श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/४९ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग, सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित-ये चार लक्षण महाप्रभुकी गृहस्थलीलामें परिलक्षित होते हैं। संन्यासाश्रमी, हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्त्तनरूप महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान्, केवलाद्वैतवादी अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण-ये चार लक्षण महाप्रभुकी संन्यासलीलामें परिलक्षित होते हैं॥४९॥ अनुभाष्य-सुवर्णवर्णः (स्वर्णवर्णवत् पीतवर्णः यस्य सः) हेमाङ्ग (हेमवत् अङ्गं यस्य सः) वराङ्गः (महापुरुषबोधकं अङ्गं यस्य सः) चन्दनाङ्गदी (चन्दनाङ्गिते अङ्गदे विद्यते यस्य सः) [आदिलीलायां भगवतो गौरचन्द्रस्य एतानि चत्वारि नामानि]। संन्यासकृत् (यतिधर्मपरः) शमः (निर्विषयः) शान्तः (कृष्णैकनिष्ठचित्तः) निष्ठाशान्तिपरायणः (निष्ठा चित्तैकाग्र्यं च शान्ति च निष्ठाशान्ती परम् अयनं आश्रयो यस्य सः) [शेषलीलायां भगवतो गौरहरेर्नामानि चतुःसंख्यकानि सहस्रनाम्नि उदाहृतानि]। श्लोक-भावानुवाद-स्वर्णके वर्ण जैसा पीला रंग है जिनका, स्वर्ण जैसे अङ्ग हैं जिनके, जिनके अङ्गोंसे महापुरुष होनेका बोध होता है, तथा चन्दनसे अङ्कित तिलकादि जिनके अङ्गोंमें विद्यमान हैं, वे [आदिलीलामें भगवान् श्रीगौरचन्द्रके ये चार नाम हैं]; संन्यासधर्मपरायण, विषयोंसे विरक्त, श्रीकृष्णमें ही एकनिष्ठ चित्तवाले, एकाग्रचित्त और शान्त अथवा निष्ठा और शान्तिके परमाश्रय हैं जो, वे [विष्णु सहस्रनामोंसे उद्धृत भगवान् श्रीगौरहरिके शेषलीलाके ये चार नाम हैं]। विष्णुसहस्रनामका श्रीबलदेवविद्याभूषणके ‘नामार्थ-सुधाभिध’ भाष्यमें- “सुवर्णस्येव वर्णो रूपमस्येति सुवर्णवर्णः-“यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ इति श्रुतेः। हेमवत् स्पृहणीयानी वर्णाधिष्ठानान्यङ्गानि यस्य सः हेमाङ्गः। वराणि सौन्दर्यवन्त्यङ्गानि अस्येति वराङ्गः। चन्दने भक्तचित्ताह्लादके अङ्गदे अस्येति चन्दनाङ्गदी। सुवर्णवर्णादि चतुष्टयं केचित् कृष्णचैतन्यतायां योजयन्ति। अथ कृष्णचैतन्यतां द्योतयन्नाह षड्भिः-संन्यासं परिव्रज्यं करोतीति संन्यासकृत्। शमयत्यालोचयति रहस्यं हरेरिति शमः। शम आलोचने चुरादिमत्। शाम्यत्युपरमिति कृष्णान्यविषयादिति शान्तः। नितिष्ठन्त्यस्यां हरिकीर्त्तन-प्रधाना भक्तियज्ञा इति निष्ठा-“कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं’ इति स्मरणात्। शाम्यन्त्यनया भक्तिविरोधिनः केवलाद्वैतप्रमुखान् इति शान्तिः। महाभावान्तानां भावभेदानां परममयनमिति परायणम्।” अर्थात् “उनका सुवर्ण (स्वर्ण) की भाँति वर्ण अर्थात् रूप है, इसलिये वे ‘सुवर्णवर्ण’ हैं। मुण्डक-श्रुतिमें इसका प्रमाण इस प्रकार है-‘जिस समय साधक स्वर्णवर्णविग्रह, जगत्कर्त्ता, ब्रह्मयोनि परमपुरुष ईश्वरका दर्शन करते हैं’ आदि। हेम (स्वर्ण) के समान लोभनीय वर्णके अधिष्ठानस्वरूप जिनके अङ्ग हैं, वे ‘हेमाङ्ग’ हैं। उनके अङ्ग सर्वोत्तम सौन्दर्यमय हैं, इसलिये वे ‘वराङ्ग’ हैं। उनके चन्दन अर्थात् भक्तोंके चित्तको आनन्द प्रदान करनेवाले बाजूबन्द हैं, इसलिये वे ‘चन्दनाङ्गदी’ हैं। सुवर्णवर्णादि इन चार नामोंको भी कोई-कोई श्रीकृष्णचैतन्यके साथ जोड़ते हैं। अब श्रीकृष्णचैतन्यको प्रकाश करनेके लिये छह नाम कहे गये हैं। वे संन्यास अर्थात् परिव्रज्याको ग्रहण करनेवाले हैं, इसलिये ‘संन्यासकृत्’ है। वे श्रीहरिकी आलोचना करते हैं, इसलिये वे ‘शम’ हैं-चुरादिमें ‘शम’ धातु आलोचनाके लिये प्रयुक्त होता है। श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे निवृत्त होनेके कारण वे ‘शान्त’ हैं। उनमें हरिकीर्त्तन-प्रधान भक्तियज्ञ निश्चितरूपसे अवस्थान करता है, इसलिये वे ‘निष्ठा’ कहलाते हैं; ‘कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं’-भागवतका यह १२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत