श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ ३/३५-३८ अमृतप्रवाह भाष्य—गर्गाचार्यजीने श्रीकृष्णचैतन्यको कलियुगका अवतार जानकर निम्नलिखित श्लोकमें उनके वर्णका निरूपण किया है॥ ३५॥ चारयुगोंमें चार वर्ण अवतार :- श्रीमद्भागवत (१०/८/१७)— आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ ३६॥ अनुवाद—आपका यह पुत्र प्रत्येक युगमें श्रीविग्रह धारण अर्थात् अवतार ग्रहण करता है। यह सत्ययुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें रक्तवर्ण, कलिमें पीतवर्ण और अब द्वापरमें श्यामवर्ण है। अतः इसका नाम कृष्ण होगा॥ ३६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम्हारा यह बालक अन्य तीन युगोंमें शुक्ल, रक्त और पीतवर्ण धारण करता है। अभी द्वापर युगमें इसने कृष्णवर्ण धारण किया है॥ ३६॥ अनुभाष्य—गर्गाचार्यजी श्रीनन्दमहाराजको श्रीकृष्णके नामकरणके समय उनका वर्णन करते हुए उनके अन्य-अन्य अवतारों और उनके स्वयं अवतारी होनेकी बात कह रहे हैं— अनुयुगं (युगोचितं) तनूर्गृह्णतः अस्य (तव पुत्रस्य) शुक्लः रक्तः तथा (इति भविष्यन्निर्देशवाक्येन वैवस्वतमन्वन्तरस्याष्टाविंशमहायुगीयकलियुगस्य आदिसन्ध्यायां) पीतः (पीतवर्णः भविष्यति) त्रयो वर्णाः आसन्। इदानीं हि कृष्णतां गतः (प्राप्तः)। श्लोक-भावानुवाद—आपका पुत्र युगके अनुरूप श्रीविग्रह धारण करता है। (अन्य युगोंमें) आपके पुत्रके शुक्ल, रक्त और पीत [यह भविष्यवाणीरूप वाक्य है कि वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें महायुगके कलियुगकी प्रथम संध्यामें यह पीतवर्णमें आयेगा], ये तीन वर्ण होते हैं और अभी इसने कृष्णवर्णको प्राप्त किया है॥ ३६॥ शुक्ल, रक्त, पीतवर्ण—एइ तिन द्युति। सत्य-त्रेता-कलिकाले धरेन श्रीपति॥ ३७॥ इदानीं द्वापरे तिँहो हैला कृष्णवर्ण। एइ सब शास्त्रागम-पुराणेर मर्म॥ ३८॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण शुक्ल, रक्त और पीत, इन तीन वर्णोंको क्रमशः सत्य, त्रेता और कलियुगमें धारण करते हैं। अब इस द्वापरयुगमें वे कृष्णवर्ण हुए हैं, यह सभी शास्त्रों, आगम और पुराणोंका सार है॥ ३७-३८॥ अमृतानुकणिका—नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम करभाजन चारों युगोंमें भगवान्के वर्ण और विग्रहके रूपका वर्णन करते हुए कह रहे हैं (श्रीमद्भागवत ११/५/२१,२४)— “कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बरः। कृष्णाजिनोपवीताक्षन् बिभ्रद् दण्डकमण्डलू॥” अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रङ्ग श्वेत होता है। उनके चार भुजाएँ और सिरपर जटा होती है तथा वे वल्कलका ही वस्त्र पहनते हैं। वे काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं। उनका ब्रह्मचारी वेश होता है।” ११८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/३७-४० ]
“त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः। हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः ॥” अर्थात् “त्रेतायुगमें भगवान्का श्रीविग्रह लाल रङ्गका होता है। उनके चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं।”॥ ३७-३८॥ श्रीमद्भागवत (११/५/२७)— द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः। श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः॥ ३९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ३९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बर और वंशी आदि निज-आयुधधारी, श्रीवत्सादि चिह्नोंसे युक्त-इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ ३९॥ अनुभाष्य—‘किस कालमें किस रूपमें भगवान्का अवतार होता है', विदेहराज निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें नवयोगेन्द्रोंमेंसे श्रीकरभाजन सत्य और त्रेतायुगके अवतारोंका वर्णन करनेके बाद द्वापरके अवतारके सम्बन्धमें वर्णन कर रहे हैं,- द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासाः (पीतः वासो यस्य सः) निजायुधः (निजानि आयुधानि गदाचक्रादीनि यस्य सः) श्रीवत्सादिभिः अङ्कैः (आङ्गिकैश्चिह्नैः) लक्षणैः (बाह्यैः कौस्तुभादिभिश्च) उपलक्षितः। श्लोक-भावानुवाद—द्वापरमें भगवान् श्यामवर्णके, जिनके पीत वस्त्र हैं, गदा-चक्रादि निज अस्त्र हैं, अङ्गोंमें श्रीवत्सादि चिह्न हैं तथा बाहर कौस्तुभ आदि धारण करते हैं, वे इन लक्षणोंके साथ प्रकट होते हैं॥ ३९॥ कलियुगावतारका लक्षण :- कलियुगे युगधर्म—नामेर प्रचार। तथि लागि' पीतवर्ण चैतन्यावतार ॥४०॥ अनुवाद—कलियुगमें नाम-सङ्कीर्तन युगधर्म है और पीतवर्ण धारणकर श्रीचैतन्यमहाप्रभु इस युगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४०॥ अनुभाष्य—श्रीमध्वाचार्यने मुण्डकोपनिषद्के भाष्यमें श्रीनारायण-संहितासे प्रमाण लिखा है— “द्वापरियैर्जनैर्विष्णुः पञ्चरात्रैस्तु केवलैः। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः ॥” अर्थात् “द्वापर युगमें भगवान् विष्णुकी पूजा नारद पञ्चरात्रादि शास्त्रोंकी विधिके अनुसार करनी चाहिये। कलियुगमें केवल नामके द्वारा श्रीहरिकी पूजा होती है।” कलिसन्तरणोपनिषद्में भी लिखा है— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते ॥” अर्थात् “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे;
तीसरा अध्याय | ११९
[ ३/४०-४३ ये सोलह नाम कलिके समस्त दोषोंका नाश करनेवाले हैं और इससे श्रेष्ठ उपाय सभी शास्त्रोंमें देखनेपर कहीं भी दिखलायी नहीं देता॥”४०॥ अमृतानुकणिका— “युगधर्म प्रवर्त्तन हय अंश हैते। आमा बिना अन्ये नारे व्रजप्रेम दिते॥” कलियुगमें हरिकीर्त्तन ही युगधर्म है। उसे श्रीगौरसुन्दरके अंशावतार ही स्थापित करते हैं, किन्तु श्वेतवराहकल्पमें वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें कलियुगमें श्रीनामप्रचार-रूप युगधर्मकी स्थापनाके उद्देश्यसे, किन्तु मुख्यतः व्रजप्रेम देनेके लिये जो अवतीर्ण होते हैं, वे ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ हैं। यहाँपर ‘पीतवर्ण-चैतन्यावतार’ कहकर निर्देश करनेका कारण यह है कि साधारणतः कलियुगमें जो युगावतार हैं, उनका नाम और वर्ण ‘कृष्ण’ होता है, किन्तु विशेष कलियुगमें जो श्रीचैतन्यावतार हैं, वे ही केवल पीतवर्ण हैं। लघुभागवतामृतमें युगावतारके प्रसङ्गमें उल्लेख किया गया है,– “कथ्यते वर्णनामाभ्यां शुक्लः सत्ययुगे हरिः। रक्तः श्यामः क्रमात् कृष्णस्त्रेतायां द्वापरे कलौ॥” अर्थात् “वर्ण और नामके द्वारा हरि सत्ययुगमें शुक्ल, त्रेतायुगमें रक्त, द्वापरयुगमें श्याम और कलियुगमें कृष्ण कहे जाते हैं।” श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु इसकी टीकाम्रें कहते हैं,– “सामान्यतः सभी कलियुगोंमें ही कृष्णवर्ण और उस नामके युगावतार—‘कृष्णः कलियुगे विभु’ इस हरिवंश प्रमाणके अनुसार हैं। इसलिये जिस कलियुगमें स्वर्णगौर-वर्ण श्रीकृष्णचैतन्य अवतीर्ण होते हैं, उस कलियुगमें वे ‘कृष्ण’ रूप युगावतार उनके भीतर समाहित होते हैं, यह समझना होगा।” श्रीमद्भागवतमें युगावतारके प्रसङ्गमें कहा गया है— “कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णम्” (भाः ११/५/३२)। इस श्लोककी व्याख्यामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं,— “सभी कलियुगोंके लिये ‘कृष्णवर्ण’ अर्थात् उनके अवतारोंकी देह कृष्णवर्णकी होती है, परन्तु इस विशेष कलियुगमें उनसे पार्थक्य दिखानेके लिये कहा गया है ‘त्विषाऽकृष्णं’ अर्थात् इन्द्रनीलमणिकी भाँति जो उज्ज्वल हैं। एक विशेष कलियुगके लिये कृष्णवर्ण, किन्तु कान्तिमें ‘अकृष्ण’ कहनेसे पीतवर्ण समझना चाहिये अर्थात् अन्तरमें कृष्णवर्ण किन्तु बाहर गौरवर्ण हैं, यह अर्थ है।”॥४०॥ तप्तहेम-सम कान्ति, प्रकाण्ड शरीर। नवमेघ-जिनि कण्ठध्वनि ये गम्भीर॥४१॥ अनुवाद—उनके दीर्घ तनु (शरीर) की कान्ति तपे हुए स्वर्णकी भाँति है और उनकी गम्भीर कण्ठध्वनि नवमेघोंकी मन्द-मन्द गर्जनको भी परास्त करनेवाली है॥४१॥ दैर्घ्य-विस्तारे येइ आपनार हात। चारि हस्त हय ‘महापुरुष’ विख्यात॥४२॥ ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ हय ताँर नाम। न्यग्रोधपरिमण्डल-तनु चैतन्य गुणधाम॥४३॥ अनुवाद—जिनके शरीरकी लम्बाई (पदतलसे शीशके ऊपरी भाग तक) और चौड़ाई (दोनों हाथ फैलाकर दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंके नखके सिरोंके बीच) अपने हाथसे मापकर चार हाथके बराबर होती है, वे ‘महापुरुष’ होते हैं। उन्हें ‘न्यग्रोधपरिमण्डल’ कहा जाता है। चैतन्य महाप्रभु जो सभी सद्गुणोंके धाम हैं, उनका शरीर न्यग्रोधपरिमण्डलका था॥४२-४३॥ १२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/४२-४९ ] अमृतप्रवाह भाष्य-जो अपने हाथसे मापकर चार हाथ लम्बे और चौड़े होते हैं, वे महापुरुष कहलाते हैं और उनका नाम 'न्यग्रोधपरिधिमण्डल' होता है॥४२-४३॥ अनुभाष्य-'न्यग्रोधपरिधिमण्डल'–जो अपने हाथके मापसे चार हाथ लम्बे और चार हाथ चौड़े अर्थात् जिनकी गोलाकार परिधि चार हाथकी होती है, वे 'महापुरुष' होते हैं। जिन्होंने सभी प्राणियोंको अपने अधीनकर अपनी मायाके द्वारा बद्ध किया है, इस प्रकार वे पूर्ण चतुर्व्यूहयुक्त विष्णु हैं॥४२-४३॥ आजानुलम्बित-भुज कमललोचन। तिलफुल-जिनि नासा, सुधांशु-वदन॥४४॥ शान्त, दान्त, कृष्णभक्ति-निष्ठापरायण। भक्तवत्सल, सुशील, सर्वभूते सम॥४५॥ चन्दनेर अङ्गद-बाला, चन्दन-भूषण। नृत्यकाले परि' करेन कृष्णसङ्कीर्त्तन॥४६॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी घुटनोंतक लम्बी भुजाएँ हैं, उनके नेत्र कमलपुष्पके समान हैं, तिलफूलसे अधिक सुन्दर उनकी नासिका है और उनका मुखमण्डल चन्द्रकी भाँति सुन्दर है। वे शान्त, जितेन्द्रिय, कृष्णभक्तिमें निष्ठापरायण, भक्तोंके प्रति विशेष स्नेहशील, सुशील और सभी प्राणियोंमें समदर्शी हैं। श्रीकृष्णसङ्कीर्तनके लिये विशेषरूपसे वे चन्दनके बाजूबन्द और कङ्कन पहनते हैं और अपने अङ्गोंमें चन्दनके तिलक धारण करते हैं॥४४-४६॥ एइ सब गुण लञा मुनि वैशम्पायन। सहस्रनामे कैल ताँर नाम-गणन॥४७॥ अनुवाद-इन सभी गुणोंको देखकर मुनि वैशम्पायनने विष्णु सहस्रनाममें उनके नामोंका उल्लेख किया है॥४७॥ अनुभाष्य-महाभारतके अन्तर्गत दानधर्मके १४९वें अध्यायमें विष्णुके सहस्रनाम दिये गये हैं। श्रीशङ्कराचार्य, श्रीबलदेव विद्याभूषण और अन्य-अन्य वैष्णवाचार्योंने महाभारतपर अपने-अपने भाष्य लिखे हैं॥४७॥ दुइ लीला चैतन्येर—आदि आर शेष। दुइ लीलाय चारि चारि नाम विशेष॥४८॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी 'आदिलीला' और 'शेषलीला' नामक दो लीलाएँ हैं। इन दोनों लीलाओंमें उनके चार-चार विशेष नाम हैं॥४८॥ अनुभाष्य-'आदि'-गृहस्थलीला (प्रथम चौबीस वर्ष) और 'शेष'-संन्यासलीला (अन्तिम चौबीस वर्ष) है। इसी अध्यायके पयार संख्या ३२-३४ द्रष्टव्य है। 'चारि चारि नाम'–अगले श्लोक संख्या ४९ में वर्णित है॥४८॥ महाभारतमें दान-धर्ममें (१२७ अ.) सहस्रनाममें (९२, ७५)– सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठाशान्तिपरायणः॥४९॥ तीसरा अध्याय | १२१
[ ३/४९ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सुवर्णवर्ण, पिघले स्वर्णकी भाँति अङ्ग, सर्वाङ्गसुन्दर गठन, चन्दनमालासे सुशोभित-ये चार लक्षण महाप्रभुकी गृहस्थलीलामें परिलक्षित होते हैं। संन्यासाश्रमी, हरि-रहस्यकी आलोचनारूप शमगुणसे युक्त, हरिकीर्त्तनरूप महायज्ञमें दृढ़तापूर्वक निष्ठावान्, केवलाद्वैतवादी अभक्त-निवृत्तिकारिणी शान्ति-प्राप्त महाभावपरायण-ये चार लक्षण महाप्रभुकी संन्यासलीलामें परिलक्षित होते हैं॥४९॥ अनुभाष्य-सुवर्णवर्णः (स्वर्णवर्णवत् पीतवर्णः यस्य सः) हेमाङ्ग (हेमवत् अङ्गं यस्य सः) वराङ्गः (महापुरुषबोधकं अङ्गं यस्य सः) चन्दनाङ्गदी (चन्दनाङ्गिते अङ्गदे विद्यते यस्य सः) [आदिलीलायां भगवतो गौरचन्द्रस्य एतानि चत्वारि नामानि]। संन्यासकृत् (यतिधर्मपरः) शमः (निर्विषयः) शान्तः (कृष्णैकनिष्ठचित्तः) निष्ठाशान्तिपरायणः (निष्ठा चित्तैकाग्र्यं च शान्ति च निष्ठाशान्ती परम् अयनं आश्रयो यस्य सः) [शेषलीलायां भगवतो गौरहरेर्नामानि चतुःसंख्यकानि सहस्रनाम्नि उदाहृतानि]। श्लोक-भावानुवाद-स्वर्णके वर्ण जैसा पीला रंग है जिनका, स्वर्ण जैसे अङ्ग हैं जिनके, जिनके अङ्गोंसे महापुरुष होनेका बोध होता है, तथा चन्दनसे अङ्कित तिलकादि जिनके अङ्गोंमें विद्यमान हैं, वे [आदिलीलामें भगवान् श्रीगौरचन्द्रके ये चार नाम हैं]; संन्यासधर्मपरायण, विषयोंसे विरक्त, श्रीकृष्णमें ही एकनिष्ठ चित्तवाले, एकाग्रचित्त और शान्त अथवा निष्ठा और शान्तिके परमाश्रय हैं जो, वे [विष्णु सहस्रनामोंसे उद्धृत भगवान् श्रीगौरहरिके शेषलीलाके ये चार नाम हैं]। विष्णुसहस्रनामका श्रीबलदेवविद्याभूषणके ‘नामार्थ-सुधाभिध’ भाष्यमें- “सुवर्णस्येव वर्णो रूपमस्येति सुवर्णवर्णः-“यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्’ इति श्रुतेः। हेमवत् स्पृहणीयानी वर्णाधिष्ठानान्यङ्गानि यस्य सः हेमाङ्गः। वराणि सौन्दर्यवन्त्यङ्गानि अस्येति वराङ्गः। चन्दने भक्तचित्ताह्लादके अङ्गदे अस्येति चन्दनाङ्गदी। सुवर्णवर्णादि चतुष्टयं केचित् कृष्णचैतन्यतायां योजयन्ति। अथ कृष्णचैतन्यतां द्योतयन्नाह षड्भिः-संन्यासं परिव्रज्यं करोतीति संन्यासकृत्। शमयत्यालोचयति रहस्यं हरेरिति शमः। शम आलोचने चुरादिमत्। शाम्यत्युपरमिति कृष्णान्यविषयादिति शान्तः। नितिष्ठन्त्यस्यां हरिकीर्त्तन-प्रधाना भक्तियज्ञा इति निष्ठा-“कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं’ इति स्मरणात्। शाम्यन्त्यनया भक्तिविरोधिनः केवलाद्वैतप्रमुखान् इति शान्तिः। महाभावान्तानां भावभेदानां परममयनमिति परायणम्।” अर्थात् “उनका सुवर्ण (स्वर्ण) की भाँति वर्ण अर्थात् रूप है, इसलिये वे ‘सुवर्णवर्ण’ हैं। मुण्डक-श्रुतिमें इसका प्रमाण इस प्रकार है-‘जिस समय साधक स्वर्णवर्णविग्रह, जगत्कर्त्ता, ब्रह्मयोनि परमपुरुष ईश्वरका दर्शन करते हैं’ आदि। हेम (स्वर्ण) के समान लोभनीय वर्णके अधिष्ठानस्वरूप जिनके अङ्ग हैं, वे ‘हेमाङ्ग’ हैं। उनके अङ्ग सर्वोत्तम सौन्दर्यमय हैं, इसलिये वे ‘वराङ्ग’ हैं। उनके चन्दन अर्थात् भक्तोंके चित्तको आनन्द प्रदान करनेवाले बाजूबन्द हैं, इसलिये वे ‘चन्दनाङ्गदी’ हैं। सुवर्णवर्णादि इन चार नामोंको भी कोई-कोई श्रीकृष्णचैतन्यके साथ जोड़ते हैं। अब श्रीकृष्णचैतन्यको प्रकाश करनेके लिये छह नाम कहे गये हैं। वे संन्यास अर्थात् परिव्रज्याको ग्रहण करनेवाले हैं, इसलिये ‘संन्यासकृत्’ है। वे श्रीहरिकी आलोचना करते हैं, इसलिये वे ‘शम’ हैं-चुरादिमें ‘शम’ धातु आलोचनाके लिये प्रयुक्त होता है। श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे निवृत्त होनेके कारण वे ‘शान्त’ हैं। उनमें हरिकीर्त्तन-प्रधान भक्तियज्ञ निश्चितरूपसे अवस्थान करता है, इसलिये वे ‘निष्ठा’ कहलाते हैं; ‘कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं’-भागवतका यह १२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
श्लोक इसका प्रमाण है। केवल-अद्वैतवादादि प्रमुख भक्तिविरोधी मतोंका उनके द्वारा उपशमन होता है, इसलिये वे 'शान्ति' कहलाते हैं। समस्त भावोंके परमाश्रय स्वरूप महाभावकी चरम सीमा हैं, इसलिये वे 'परायण' (परा अर्थात् परम और अयन अर्थात् आश्रय) कहलाते हैं।"॥४९॥ व्यक्त करि' भागवते कहे बार बार। कलियुगे कृष्ण-नामसङ्कीर्त्तन-सार॥५०॥ अनुवाद-भागवतमें बारम्बार यह स्पष्टरूपसे कहा गया है कि कलियुगमें श्रीकृष्ण-नामसङ्कीर्तन ही परम धर्म है॥५०॥ श्रीमद्भागवत (११/५/३२)- कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥५१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र तथा पार्षदोंसे परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं। श्रीजीव गोस्वामीजीने क्रमसन्दर्भमें लिखा है- “त्विषा कान्त्या योऽकृष्णो गौरस्तं कलौ सुमेधसो यजन्ति। गौरत्वञ्चास्य “आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनूः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः” इत्यत्र पारिशेष्यप्रमाण-लब्धम्। 'इदानीम्' एतदवतारास्पदत्वेनाभिख्याते द्वापरे 'कृष्णतां गतः' इत्युक्तेः, शुक्लरक्तयोः सत्यत्रेतागतत्वेन दर्शितं पीतस्यातीतत्वं प्राचीनावतारापेक्षया। अत्र श्रीकृष्णस्य परिपूर्णरूपत्वेन वक्ष्यमाणत्वाद् युगावतारत्वम्, - तस्मिन् सर्वेऽप्यवतारा अन्तर्भूता इति तत्तत्प्रयोजनं तस्मिन्नेकस्मिन्नेव सिद्ध्यतीत्यपेक्षया। तदेवं यद्द्वापरे कृष्णोऽवतरति, तदेव कलौ श्रीगौरोऽप्यवतरतीति स्वारस्यलब्धेः श्रीकृष्णविर्भावविशेष एवायं गौर इत्यायाति, तदव्यभिचारात्।” “तदेतदाविर्भावत्वं तस्य स्वयमेव विशेषणद्वारा व्यनक्ति। 'कृष्णवर्णं'- कृष्णेत्येतौ वर्णौ च यत्र; यस्मिन् श्रीकृष्णचैतन्यदेव-नाम्नि कृष्णत्वाभिव्यञ्जकं कृष्णेति-वर्णयुगलं प्रयुक्तमस्तीत्यर्थः। तृतीये श्रीमदुद्धववाक्ये “समाहुता' इत्यादि-पद्ये 'श्रियः सवर्णेन' इत्यत्र टीकायां - "श्रियो रुक्मिण्याः समानवर्णद्वयं वाचकं यस्य सः, श्रियः सवर्णो रुक्मीत्यपि दृश्यते'; यद्वा, कृष्णं वर्णयति तादृशस्वपरमानन्दविलास-स्मरणोल्लासवतया स्वयं गायति, परमकारुणिकतया च सर्वेभ्योऽपि लोकेभ्यस्तमेवोपद्दिशति यस्तम्; अथवा स्वयमकृष्णं गौरं त्विषा स्वशोभा-विशेषेणैव कृष्णोपदेष्टारञ्च, यद्दर्शनेनैव सर्वेषां श्रीकृष्णः स्फुरतीत्यर्थः; किंवा, सर्वलोकद्रष्टावकृष्णं गौरमपि भक्त-विशेषदृष्टौ 'त्विषा' प्रकाशविशेषेण कृष्णवर्णं, तादृश-श्यामसुन्दरमेव सन्तमित्यर्थः। तस्मात्तस्मिन् सर्वथा श्रीकृष्णरूपस्यैव प्रकाशात् तस्यैवाविर्भाव-विशेषः स इति भावः। तस्य भगवत्वमेव स्पष्टयति-'साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्'- अङ्गान्येव परममनोहरत्वादुपाङ्गानि भूषणादीनि, महाप्रभावत्वात् तान्येवास्त्राणि, सर्वदैवैकान्तवासित्वात्तान्येव पार्षदाः। बहुभिर्महानुभावैरसकृदेव तथा दृष्टोऽसाविति गौड़-वरेन्द्र-बङ्गोत्कलादिदेशीयानां महाप्रसिद्धेः; यद्वा, अत्यन्तप्रेमास्पदत्वात्तत्तुल्या एव पार्षदाः श्रीमदद्वैताचार्य-महानुभावचरणप्रभृतयस्तैः सह वर्त्तमानमिति चार्थान्तरेण व्यक्तम्। तमेवम्भूतं कैर्यजन्ति? यज्ञैः पूजासम्भारैः,-'न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः' इत्युक्तेः। तत्र च विशेषणेन तमेवाभिधेयं व्यनक्ति, 'सङ्कीर्त्तन' बहुभिर्मिलित्वा तद्गानसुखं श्रीकृष्णगानं तत्प्रधानैः, तथा सङ्कीर्त्तन-प्रधान्यस्य तदाश्रितेष्वेव दर्शनात्, स एवात्राभिधेय इति स्पष्टम्। अतएव सहस्रनाम्नि तदवतारसूचकानि नामानि कथितानि-“सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो
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वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। सन्न्यासकृच्छमः शान्तः" इत्येतानि। दर्शितञ्चैतत् परमविद्वच्छिरोमणिना श्रीसार्वभौमभट्टाचार्येण— “कालात्नष्टं भक्तियोगं निजं यः प्रादुष्कर्तुं कृष्णचैतन्यनामा। आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे गाढं गाढं लीयतां चित्तभृङ्गः॥” इति सर्वसंवादिन्याम्। 'त्विषा' अर्थात् जिनकी कान्ति 'अकृष्ण' अर्थात् गौरवर्ण है, कलियुगमें बुद्धिमान लोग उनकी उपासना करते हैं। उनके इस गौरवर्णकी बात गर्गाचार्यजीने परोक्षरूपसे श्रीनन्दमहाराजसे कही, — 'तुम्हारा यह पुत्र प्रत्येक युगमें विग्रह धारण करता है। अन्य तीन युगोंमें यह शुक्ल, रक्त और पीत, इन तीन वर्णोंका था, अभी इसने कृष्णवर्णको धारण किया है।' इस वाक्यमें वर्णित चार वर्णोंमें शुक्ल, रक्त और श्यामवर्णके अतिरिक्त जो 'पीतवर्ण' है, उससे महाप्रभुके अवतारका प्रमाण पाया जाता है। 'इदानीं' अर्थात् वर्तमान अवतारकाल रूपमें वर्णित द्वापरयुगमें 'वे कृष्णवर्णको प्राप्त हुए हैं'—इस उक्तिके कारण और सत्यमें शुक्ल एवं त्रेतायुगमें रक्तवर्णकी प्राप्तिके कारण भगवान्के पूर्व-पूर्व कलियुगोंमें पीतवर्णधारी अवतारको लक्ष्य करके ही इस पीतवर्णका प्रयोग भूतकालमें हुआ है। यहाँपर श्रीकृष्णका युगावतारके रूपमें वर्णन हुआ है और उनके परिपूर्णरूपकी व्याख्या बादमें होगी कि सभी अवतार उन्हींमें समाहित हैं और सभी अवतारोंकी प्रयोजनीयता केवल एक उनसे ही सिद्ध होती है। इसी प्रकार जिस द्वापरमें श्रीकृष्ण अवतीर्ण होते हैं, उसी चतुर्युगके कलियुगमें ही श्रीगौरसुन्दर भी अवतीर्ण होते हैं—इस प्रकार तात्पर्य होनेसे ऐसा कह सकते हैं कि श्रीगौरसुन्दर ही श्रीकृष्णके आविर्भाव-विशेष हैं, यह सिद्ध होता है, क्योंकि इनके अवतार लेनेका क्रम कभी भङ्ग नहीं होता। श्रीगौरसुन्दरके अवतारकी बात ऋषिवर करभाजनने स्वयं उनके सम्बन्धमें कहे गये विशेषणके द्वारा व्यक्त की है, जैसे,—'कृष्णवर्णं'—'कृ' और 'ष्ण' ये दो वर्ण जिनमें अर्थात् जिनके नाम श्रीकृष्णचैतन्यके मध्य कृष्णत्वसूचक इन दो वर्णोंका प्रयोग हुआ है। (इस प्रकारकी व्याख्या काल्पनिक नहीं है, इसलिये दृष्टान्तरूपमें कह रहे हैं) जैसे, श्रीधरस्वामीने अपनी टीकामें श्रीमद्भागवतके तीसरे स्कन्धमें उद्धवजीके द्वारा कहे गये 'समाहुता----' पद्यमें 'श्रियः सवर्णेन' अंशकी व्याख्या की है—'श्री अर्थात् रुक्मिणीजीके समान दो वर्ण जिनके वाचक हैं, वे रुक्मी।' (यहाँपर श्लोकका अर्थ इस प्रकार हुआ है—श्रीरुक्मिणी नामके समान दो वर्ण जिनके नामके मध्य हैं, उन्हीं रुक्मीके द्वारा राजागण आमन्त्रित हुए थे)। इसलिये जैसे 'श्रियः सवर्णः' कहनेसे 'रुक्मी' का बोध होता है, उसी प्रकार 'कृ' और 'ष्ण' वर्णोंसे श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुको समझना चाहिये। अथवा 'कृष्णवर्णं' पदसे सूचित होता है कि जो 'कृष्ण'-नामका 'वर्णन' करते हैं अर्थात् अपने परमानन्द-विलासके स्मरणजनित उल्लासवशतः स्वयं इस नामका कीर्तन करते हैं और परम करुणावशतः समस्त जीवोंको जो इस नामका उपदेश करते हैं, वे ही श्रीगौरसुन्दर हैं। अथवा वे स्वयं 'अकृष्ण' अर्थात् गौर होकर भी 'त्विषा' अर्थात् अपनी शोभाविशेषके द्वारा ही 'कृष्ण'-सम्बन्धमें उपदेशदाता हैं अर्थात् जिनके दर्शनसे सभीको श्रीकृष्णके नाम-रूप-गुणादिकी स्फूर्ति होती है; किम्वा सभीकी दृष्टिमें वे 'अकृष्ण' अर्थात् गौर होनेपर भी भक्त-विशेषकी दृष्टिमें 'त्विषा' विशेषप्रकाशयोगसे 'कृष्णवर्णं' अर्थात् उनके जैसे श्यामसुन्दर रूपमें ही स्थित हैं, ये वही श्रीगौरसुन्दर हैं। इसलिये उनमें सभी प्रकारसे श्रीकृष्णरूपका ही प्रकाश होनेपर, ये श्रीकृष्णके ही आविर्भाव-विशेष हैं, यही भावार्थ है।
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३/५१-५२ ]
‘साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्’—इस वाक्यमें उनकी भगवत्ताको स्पष्ट कर रहे हैं। उनके अभिन्न ‘अङ्ग’ समूह परम मनोहर हैं और ‘उपाङ्ग’ या भूषणादि महाप्रभावयुक्त हैं, ये सभी उनके ‘अस्त्र’ हैं। तथा जो सदा ही एकान्तरूपसे उनके सान्निध्यमें वास करते हैं, वे सभी उनके ‘पार्षद’ हैं। उनकी इस प्रकार रूपकी शोभाका जिन बहुतसे महाजनोंने अनेक बार दर्शन किया है, वे गौड़, वरेन्द्र, बङ्ग, उत्कलादि देशवासियोंके मध्यमें भी विशेष प्रसिद्ध हैं। अथवा अङ्ग, उपाङ्ग और अस्त्रतुल्य उनके अतिशय प्रेमके पात्र श्रीअद्वैताचार्य आदि अतिप्रभावशाली पार्षदोंके साथ वे सदा विद्यमान रहते हैं, इस प्रकार अन्य अर्थ ग्रहण करनेसे भी वे ही व्यक्त होते हैं। इस प्रकारसे वर्णित उन गौरसुन्दरकी सुमेधा लोग किस-किस उपायसे आराधना करते हैं? वे यज्ञरूप पूजा-सामग्रीके द्वारा उनकी आराधना करते हैं, क्योंकि ‘जिस स्थानमें श्रीकृष्णकीर्तनरूप महोत्सव नहीं होता है, वह स्थान स्वर्गलोक होनेपर भी रहने योग्य नहीं है’, देवोंका यह वाक्य (भाः ५/१९/२३) इसका प्रमाण है। उसमें ‘सङ्कीर्त्तनप्रायैः’ इस विशेषणके द्वारा सङ्कीर्तनप्रधान यज्ञको ही आराधनाके उपायरूपमें व्यक्त कर रहे हैं। ‘सङ्कीर्तन’ अर्थात् अनेक लोगोंके द्वारा मिलकर जो श्रीकृष्णकीर्तन होता है, वही उस यज्ञमें प्रधान सामग्री है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके आश्रित भक्तोंमें ही सङ्कीर्तनका प्राधान्य दिखलायी देता है, इसलिये सङ्कीर्तन ही आराधनाका उपाय है, यह स्पष्ट है। इसलिये श्रीविष्णुसहस्रनामोंमें उनके अवतार सूचक—सुवर्णवर्ण, हेमाङ्ग, वराङ्ग, चन्दनाङ्गदी, संन्यासकृत, शान्तादि नामोंका वर्णन हुआ है। परमपण्डित-शिरोमणि श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने भी इसीको व्यक्त किया है—‘कालक्रमसे लुप्त अपने भक्तियोगको जो पुनः प्रकटित करनेके लिये श्रीकृष्णचैतन्य नामसे आविर्भूत हुए हैं, उनके चरणकमलोंमें मेरा मनरूपी भृङ्ग गाढ़रूपसे लीन हो।”॥५१॥ अनुभाष्य—‘कौनसे युगमें भगवान् किस रूपमें अवतीर्ण होते हैं?’—राजा निमिके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीकरभाजन कलिकालके अवतारी और उनका भजन करनेकी प्रणालीका वर्णन करते हुए कह रहे हैं— सुमेधसः (बुद्धिमन्तः) त्विषा (कान्त्या) अकृष्णं (विद्युद्गौरं शुक्लरक्तवर्णद्वयावशेषं तृतीयं पीतवर्णं) कृष्णवर्णं (कृष्णं वर्णयति गायति यः तम्; यद्वा, कृष्णेति एतौ वर्णौ च यस्मिन् तं) साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् (अङ्गे नित्यानन्दाद्वैतौ, उपाङ्गानि श्रीवासादि-भक्ताः, अस्त्राणि हरिनामादीनि, पार्षदाः गदाधरदामोदरस्वरूपादयः, तैः सहितं) सङ्कीर्त्तनप्रायैः (बहुभिर्मिलित्वा हरिकथा-नाम-गानैः) यज्ञैः यजन्ति। श्लोक-भावानुवाद—शुक्ल और रक्त—इन दो वर्णोंके अतिरिक्त तीसरे विद्युतके समान पीतवर्ण जिनकी कान्ति है, जो ‘कृ’ और ‘ष्ण’, इन दो वर्णोंका गान करते हैं अथवा ये दो वर्ण जिनके नाम श्रीकृष्णचैतन्यमें हैं, अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षदसहित उन श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी बुद्धिमान लोग मिलकर हरिकथा-नाम-गानरूपी सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा आराधना करते हैं। [अङ्ग—श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु; उपाङ्ग—श्रीवासादि भक्त; अस्त्र—हरिनामादि; पार्षद—गदाधर पण्डित-स्वरूप दामोदरादि हैं]॥५१॥ शुन, भाइ, एइ सब चैतन्य-महिमा। एइ श्लोके कहे ताँर महिमार् सीमा॥५२॥
तीसरा अध्याय | १२५
[ ३/५२-५७ अनुवाद-हे भाइयों! अब श्रीचैतन्य महाप्रभुकी यह सब महिमा श्रवण कीजिये। इस श्लोकमें उनकी महिमाकी चरम सीमाका वर्णन किया गया है॥५२॥ 'कृष्णवर्णं'-श्लोककी व्याख्या :- 'कृष्ण' एइ दुइ वर्ण सदा याँर मुखे। अथवा, कृष्णके तिँहो वर्णे निज सुखे॥५३॥ कृष्णवर्ण-शब्देर अर्थ दुइ त' प्रमाण। कृष्ण बिनु ताँर मुखे नाहि आइसे आन॥५४॥ केह ताँरे बले यदि कृष्ण-वरण। आर विशेषणे तारे करे निवारण॥५५॥ अनुवाद-'कृष्ण'-ये दो वर्ण जिनके मुखमें सदा रहते हैं अथवा श्रीकृष्णका जो सदा सुखपूर्वक अपने श्रीमुखसे वर्णन करते हैं। कृष्णवर्ण शब्दके उपरोक्त ये दो अर्थ हैं। उनके मुखसे 'कृष्ण' के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं निकलता है। यदि कोई यह कहे कि उनके शरीरका वर्ण कृष्ण है, तो यह बात इसके अगले विशेषणसे खण्डित हो जाती है॥५३-५५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मूल श्लोकमें यदि कोई 'कृष्णवर्णं' शब्दसे कलियुगके उपास्य पुरुषको कृष्ण (अर्थात् कृष्णरूप कान्तियुक्त) कहते हैं, तो 'त्विषाऽकृष्णं' इस दूसरे विशेषणके अनुसार 'कृष्णवर्णं' का यह अर्थ नहीं हो सकता॥५५॥ देहकान्त्ये हय तैँहो अकृष्णवरण। अकृष्णवरणे ताँर कहे पीतवरण॥५६॥ अनुवाद-उनके शरीरका वर्ण निःसन्देह अकृष्ण अर्थात् कृष्ण नहीं है। 'अकृष्णवर्ण' कहनेसे यह पीतवर्णको सूचित करता है॥५६॥ स्तवमालामें द्वितीय-चैतन्याष्टकमें (१)- कलौ यं विद्वांसः स्फुटमभियजन्ते द्युतिभरा- दकृष्णाङ्गं कृष्णं मखविधिभिरुत्कीर्त्तनमयैः। उपास्यञ्च प्राहुर्यमखिलचतुर्थाश्रमजुषां स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥५७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधिकाकी भावरूप द्युतिका आधिक्य होनेसे अकृष्ण अर्थात् गौररूपको प्राप्त श्रीकृष्णका कीर्त्तनमय यज्ञके द्वारा सभी पण्डित कलिकालमें स्पष्टरूपसे आराधना करते हैं। वे संन्यासके अन्तर्गत परमहंसरूप चतुर्थाश्रमका आश्रय ग्रहण करनेवालोंके एकमात्र उपास्यतत्त्व हैं। वही चैतन्याकृति परमपुरुष शीघ्र ही मेरे प्रति कृपा करें॥५७॥ अनुभाष्य-विद्वांसः (पण्डिताः) स्फुटं (स्पष्टं) द्युतिभरात् (कान्त्याधिक्यात्) अकृष्णाङ्गं (गौरं पीतवर्णं) कृष्णं उत्कीर्त्तनमयैः (उच्चैः कीर्त्तनाख्यभक्त्यवलम्बनैः) मखविधिभिः (नामयज्ञविधानैः) कलौ अभियजन्ते, यं च अखिलचतुर्थाश्रमजुषां (सकलभिक्षूणाम्) उपास्यं (पूज्यं) प्राहुः, सः चैतन्याकृतिः देवः नः (अस्मान्) अतितरां (अतिशयेन) कृपयतु। १२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/५७-६० ] श्लोक-भावानुवाद—कान्तिकॆ आधिक्यके कारण जिन श्रीकृष्णका वर्ण गौर (पीत) है, विद्वान लोग स्पष्टरूपसे उच्च स्वरसे कीर्तनाख्य भक्तिका अवलम्बन करके उनकी नामरूपी यज्ञ विधानके द्वारा कलियुगमें पूजा करते हैं। वे सभी चतुर्थाश्रम-आश्रित भिक्षुकोंके एकमात्र पूज्य कहे गये हैं। वे चैतन्याकृति देव हमपर अतिशय कृपा करें॥५७॥ ब्रह्मज्योतिसे तमोनाश होता है :- प्रत्यक्ष ताँहार तप्तकाञ्चनेर द्युति। याँहार छटाय नाशे अज्ञान-तमस्तति॥५८॥ अनुवाद—उनकी पिघले स्वर्णके समान द्युति प्रत्यक्ष दिखलायी देती है और वह अज्ञानरूपी अन्धकारके विस्तारका नाश करती है॥५८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘अज्ञान-तमस्तति’—अज्ञानरूपी अन्धकारका विस्तार।॥५८॥ जीवेर कल्मष-तमो नाश करिवारे। अङ्ग-उपाङ्ग-नाम नाना अस्त्र धरे॥५९॥ अनुवाद—जीवोंके कल्मष अर्थात् पापराशिरूप अन्धकारको नाश करनेके लिये उन्होंने अङ्ग-उपाङ्ग और श्रीकृष्णनामरूप नाना प्रकारके अस्त्रोंको धारण किया॥५९॥ अमृताणुकणिका—कलियुगके जीव साधारणतः भक्ति-विरोधी कर्मोंमें ही आसक्त हैं। उनकी इस आसक्तिको दूर करनेके उद्देश्यसे परम करुण श्रीगौराङ्ग अङ्ग, उपाङ्ग और श्रीकृष्णनाम-रूप अस्त्र लेकर अवतीर्ण हुए, उन्होंने चक्रादि अस्त्र इस बार प्रकट नहीं किये। जिनके प्रति उन्होंने एक बार ही प्रेम-दृष्टिपात किया अथवा जिन्होंने उनके श्रीअङ्गका एकबार भी दर्शन किया किम्वा उनके मुखसे एकबार भी हरिनाम् सुना, उनकी ही तत्क्षणात् भक्ति-विरोधी कर्मवासना दूर हो गयी। अन्यान्य अवतारोंमें चक्रादि अस्त्रोंका भय दिखाकर जीवकी भक्ति-विरोधी कर्मवासना त्याग करवायी अथवा चक्रादिकी सहायतासे असुरादिका संहार किया, किन्तु इस परम-करुण अवतारमें किसीको भी भय भी नहीं दिखाया और किसीका संहार भी नहीं किया। केवल श्रीअङ्ग और नाम प्रकट करके श्रीअङ्गके मनोहारित्व और श्रीनामके माधुर्यसे बहिर्मुख असुरादिके चित्तको इस प्रकारसे आकृष्ट किया कि उनकी बहिर्मुखता और असुरत्वादि बिना उनके जाने स्वेच्छापूर्वक दूर हो गये तथा वे प्रीति और उत्कण्ठाके सहित भगवत्-भजनमें प्रवृत्त हुए॥५९॥ तमः या कल्मषकी परिभाषा :— भक्तिर विरोधी कर्म, धर्म वा अधर्म। ताहार ‘कल्मष’ नाम, सेइ महातमः॥६०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्म हो अथवा अधर्म हो, जो कोई भी कर्म भक्तिका विरोधी हो, उसका नाम ‘कल्मष’ है—वही महान्धकार है॥६०॥ अमृताणुकणिका—स्वर्गादि-भोग प्राप्ति करानेवाले वैदिक अनुष्ठान भी धर्मके नामसे अभिहित हैं, किन्तु आत्मेन्द्रिय-प्रीतिमूलक होनेसे इन्हें भी भक्तिका विरोधी कहा गया है। यहाँतक कि तीसरा अध्याय | १२७
[ ३/६०-६३ मुक्तिके उद्देश्यसे जो समस्त अनुष्ठान शास्त्रोंमें विहित हैं, वे समस्त भी भक्तिके विरोधी हैं। क्योंकि भक्तिका तात्पर्य एकमात्र श्रीकृष्ण-प्रीति है; जहाँ श्रीकृष्ण-प्रीतिका स्थान नहीं है, अपितु आत्मेन्द्रिय-तृप्तिकी, स्वसुख-साधनकी अथवा स्वदुःख-निवृत्तिकी वासना दिखलायी देती है, वह कभी भी भक्तिके अनुकूल नहीं हो सकती। जबतक भुक्ति और मुक्तिकी स्पृहा हृदयमें जाग्रत रहती है, तबतक उस हृदयमें भक्तिदेवी विराजमान नहीं होतीं। यह भुक्ति-मुक्ति-स्पृहारूपी कल्मष ही गाढ़ अन्धकारके समान जीवके भक्ति-नेत्रोंको आच्छादित करके रखता है। गाढ़ अन्धकारमें जैसे लोग अपने पथको ना देख पानेके कारण कीचड़-काँटोंमें गिरकर कष्ट भोग करते हैं, उसी प्रकार भक्तिविरोधी कर्मरूप कल्मष-परायण लोग भी भक्तिके पथको देख ना पानेके कारण अन्य पथोंपर अग्रसर होकर संसार-यन्त्रणा भोग करते हैं॥६०॥ बाहु तुलि' हरि बलि' प्रेमदृष्ट्ये चाय। करिया कल्मष नाश प्रेमेते भासाय ॥६१॥ अनुवाद-जब महाप्रभु अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर 'हरिबोल' कहते हुए लोगोंको प्रेमदृष्टिसे देखते हैं, तब वे सभीके कल्मष नाशकर उन्हें श्रीकृष्णप्रेममें डुबो देते हैं॥६१॥ स्तवमालामें द्वितीय-चैतन्याष्टकमें (८)— स्मितालोकः शोकं हरति जगतां यस्य परितो गिरान्तु प्रारम्भः कुशलपटलीं पल्लवयति। पदालम्भः कं वा प्रणयति न हि प्रेमनिवहं स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥६२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनकी मन्दहास्ययुक्त दृष्टि जगत्के शोकको सम्पूर्णरूपसे दूर कर देती है, जिनके वाक्यका प्रारम्भ ही सभी प्रकारके कल्याणकी लतारूपी भक्तिलताको पल्लवित करता है और जिनके चरणोंका आश्रय समस्त प्रेमरहस्यको प्राप्त करानेवाला है, वे ही चैतन्याकृति देव मेरे प्रति प्रचुर कृपा करें॥६२॥ अनुभाष्य-यस्य (चैतन्यदेवस्य) स्मितालोकः (मन्दहासकटाक्षः) जगतां (सर्वप्राणिनां) परितः (सर्वतोभावेन) शोकम् (अभावं) हरति (विनाशयति), गिरां प्रारम्भः (वाक्योपक्रमः) तु कुशलपटलीं (कल्याणमालां) पल्लवयति (विस्तारयति), पदालम्भः (चरणाश्रयः) कं वा प्रेमनिवहं (प्रेममकलं) न हि प्रणयति (प्रापयति), सः चैतन्याकृति देवः नः (अस्मान्) अतितरां कृपयतु। श्लोक-भावानुवाद-जिनका मन्द हास्यसे युक्त कटाक्ष सभी प्राणियोंके सभी प्रकारसे शोक (अभावों) का विनाश करता है। जिनके वाक्यका आरम्भ ही कल्याणरूपी मालाका विस्तार करता है। जिनके चरणोंका आश्रयकर कौन प्रेम नहीं प्राप्त करता? वे चैतन्याकृति देव हमपर अतिशय कृपा करें॥६२॥ गौरदर्शनसे पापक्षय और प्रेमकी प्राप्ति :- श्रीअङ्ग, श्रीमुख येइ करे दरशन। तार पापक्षय हय, पाय प्रेमधन ॥६३॥ १२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/६३-६७ ]
अन्यान्य अवतारोंके अस्त्र और सैन्यसामन्त, किन्तु गौरावतारके भक्त और सङ्कीर्तन :- अन्य अवतारे सब सैन्य-शस्त्र सङ्गे। चैतन्य-कृष्णेर सैन्य अङ्ग-उपाङ्गे॥६४॥ अनुवाद—श्रीगौरसुन्दरके श्रीअङ्ग और श्रीमुखका जो भी दर्शन करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह प्रेमधनको प्राप्त करता है। अन्य अवतारोंमें वे सेना और अस्त्र-शस्त्र लेकर अवतरित होते हैं, किन्तु इस श्रीकृष्णचैतन्य अवतारमें उनके अङ्ग और उपाङ्ग ही उनकी सेना है॥६३-६४॥
स्तवमालाका प्रथम-चैतन्याष्टकमें (१)— सदोपास्यः श्रीमान् धृतमनुजकायैः प्रणयितां वहद्भिर्गीर्वाणैर्गिरिश-परमेष्ठि-प्रभृतिभिः। स्वभक्तेभ्यः शुद्धां निजभजनमुद्रामुपदिशन् स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥६५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मनुष्य शरीरधारी शिव-ब्रह्मादि देवताओंके प्रणयको ग्रहण करनेवाले श्रीचैतन्यदेव सभी जीवोंके सदा उपास्य हैं। अपने भक्तोंको अपनी विशुद्ध भजन-परिपाटीका उपदेश करते-करते वे श्रीचैतन्यदेव क्या पुनः मेरे नयनगोचर होंगे?॥६५॥ अनुभाष्य—प्रणयितां वहद्भिः (स्वानुरागपोषणपरैः) धृतमनुजकायैः (गृहीत-नरशरीरैः) गिरिश-परमेष्ठिप्रभृतिभिः (शिवचतुर्मुखादिभिः) गीर्वाणैः (देवैः) सदा (नित्यं) उपास्यः (पूज्यः) स्वभक्तेभ्यः (स्वरूप-रामानन्दादि-निजजनेभ्यः) शुद्धां (निर्मलाम् अन्याभिलाषिताहीनां कर्मज्ञानाद्यनावृतां) निजभजनमुद्रां (स्वभजन-परिपांटिं) उपदिशन् स चैतन्यः किं पुनः अपि मे (मम) दृशोः पदं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—नर शरीरधारी शिव-ब्रह्मादि देवताओंके अपने प्रति अनुरागको पुष्ट करनेवाले, सभीके नित्य उपास्य, निजभक्तों (स्वरूप दामोदर, राय रामानन्दादि निजजनों) को निर्मल (श्रीकृष्णसेवासे इतर अभिलाषा रहित और कर्म-ज्ञानादिसे अनावृत) अपने भजनकी परिपाटी (विधि) का उपदेश करते हुए वे श्रीचैतन्य क्या पुनः मेरे दृष्टिपथपर प्राप्त होंगे?॥६५॥
अङ्गोपाङ्ग अस्त्र करे स्वकार्यसाधन। 'अङ्ग'-शब्देर अर्थ आर शुन दिया मन॥६६॥ 'अङ्ग'-शब्दे अंश कहे शास्त्र-परमाण। अङ्गेर अवयव 'उपाङ्ग'-व्याख्यान॥६७॥ अनुवाद—इस अवतारमें अङ्ग-उपाङ्गरूप अस्त्रोंके द्वारा वे अपने कार्यको सिद्ध करते हैं। अब मन लगाकर 'अङ्ग' शब्दका अर्थ श्रवण करें। शास्त्रोंमें यह प्रमाणित है कि 'अङ्ग' शब्दका अर्थ अंश होता है। अङ्गके अङ्गको 'उपाङ्ग' कहा जाता है॥६६-६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अङ्ग शब्दका पहले किये गये अर्थके अतिरिक्त एक और अर्थ है;
तीसरा अध्याय | १२९
जैसे, - अङ्ग शब्दका अर्थ है अंश। 'परमाण' अर्थात् प्रमाण। अङ्गका अवयव (अंश) उपाङ्ग है॥ ६७॥ श्रीमद्भागवत (१०/१४/१४)- नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना- तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥ ६८॥ अनुवाद-आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥ ६८॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥ ६८॥ जलशायी अन्तर्यामी येइ नारायण। सेहो तोमार अंश, तुमि मूल नारायण॥ ६९॥ 'अङ्ग'-शब्दे अंश कहे, सेहो सत्य हय। मायाकार्य नहे-सब चिदानन्दमय॥ ७०॥ अनुवाद-कारण, गर्भ और क्षीर समुद्रके जलमें शयन करनेवाले सभीके अन्तर्यामी नारायण आपके अंश हैं एवं आप मूल नारायण हैं। 'अङ्ग' शब्दका अर्थ अंश है, यह सत्य है, किन्तु यह मायाके द्वारा रचित कार्य नहीं है; आपके सभी अंश चिदानन्दमय है॥ ६९-७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अङ्ग शब्दसे अंशरूप कारणाब्धिशायी आदि तीन पुरुषावतारोंको समझना चाहिये। वे सब चिदानन्दमय हैं, वे ईश्वर हैं अर्थात् मायानिर्मित तत्त्व नहीं है। इसलिये श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, ये दोनों महाप्रभुके दो अङ्ग हैं। अनुभाष्य-जिस प्रकार माया-जगत्में मायाके द्वारा वस्तु खण्डित होकर अंश होती है, उस प्रकार मायासे अतीत विष्णुत्तत्त्वके अंश होनेपर भी विष्णुत्व अथवा वस्तुत्वमें खण्ड नहीं होते। दीपके उदाहरणमें यह देखा जाता है कि मूल दीपसे अन्य दीप उदित होनेपर भी जैसे उनमें वस्तुतः उनमें पार्थक्य नहीं रहता, उसी प्रकार स्वयंरूप श्रीकृष्णके स्वयंप्रकाश या विलास श्रीबलदेव प्रभुसे समस्त विष्णुत्तत्त्वका आविर्भाव होता है-परस्परका लीलाभेद रहनेपर भी ये वस्तुतः अभेद हैं। वे चिदानन्दमय विष्णुत्तत्त्व सभी मायाधीश हैं-माया उनके ऊपर कोई कार्य नहीं कर सकती। विष्णुत्तत्त्वसे भिन्न जो वस्तुएँ हैं, उनपर मायाकी क्रिया होती है। मायाके द्वारा वशमें किये जा सकनेके कारण भगवान्के विभिन्नांश ब्रह्मा और शिव विकारको प्राप्त होते हैं। दूधकी परिणति जिस प्रकार दही है, शम्भु-तत्त्व आदि भी उसी प्रकार हैं। (अधिक जाननेके लिये ब्रह्मसंहितामें श्रीजीव गोस्वामीकी टीका द्रष्टव्य है)॥७०॥ दो विष्णु ही दो सेनापति :- अद्वैत, नित्यानन्द-चैतन्येर दुइ अङ्ग। अङ्गेर अवयवगण कहिये उपाङ्ग॥ ७१॥ अङ्गोपाङ्ग तीक्ष्ण अस्त्र प्रभुर सहिते। सेइ सब अस्त्र हय पाषण्ड दलिते॥ ७२॥
३/७१-७६ ] नित्यानन्द गोसाञि साक्षात् हलधर। अद्वैत आचार्य गोसाञि साक्षात् ईश्वर ॥७३ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीचैतन्य महाप्रभुके दो अङ्ग हैं, अङ्गके अवयव अर्थात् अंशको ही उपाङ्ग कहा जाता है। पाषण्डी लोगोंके दलनके लिये प्रभुके साथ सदा ये सभी अङ्ग-उपाङ्गरूपी तीक्ष्ण अस्त्र रहते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभु साक्षात् हलधर अर्थात् श्रीबलदेव प्रभु हैं और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु साक्षात् ईश्वर हैं॥७१-७३ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'साक्षात् ईश्वर' अर्थात् वे साक्षात् महाविष्णुका अवतार हैं॥७३ ॥ अनुभाष्य—'पाषण्ड'—जो लोग मायाधीश विष्णुत्तत्त्वके साथ मायावश्य शिवादि-तत्त्वको समान मानते हैं, भगवत्-लीलाके नित्यत्वको नहीं समझकर नित्य भक्तितत्त्वको कालके द्वारा खण्डित तथा अनित्य कर्ममात्र मानते हैं, वे पाषण्डी हैं। इस प्रकारके पाषण्डियोंकी दुर्बुद्धिको दूर करनेका विष्णु और उनके सेवकोंका (वैष्णवोंका) प्रयास है॥७२॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं श्रीकृष्ण हैं, श्रीबलदेव श्रीकृष्णके विलासरूप अंश हैं और महाविष्णु उनके स्वांश हैं। इसलिये श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैत प्रभु भी श्रीचैतन्य महाप्रभुके अङ्ग हैं। और श्रीअद्वैत तथा श्रीनित्यानन्द प्रभुके जो अङ्ग (अथवा अंश—उनके अनुगत भक्तमण्डली), उसका नाम ही श्रीकृष्णचैतन्यके उपाङ्ग है; श्रीवासादि भक्तवृन्द ही उपाङ्ग हैं। श्रीअद्वैत-नित्यानन्द-श्रीवासादिरूप अङ्ग-उपाङ्ग ही पाषण्ड दलन कार्यके लिये अस्त्रतुल्य कहे गये हैं। श्रीभगवान्के तीक्ष्ण अस्त्रोंके सामनेसे जैसे असुर बचकर नहीं भाग सकते, अपितु मारे जाते हैं, उसी प्रकार श्रीअद्वैत-नित्यानन्दादिके प्रभावसे कोई भी पाषण्डी भाग नहीं सकते, उनके अलौकिक प्रभावसे सभी पाषण्डी पाषण्डत्व त्यागकर परम-भागवत हो जाते हैं॥७१-७३॥ भक्तगण ही सैनिक और श्रीकृष्णकीर्त्तन ही अस्त्र :— श्रीवासादि परिषद सैन्य सङ्गे लञा। दुइ सेनापति बुलेन कीर्त्तन करिया ॥७४ ॥ पाषण्डदलनवाना नित्यानन्द राय। आचार्य-हुङ्कारे पाप-पाषण्डी पलाय ॥७५ ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य प्रभु—ये दो सेनापति अपनी सेनाओंके साथ अर्थात् श्रीवासादि पार्षदोंको लेकर कीर्त्तन करते हुए सर्वत्र भ्रमण करते हैं। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी अङ्ग-भङ्गिमा आदि चिह्न देखनेसे ही विश्वास होता है कि वे पाषण्डियोंका अर्थात् उनकी पाषण्ड-वृत्तिका दलन करनेमें सक्षम हैं। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी हुङ्कारसे ही पापी-पाषण्डी भाग जाते हैं अर्थात् उनके पाप-पाषण्ड दूर होकर वे परम-भागवत बन जाते हैं॥७४-७५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'वाना' का अर्थ चिह्न होता है। यह तुरीभेरीकी भाँति एक प्रकारका यन्त्र होता है, जिसके द्वारा पाषण्डदलन-चिह्न प्रकाशित होता है॥७५॥ श्रीकृष्णकीर्त्तनके पिता श्रीगौरसुन्दर :— सङ्कीर्त्तन-प्रवर्त्तक श्रीकृष्णचैतन्य। सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे भजे, सेइ धन्य ॥७६ ॥ तीसरा अध्याय | १३१
[ ३/७६-७८
अनुवाद- श्रीकृष्ण नामसङ्कीर्तनके प्रवर्तक स्वयं श्रीकृष्णचैतन्य हैं। सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा जो उनका भजन करता है, वह धन्य है॥७६॥ अमृतानुकणिका-श्रीचैतन्यदासानुदास आत्माकी स्वाभाविक वृत्तिसे निरन्तर “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” सम्बोधनात्मक नामोच्चारण करते रहते हैं। एकमात्र इसीके द्वारा ही विप्रलम्भ-विग्रह सपारषद श्रीगौरसुन्दरकी आराधना होती है। क्योंकि इस प्रकार सङ्कीर्तन और सम्बोधनात्मक उच्चारण अत्यन्त विरह-कातर भक्तोंके हृदयसे प्रस्फुटित प्रस्रवन है। सङ्कीर्तनके समान विरहोत्सव और नहीं है। इसलिये श्रीचैतन्यदासगण अन्यान्य सम्भोग-गन्धमय साधनोंका परित्याग करके एकमात्र 'सङ्कीर्तन'को ही साधन और साध्य कहकर निरूपण करते हैं॥७६॥ सेइ त' सुमेधा, आर कुबुद्धि संसार। सर्व-यज्ञ हैते कृष्णनामयज्ञ सार॥७७॥ जड़कर्मके साथ श्रीनामप्रभुका समान-ज्ञान पाषण्डता :- कोटि अश्वमेध एक कृष्ण-नाम सम। येइ कहे, से पाषण्डी, दण्डे तारे यम॥७८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७-७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो सङ्कीर्त्तन यज्ञके द्वारा श्रीकृष्णचैतन्यका भजन करते हैं, वे ही सुमेधा अर्थात् सुबुद्धिवाले हैं और संसारमें जो लोग उनका इस प्रकार भजन नहीं करते हैं, वे लोग नितान्त मन्दबुद्धिवाले हैं। श्रीकृष्णनाम-यज्ञ सभी यज्ञोंका सार है। करोड़ों अश्वमेध-यज्ञोंके साथ भी एक श्रीकृष्णनामकी तुलना नहीं हो सकती। जो दोनोंको समान समझता है, वह पाषण्डी है और उसे यमराजके दण्डका भागी बनना पड़ता है अर्थात् बार-बार जन्म-मरणके चक्रमें घूमना पड़ता है॥७७-७८॥ अनुभाष्य- “धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्वशुभ-क्रिया-साम्यमपि प्रमादः।” अर्थात् धर्म, व्रत, त्याग, होमादि प्राकृत शुद्ध कर्मोंको अप्राकृत भगवन्नामके समान या तुल्य समझना भी प्रमाद या असावधानी है, पद्मपुराणमें वर्णित दस नामापराधोंमें यह आठवाँ नामापराध सम्पूर्णरूपसे वर्जनीय है। “गो-कोटिदानं ग्रहणे खगस्य, प्रयाग-गङ्गोदक-कल्पवासः। यज्ञायुतं मेरुसुवर्णदानं, गोविन्दकीर्त्तनं समं शतांशैः।” (स्कन्द पुराण) अर्थात् “यदि कोई सूर्य या चन्द्र-ग्रहणके समय एक करोड़ गाय दान करता है, गङ्गा-यमुनाके सङ्गम-स्थल प्रयागमें एक कल्पतक वास करता है, दस हजार यज्ञ करता है और ब्राह्मणोंको सुमेरू पर्वतके समान ऊँचे स्वर्णके पर्वतका दान करता है, तो भी उसका फल श्रीगोविन्दके कीर्तनके सौवें भागके बराबर भी नहीं होता।”॥७८॥ अमृतानुकणिका-पद्मपुराणके पातालखण्डमें अश्वमेध यज्ञकी महिमाको अगस्त्य मुनि श्रीरामचन्द्रजीको बतलाते हुए कहते हैं-
