श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/३५-३८ अमृतप्रवाह भाष्य—गर्गाचार्यजीने श्रीकृष्णचैतन्यको कलियुगका अवतार जानकर निम्नलिखित श्लोकमें उनके वर्णका निरूपण किया है॥ ३५॥ चारयुगोंमें चार वर्ण अवतार :- श्रीमद्भागवत (१०/८/१७)— आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ ३६॥ अनुवाद—आपका यह पुत्र प्रत्येक युगमें श्रीविग्रह धारण अर्थात् अवतार ग्रहण करता है। यह सत्ययुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें रक्तवर्ण, कलिमें पीतवर्ण और अब द्वापरमें श्यामवर्ण है। अतः इसका नाम कृष्ण होगा॥ ३६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम्हारा यह बालक अन्य तीन युगोंमें शुक्ल, रक्त और पीतवर्ण धारण करता है। अभी द्वापर युगमें इसने कृष्णवर्ण धारण किया है॥ ३६॥ अनुभाष्य—गर्गाचार्यजी श्रीनन्दमहाराजको श्रीकृष्णके नामकरणके समय उनका वर्णन करते हुए उनके अन्य-अन्य अवतारों और उनके स्वयं अवतारी होनेकी बात कह रहे हैं— अनुयुगं (युगोचितं) तनूर्गृह्णतः अस्य (तव पुत्रस्य) शुक्लः रक्तः तथा (इति भविष्यन्निर्देशवाक्येन वैवस्वतमन्वन्तरस्याष्टाविंशमहायुगीयकलियुगस्य आदिसन्ध्यायां) पीतः (पीतवर्णः भविष्यति) त्रयो वर्णाः आसन्। इदानीं हि कृष्णतां गतः (प्राप्तः)। श्लोक-भावानुवाद—आपका पुत्र युगके अनुरूप श्रीविग्रह धारण करता है। (अन्य युगोंमें) आपके पुत्रके शुक्ल, रक्त और पीत [यह भविष्यवाणीरूप वाक्य है कि वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें महायुगके कलियुगकी प्रथम संध्यामें यह पीतवर्णमें आयेगा], ये तीन वर्ण होते हैं और अभी इसने कृष्णवर्णको प्राप्त किया है॥ ३६॥ शुक्ल, रक्त, पीतवर्ण—एइ तिन द्युति। सत्य-त्रेता-कलिकाले धरेन श्रीपति॥ ३७॥ इदानीं द्वापरे तिँहो हैला कृष्णवर्ण। एइ सब शास्त्रागम-पुराणेर मर्म॥ ३८॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण शुक्ल, रक्त और पीत, इन तीन वर्णोंको क्रमशः सत्य, त्रेता और कलियुगमें धारण करते हैं। अब इस द्वापरयुगमें वे कृष्णवर्ण हुए हैं, यह सभी शास्त्रों, आगम और पुराणोंका सार है॥ ३७-३८॥ अमृतानुकणिका—नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम करभाजन चारों युगोंमें भगवान्के वर्ण और विग्रहके रूपका वर्णन करते हुए कह रहे हैं (श्रीमद्भागवत ११/५/२१,२४)— “कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बरः। कृष्णाजिनोपवीताक्षन् बिभ्रद् दण्डकमण्डलू॥” अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रङ्ग श्वेत होता है। उनके चार भुजाएँ और सिरपर जटा होती है तथा वे वल्कलका ही वस्त्र पहनते हैं। वे काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं। उनका ब्रह्मचारी वेश होता है।” ११८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत