श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/३७-४० ]
“त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः। हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः ॥” अर्थात् “त्रेतायुगमें भगवान्का श्रीविग्रह लाल रङ्गका होता है। उनके चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं।”॥ ३७-३८॥ श्रीमद्भागवत (११/५/२७)— द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः। श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः॥ ३९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बर और वंशी आदि निज-आयुधधारी, श्रीवत्सादि चिह्नोंसे युक्त-इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ ३९॥ अनुभाष्य—‘किस कालमें किस रूपमें भगवान्का अवतार होता है', विदेहराज निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे श्रीकरभाजन सत्य और त्रेतायुगके अवतारोंका वर्णन करनेके बाद द्वापरके अवतारके सम्बन्धमें वर्णन कर रहे हैं,- द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासाः (पीतः वासो यस्य सः) निजायुधः (निजानि आयुधानि गदाचक्रादीनि यस्य सः) श्रीवत्सादिभिः अङ्कैः (आङ्गिकैश्चिह्नैः) लक्षणैः (बाह्यैः कौस्तुभादिभिश्च) उपलक्षितः। श्लोक-भावानुवाद—द्वापरमें भगवान् श्यामवर्णके, जिनके पीत वस्त्र हैं, गदा-चक्रादि निज अस्त्र हैं, अङ्गोंमें श्रीवत्सादि चिह्न हैं तथा बाहर कौस्तुभ आदि धारण करते हैं, वे इन लक्षणोंके साथ प्रकट होते हैं॥ ३९॥ कलियुगावतारका लक्षण :- कलियुगे युगधर्म—नामेर प्रचार। तथि लागि' पीतवर्ण चैतन्यावतार ॥४०॥ अनुवाद—कलियुगमें नाम-सङ्कीर्तन युगधर्म है और पीतवर्ण धारणकर श्रीचैतन्यमहाप्रभु इस युगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४०॥ अनुभाष्य—श्रीमध्वाचार्यने मुण्डकोपनिषद्के भाष्यमें श्रीनारायण-संहितासे प्रमाण लिखा है— “द्वापरियैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः ॥” अर्थात् “द्वापर युगमें भगवान् विष्णुकी पूजा नारद पञ्चरात्रादि शास्त्रोंकी विधिके अनुसार करनी चाहिये। कलियुगमें केवल नामके द्वारा श्रीहरिकी पूजा होती है।” कलिसन्तरणोपनिषद्में भी लिखा है— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते ॥” अर्थात् “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे;
तीसरा अध्याय | ११९