृपा करें॥५७॥ अनुभाष्य-विद्वांसः (पण्डिताः) स्फुटं (स्पष्टं) द्युतिभरात् (कान्त्याधिक्यात्) अकृष्णाङ्गं (गौरं पीतवर्णं) कृष्णं उत्कीर्त्तनमयैः (उच्चैः कीर्त्तनाख्यभक्त्यवलम्बनैः) मखविधिभिः (नामयज्ञविधानैः) कलौ अभियजन्ते, यं च अखिलचतुर्थाश्रमजुषां (सकलभिक्षूणाम्) उपास्यं (पूज्यं) प्राहुः, सः चैतन्याकृतिः देवः नः (अस्मान्) अतितरां (अतिशयेन) कृपयतु। १२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत