श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/४२-४९ ] अमृतप्रवाह भाष्य-जो अपने हाथसे मापकर चार हाथ लम्बे और चौड़े होते हैं, वे महापुरुष कहलाते हैं और उनका नाम 'न्यग्रोधपरिधिमण्डल' होता है॥४२-४३॥ अनुभाष्य-'न्यग्रोधपरिधिमण्डल'–जो अपने हाथके मापसे चार हाथ लम्बे और चार हाथ चौड़े अर्थात् जिनकी गोलाकार परिधि चार हाथकी होती है, वे 'महापुरुष' होते हैं। जिन्होंने सभी प्राणियोंको अपने अधीनकर अपनी मायाके द्वारा बद्ध किया है, इस प्रकार वे पूर्ण चतुर्व्यूहयुक्त विष्णु हैं॥४२-४३॥ आजानुलम्बित-भुज कमललोचन। तिलफुल-जिनि नासा, सुधांशु-वदन॥४४॥ शान्त, दान्त, कृष्णभक्ति-निष्ठापरायण। भक्तवत्सल, सुशील, सर्वभूते सम॥४५॥ चन्दनेर अङ्गद-बाला, चन्दन-भूषण। नृत्यकाले परि' करेन कृष्णसङ्कीर्त्तन॥४६॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी घुटनोंतक लम्बी भुजाएँ हैं, उनके नेत्र कमलपुष्पके समान हैं, तिलफूलसे अधिक सुन्दर उनकी नासिका है और उनका मुखमण्डल चन्द्रकी भाँति सुन्दर है। वे शान्त, जितेन्द्रिय, कृष्णभक्तिमें निष्ठापरायण, भक्तोंके प्रति विशेष स्नेहशील, सुशील और सभी प्राणियोंमें समदर्शी हैं। श्रीकृष्णसङ्कीर्तनके लिये विशेषरूपसे वे चन्दनके बाजूबन्द और कङ्कन पहनते हैं और अपने अङ्गोंमें चन्दनके तिलक धारण करते हैं॥४४-४६॥ एइ सब गुण लञा मुनि वैशम्पायन। सहस्रनामे कैल ताँर नाम-गणन॥४७॥ अनुवाद-इन सभी गुणोंको देखकर मुनि वैशम्पायनने विष्णु सहस्रनाममें उनके नामोंका उल्लेख किया है॥४७॥ अनुभाष्य-महाभारतके अन्तर्गत दानधर्मके १४९वें अध्यायमें विष्णुके सहस्रनाम दिये गये हैं। श्रीशङ्कराचार्य, श्रीबलदेव विद्याभूषण और अन्य-अन्य वैष्णवाचार्योंने महाभारतपर अपने-अपने भाष्य लिखे हैं॥४७॥ दुइ लीला चैतन्येर—आदि आर शेष। दुइ लीलाय चारि चारि नाम विशेष॥४८॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी 'आदिलीला' और 'शेषलीला' नामक दो लीलाएँ हैं। इन दोनों लीलाओंमें उनके चार-चार विशेष नाम हैं॥४८॥ अनुभाष्य-'आदि'-गृहस्थलीला (प्रथम चौबीस वर्ष) और 'शेष'-संन्यासलीला (अन्तिम चौबीस वर्ष) है। इसी अध्यायके पयार संख्या ३२-३४ द्रष्टव्य है। 'चारि चारि नाम'–अगले श्लोक संख्या ४९ में वर्णित है॥४८॥ महाभारतमें दान-धर्ममें (१२७ अ.) सहस्रनाममें (९२, ७५)– सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठाशान्तिपरायणः॥४९॥ तीसरा अध्याय | १२१