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३/७८ ] “एवं प्रकुर्वतः कर्म यज्ञः सम्पूर्णातां गतः। करोति सर्वपापानां नाशनं रिपुनाशनं ॥ ४/१९१॥” अर्थात् “यथाविधि इसका अनुष्ठान करनेसे समस्त पाप और शत्रु नष्ट हो जाते हैं।” अश्वमेध यज्ञ वेदोंके कर्मकाण्ड विधानके अन्तर्गत है। कर्मकाण्डके अनुष्ठानमें मन्त्रोंके उच्चारणमें स्वरादि-भ्रंशजनित त्रुटि, तन्त्रोक्त विधानके क्रमभङ्गजनित त्रुटि, देश-काल-पात्रादिकी त्रुटि, वस्तु और दक्षिणादि विषयक त्रुटि-ऐसी बहुतसी त्रुटियाँ होनेकी सम्भावना रहती है। इन समस्त त्रुटियोंका शोधन किये बिना कोई भी कर्म अपना फल प्रदान नहीं करता। इसलिये इन समस्त त्रुटियोंके शोधनके लिये प्रत्येक वैदिक अनुष्ठानके पश्चात् ‘अच्छिद्र-मन्त्र’के पाठका विधान है। यह अच्छिद्र मन्त्र भी हरिनाम-सङ्कीर्तनके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। भागवत (८/२३/१६) में शुक्राचार्यकी भगवान् वामनदेवके प्रति उक्ति- “मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः। सर्वं करोति निश्छिद्रं नामसङ्कीर्तनं तव॥” अर्थात् “हे भगवन्! मन्त्रोंकी, अनुष्ठान पद्धतिकी, देश, काल, पात्र और वस्तुकी समस्त त्रुटियाँका आपके नाम-सङ्कीर्तनसे शोधन हो जाता है; आपका नाम समस्त त्रुटियोंको पूर्ण कर देता है।” इससे समझा जा सकता हैं कि नाम-सङ्कीर्तनकी सहायताके बिना अश्वमेध यज्ञादिका फलदानके उपयोगी भावसे अनुष्ठित होनेकी सम्भावना अति अल्प है। और समस्त कर्मोंके फलदाता भी श्रीकृष्ण हैं, कर्म स्वयं फलदान करनेमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्ण और उनके नाममें कोई भेद नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णकी समस्त शक्ति उनके नाममें हैं, किसी यज्ञादिमें नहीं। इसलिये नाममें ही समस्त कर्मोंके फलदानकी अन्य-निरपेक्ष भावसे यथेष्ट शक्ति है। (हःभःविः ११/३९८-३९९, स्कन्दपुराण वचन)- “दानव्रततपस्तीर्थक्षेत्रादिनाश्च याः स्थितः। शक्तयो देव-महतां सर्वपापहराः शुभाः॥ राजसूयाश्वमेधानां ज्ञानस्याध्यात्मवस्तुनः। आकृष्य हरिणा सर्वाः स्थापिताः स्वेषु नामसु॥” अर्थात् “दान, व्रत, तपस्या, तीर्थयात्रादिके द्वारा जो पापसमूह विदूरित होते हैं, देवता और साधुसेवाके द्वारा जो सब पाप नष्ट होते हैं, राजसूय यज्ञ, अश्वमेध यज्ञके द्वारा और तत्त्व अध्यात्म वस्तु लाभसे जो पापसमूह विनष्ट होते हैं, मङ्गलमय श्रीहरिने उन सब शुभदायिनी शक्तियोंको आकर्षण करके अपने नामोंमें प्रतिष्ठित किया है।” दान-व्रतादि, राजसूय-अश्वमेध यज्ञादिकी पापनाशक शक्तिका जो वर्णन इस श्लोकमें किया गया है, उससे समझा जा सकता है कि ये सभी अनुष्ठान पापोंके प्रायश्चितके लिये ही हैं। किन्तु इन समस्त कर्मकाण्ड-विहित प्रायश्चित करनेके बाद अनुष्ठानकारीको पापोंमें पुनः लिप्त होना देखा जाता है। इसलिये इन सब अनुष्ठानोंसे पाप करनेकी मूल वृत्तिका नाश नहीं होता। किन्तु शुद्ध हरिनामकी बात तो दूर, नामाभाससे ही समस्त पापोंका समूल नाश हो जाता है और पाप करनेके वृत्ति सदाके लिये दूर हो जाती है, अजामिलका चरित्र ही इसका प्रमाण तीसरा अध्याय | १३३
[ ३/७८-८२ है। किन्तु नामका यही एकमात्र फल नहीं है, एक शुद्ध श्रीकृष्णनामसे श्रीकृष्णप्रेम और श्रीकृष्णसेवा तक प्राप्त होते हैं, जो कोटि-कोटि अश्वमेध यज्ञोंके द्वारा भी सम्भव नहीं है॥७८॥ 'भागवतसन्दर्भ'-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे। ए श्लोक जीवगोसाञि करियाछे व्याख्याने॥७९॥ अनुवाद-जीवगोस्वामी पादने अपना स्वकृत ग्रन्थ 'भागवतसन्दर्भ' के मङ्गलाचरणमें निम्नलिखित श्लोकके द्वारा व्याख्या की है॥७९॥ तत्त्वसन्दर्भ (२)- अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं दर्शिताङ्गादिवैभवम्। कलौ सङ्कीर्त्तनाद्यैः स्म कृष्णचैतन्यमाश्रिताः॥८०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अङ्ग-उपाङ्गादि वैभवके द्वारा लक्षित भीतरमें साक्षात् श्रीकृष्ण और बाहर श्रीगौरस्वरूप श्रीकृष्णचैतन्यका कलियुगमें सङ्कीर्तनादि अङ्गोंके द्वारा हम आश्रय ग्रहण करते हैं॥८०॥ अनुभाष्य-श्रीजीवगोस्वामीने 'कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं' श्लोकको 'भागवत-सन्दर्भ' (षट्सन्दर्भ) के मङ्गलाचरणमें लिखा है। इसके अनुरूप उनके द्वारा रचित श्लोक-'अन्तःकृष्णं बहिर्गौरम्'-मङ्गलाचरणका दूसरा श्लोक है और यह भागवतमें वर्णित करभाजनके श्लोककी व्याख्यामात्र है। षट्सन्दर्भकी अनुव्याख्या 'सर्वसंवादिनी' ग्रन्थके प्रारम्भमें इसका तात्पर्य वर्णित हुआ है। अन्तःकृष्णं (अन्तर्मध्ये चित्ताभ्यन्तरे कृष्णो यस्य तं, राधा हृदयभावेन आवृतकृष्णहृद्गत-नागरभावं) बहिर्गौरं (देहकान्तिकिरणैः पीतवर्णविग्रहं) दर्शिताङ्गादिवैभवं (दर्शितं प्रकटितं अङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदवैभवं येन तं) कृष्णचैतन्यं कलौ सङ्कीर्तनाद्यैः (नामसङ्कीर्तनयज्ञाद्यैः) [वयम्] आश्रिताः स्म। श्लोक-भावानुवाद-वे जो चित्तमें भीतरसे श्रीकृष्ण हैं और श्रीकृष्णके हृदयगत-नागरभाव अभी राधाजीके हृदयके भावोंसे आवृत हैं, बाहरसे देहकान्तिकी किरणोंसे पीतवर्ण विग्रहवाले हैं, जो अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षदादि वैभवको प्रकट कर रहे हैं, उन श्रीकृष्णचैतन्यके कलियुगमें नामसङ्कीर्तन यज्ञादिके द्वारा हम आश्रित होते हैं॥८०॥ उपपुराणेह शुनि श्रीकृष्णवचन। कृपा करि व्यास प्रति करियाछेन कथन॥८१॥ अनुवाद-उपपुराणोंमें भी श्रीकृष्णका यह वचन सुना जाता है, जो उन्होंने कृपा करके व्यासजीको कहा है॥८१॥ उपपुराण- अहमेव क्वचिद् ब्रह्मन् संन्यासाश्रममाश्रितः। हरिभक्तिं ग्राहयामि कलौ पापहतान्नरान्॥८२॥ १३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/८२-८४ ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे ब्रह्मन् ! किसी विशेष कलियुगमें मैं संन्यासाश्रमको ग्रहणकर पापोंसे रहित मनुष्योंको हरिभक्ति प्रदान करूँगा॥८२॥ अनुभाष्य-किसी उपपुराणमें यह श्लोक मिलता है- हे ब्रह्मन्, अहं (भगवान्) एव क्वचित् कलौ (वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंश-चतुर्युगीय-कलियुगे प्रथम- सन्ध्यायां) संन्यासाश्रमं (तुर्याश्रमं) आश्रितः सन् (अवलम्ब्य) पापहतान् नरान् हरिभक्तिं ग्राहयामि (दास्यामि)। श्लोक-भावानुवाद-हे ब्रह्मन् ! मैं स्वयं-भगवान् कृष्ण ही किसी कलियुग [वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें कलियुगकी प्रथम संध्यामें] चतुर्थ आश्रम संन्यासका अवलम्बन करके निष्पाप मनुष्योंको हरिभक्ति दूँगा॥८२॥ गौरसुन्दरकी स्वयं भगवत्ता-विषयमें शब्दप्रमाण :- भागवत, भारतशास्त्र, आगम पुराण। चैतन्य-कृष्ण-अवतार प्रकट प्रमाण ॥ ८३ ॥ अनुवाद-श्रीमद्भागवत, महाभारत, वेदों और पुराणोंमें श्रीकृष्णचैतन्य अवतारके स्पष्ट प्रमाण हैं॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भागवतमें “कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं”, “आसन वर्णास्त्रयो”, “छन्न कलौ” आदि वाक्योंसे; महाभारतमें “सम्भवामि युगे युगे”, “संन्यासकृत् शमः शान्तः” आदि वचनोंसे; “महान प्रभुर्वे पुरुषः” “यदा पश्यः पश्यति रुक्मवर्णं” आदि वेदवाक्योंसे; “मायापुरे भविष्यामि शचीसुतः” आदि आगम-अनुगत अनेक तन्त्रवाक्योंसे और “अहमेव” आदि उपपुराणोंके वाक्योंसे श्रीचैतन्यकृष्णका साक्षात् अवतार होना प्रमाणित हुआ है॥८३॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/२२ का अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ इस विषयमें प्रत्यक्ष प्रमाण :- प्रत्यक्षे देखह नाना प्रकट प्रभाव। अलौकिक कर्म, अलौकिक अनुभाव ॥ ८४ ॥ अनुवाद-उनकी अलौकिक लीला और उनके अलौकिक अनुभावोंके द्वारा प्रकटित उनके प्रभावको प्रत्यक्ष रूपसे देखा जा सकता है॥८४॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुका लीलासार्मथ्य, उनका लोकातीत आचरण और लोकातीत महिमा-प्रभाव-वैचित्र्य स्वयं अपनी इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष देखनेपर ही शास्त्रोंका लक्ष्य श्रीगौर स्वयं श्रीकृष्ण हैं, यह समझा जा सकता है॥८४॥ अमृताणुकणिका-प्रश्न हो सकता है-श्रीकृष्ण कलियुगमें श्रीगौररूपमें अवतीर्ण हुए हैं, शास्त्र प्रमाणके अनुसार उसे तो स्वीकार किया जा सकता है, परन्तु नवद्वीपमें जो अवतीर्ण हुए हैं, क्या वे ही ये शास्त्रकथित श्रीकृष्णचैतन्य हैं? इसके उत्तरमें कहते हैं-नवद्वीप-विहारी श्रीकृष्णचैतन्य ही वे शास्त्रकथित कलि-अवतार हैं, इसके अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। १)-शास्त्रोंमें कलि-अवतारके जो समस्त प्रभावोंका वर्णन है, नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यका भी वैसा प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। २)-नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यने वनके पशु-पक्षी तकको तीसरा अध्याय | १३५
[ ३/८४-८६ प्रेमदानरूप जो समस्त अलौकिक कर्म किये, वे स्वयं श्रीकृष्णके अतिरिक्त और किसीके लिये सम्भव नहीं हैं। ३)—नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीअङ्गोंमें जो समस्त प्रेम-विकारादि दिखलायी दिये, वे किसी जीवके पक्षमें तो दूरकी बात है, अन्य किसी भगवत्-स्वरूपके पक्षमें भी सम्भव नहीं है; वास्तवमें राधा-भाव-द्युति-सुवलित श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीके भी पक्षमें सम्भव नहीं है। शास्त्रकथित लक्षणोंके साथ मिलाकर अवतारकी भगवत्ता-निर्धारण-विषयमें भक्तोंकी अनुभूति ही मुख्य प्रमाण है। भक्तिके प्रभावसे भक्तका चित्त गुणातीत निर्मलत्व प्राप्त करता है और भगवान्की कृपाशक्तिको धारण करनेकी योग्यता भी प्राप्त करता है। इस कृपाशक्तिके प्रभावसे ही भक्त भगवान्के रूप-गुण-लीलादिको यथार्थ अनुभव करनेमें सक्षम होता है, अन्य लोग नहीं। क्योंकि भक्तिदेवीकी कृपासे भक्तके चित्तसे सभी दोष दूर हो जाते हैं और वह दिव्यज्ञान लाभ करता है। (आदि २/८६)—“भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। आर्ष-विज्ञवाक्ये नाहि दोष एइसब।”॥८४॥ अधोक्षज-तत्त्व भोगनेत्रोंके द्वारा नहीं देखे जा सकते :— देखिया ना देखे यत अभक्तेर गण। उलूके ना देखे येन सूर्येर किरण॥८५॥ अनुवाद—जैसे उल्लू सूर्यको ना देख पानेके कारण उसके अस्तित्वको नकार देता है, वैसे अभक्त लोग भी इस लीलावैचित्र्यको देखकर भी अनदेखा करते हैं॥८५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘उलूक’—सूर्यके प्रकाशमें देखनेमें असमर्थ उल्लू। सूर्यके किरणोंको देखनेमें सक्षम ना होनेके कारण वह सूर्यके अस्तित्वको स्वीकार नहीं कर पाता है॥८५॥ अमृताणुकणिका—दिनके समय उल्लू जैसे वृक्षके छिद्रमें रहकर उसके बाहर सूर्यकिरणको नहीं देखता और अपनी आँख बन्दकर भीतर ही रहता है, वैसे ही जो अभक्त हैं, संसार-आसक्तिवशतः संसारके छिद्रमें ही आबद्ध रहकर वे भी विषयोंसे अतीत श्रीभगवत्-अनुभव लाभ नहीं कर पाते; संसार-सुखसे मुग्ध होकर भगवत्-अनुभव लाभ करनेकी चेष्टा भी नहीं करते। उल्लूको जैसे अन्धकारमें रहना अच्छा लगता है, वैसे ही अभक्त लोगोंको भी अज्ञान-अन्धकारमें ही रहना अच्छा लगता है॥८५॥ आलवन्दारु यामुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (१५)— त्वां शीलरूपचरितैः परमप्रकृष्टैः सत्त्वेन सात्त्विकतया प्रबलैश्च शास्त्रैः। प्रख्यातदैवपरमार्थविदां मतैश्च नैवासुरप्रकृतयः प्रभवन्ति बोद्धुम्॥८६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! आपके अवतार-तत्त्वज्ञ परमार्थको जाननेवाले व्यासादि भक्त प्रबल सात्त्विक शास्त्रोंके द्वारा (और) आपके शील-स्वभाव, रूप, चरित्र एवं परम सात्त्विकभावको लक्ष्य करके आपको जान पाते हैं, किन्तु रजो और तमोगुण प्रधान आसुरिक प्रकृतिवाले जीव आपको पहचाननेमें समर्थ नहीं हो पाते॥८६॥ १३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
३/८६-८९ ] अनुभाष्य—श्रीरामानुजाचार्यके गुरु और परमगुरु श्रीयामुनाचार्य, जिनका दूसरा नाम आलवन्दारु है, उन्होंने अपने द्वारा रचित स्तोत्ररत्नके पन्द्रहवें और अठारहवें, दो श्लोकोंमें भगवान्की महिमा और ऐश्वर्यका वर्णन किया है— हे भगवन्! परमप्रकृष्टैः (सर्वोत्कृष्टतमैः) शीलरूपचरितैः (शीलं रूपाणि च चरितानि च तैः) सत्त्वेन (अलौकिक प्रभावेण) सात्त्विकतया (सत्त्वप्रधानतया) प्रबलैः शास्त्रैः प्रख्यातदैवपरमार्थविदां (प्रसिद्धं दैवं परमार्थञ्च विदन्ति ये तेषां) मतैश्च आसुर-प्रकृतयः (दुर्बुत्ताः भक्तद्रोहिनः) त्वां बोद्धुं (ज्ञातुं) न प्रभवन्ति (समर्थाः भवन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८६॥ किन्तु भक्तके प्रेमसे अजित भगवान्को भी जीता जाता है, वैकुण्ठको मापा जा सकता है :— आपना लुकाइते कृष्ण नाना यत्न करे। तथापि ताँहार भक्त जानये ताँहारे॥८७॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीकृष्ण अपने आपको छिपानेके लिये बहुत प्रयत्न करते हैं, तथापि उनके भक्त उनको पहचान लेते हैं॥८७॥ आलवन्दारु यामुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (१८)— उल्लङ्घितत्रिविधसीमसमातिशायि सम्भावनं तव परिव्रढ़िम-स्वभावम्। मायाबलेन भवतापि निगुह्यमानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभावाः॥८८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! देश, काल और चिन्तन—इन तीन सीमाओंके द्वारा सभी वस्तुएँ आबद्ध हैं, किन्तु आपका गूढ़स्वभाव असमोर्ध्व और अद्वितीय होनेके कारण उक्त तीन प्रकारकी सीमाओंका अतिक्रमणकर वर्तमान है। आप अपनी मायाके द्वारा इस स्वभावको आच्छादित करते हैं, किन्तु आपके अनन्यभक्त सदा आपका दर्शन करनेमें सक्षम होते हैं॥८८॥ अनुभाष्य—उल्लङ्घित-त्रिविध-सीम-समातिशायि-सम्भावनं (उल्लङ्घिता अतिक्रान्ता त्रिविधानां देशकालद्रव्यानां सीमा समा अतिशायिनी च सम्भावना च येन तं) भवता मायाबलेन (स्वयोगमायासामर्थ्येन) निगुह्यमानं अपि तव परिब्रढ़िम-स्वभावं (परिब्रढ़िम्नः प्रभुत्वस्य स्वभावं स्वरूपं) केचित् त्वदनन्यभावाः (त्वयि अनन्यभावाः एकान्तभक्ताः) अनिशं (निरन्तरं) पश्यन्ति। श्लोक-भावानुवाद—जिनके समान अथवा अधिक होनेकी किसीकी कोई सम्भावना नहीं है, वे आप देश-काल-द्रव्य इन तीन प्रकारकी सीमाओंका उल्लङ्घन करके अपनी योगमायाके बलसे अपनेको गोपनीय रखनेका प्रयास करते हैं, तो भी आपके गूढ़ स्वभाव या स्वरूपको आपके अनन्य भक्त निरन्तर देखते हैं॥८८॥ अधोक्षज—भक्तिके द्वारा प्राप्य, इन्द्रियोंके ज्ञानसे अतीत :— असुरस्वभाव कृष्णे कभु नाहि जाने। लुकाइते नारे कृष्ण भक्तजन-स्थाने॥८९॥ तीसरा अध्याय | १३७