श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/४०-४३ ये सोलह नाम कलिके समस्त दोषोंका नाश करनेवाले हैं और इससे श्रेष्ठ उपाय सभी शास्त्रोंमें देखनेपर कहीं भी दिखलायी नहीं देता॥”४०॥ अमृतानुकणिका— “युगधर्म प्रवर्त्तन हय अंश हैते। आमा बिना अन्ये नारे व्रजप्रेम दिते॥” कलियुगमें हरिकीर्त्तन ही युगधर्म है। उसे श्रीगौरसुन्दरके अंशावतार ही स्थापित करते हैं, किन्तु श्वेतवराहकल्पमें वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें कलियुगमें श्रीनामप्रचार-रूप युगधर्मकी स्थापनाके उद्देश्यसे, किन्तु मुख्यतः व्रजप्रेम देनेके लिये जो अवतीर्ण होते हैं, वे ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ हैं। यहाँपर ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ कहकर निर्देश करनेका कारण यह है कि साधारणतः कलियुगमें जो युगावतार हैं, उनका नाम और वर्ण ‘कृष्ण’ होता है, किन्तु विशेष कलियुगमें जो श्रीचैतन्यावतार हैं, वे ही केवल पीतवर्ण हैं। लघुभागवतामृतमें युगावतारके प्रसङ्गमें उल्लेख किया गया है,– “कथ्यते वर्णनामाभ्यां शुक्लः सत्ययुगे हरिः। रक्तः श्यामः क्रमात् कृष्णस्त्रेतायां द्वापरे कलौ॥” अर्थात् “वर्ण और नामके द्वारा हरि सत्ययुगमें शुक्ल, त्रेतायुगमें रक्त, द्वापरयुगमें श्याम और कलियुगमें कृष्ण कहे जाते हैं।” श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु इसकी टीकाम्रें कहते हैं,– “सामान्यतः सभी कलियुगोंमें ही कृष्णवर्ण और उस नामके युगावतार—‘कृष्णः कलियुगे विभु’ इस हरिवंश प्रमाणके अनुसार हैं। इसलिये जिस कलियुगमें स्वर्णगौर-वर्ण श्रीकृष्णचैतन्य अवतीर्ण होते हैं, उस कलियुगमें वे ‘कृष्ण’ रूप युगावतार उनके भीतर समाहित होते हैं, यह समझना होगा।” श्रीमद्भागवतमें युगावतारके प्रसङ्गमें कहा गया है— “कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णम्” (भाः ११/५/३२)। इस श्लोककी व्याख्यामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं,— “सभी कलियुगोंके लिये ‘कृष्णवर्ण’ अर्थात् उनके अवतारोंकी देह कृष्णवर्णकी होती है, परन्तु इस विशेष कलियुगमें उनसे पार्थक्य दिखानेके लिये कहा गया है ‘त्विषाऽकृष्णं’ अर्थात् इन्द्रनीलमणिकी भाँति जो उज्ज्वल हैं। एक विशेष कलियुगके लिये कृष्णवर्ण, किन्तु कान्तिमें ‘अकृष्ण’ कहनेसे पीतवर्ण समझना चाहिये अर्थात् अन्तरमें कृष्णवर्ण किन्तु बाहर गौरवर्ण हैं, यह अर्थ है।”॥४०॥ तप्तहेम-सम कान्ति, प्रकाण्ड शरीर। नवमेघ-जिनि कण्ठध्वनि ये गम्भीर॥४१॥ अनुवाद—उनके दीर्घ तनु (शरीर) की कान्ति तपे हुए स्वर्णकी भाँति है और उनकी गम्भीर कण्ठध्वनि नवमेघोंकी मन्द-मन्द गर्जनको भी परास्त करनेवाली है॥४१॥ दैर्घ्य-विस्तारे येइ आपनार हात। चारि हस्त हय ‘महापुरुष’ विख्यात॥४२॥ ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ हय ताँर नाम। न्यग्रोधपरिमण्डल-तनु चैतन्य गुणधाम॥४३॥ अनुवाद—जिनके शरीरकी लम्बाई (पदतलसे शीशके ऊपरी भाग तक) और चौड़ाई (दोनों हाथ फैलाकर दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंके नखके सिरोंके बीच) अपने हाथसे मापकर चार हाथके बराबर होती है, वे ‘महापुरुष’ होते हैं। उन्हें ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ कहा जाता है। चैतन्य महाप्रभु जो सभी सद्गुणोंके धाम हैं, उनका शरीर न्यग्रोधपरिमण्डलका था॥४२-४३॥ १२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत