भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ ३/७६-७८

अनुवाद- श्रीकृष्ण नामसङ्कीर्तनके प्रवर्तक स्वयं श्रीकृष्णचैतन्य हैं। सङ्कीर्तन-यज्ञके द्वारा जो उनका भजन करता है, वह धन्य है॥७६॥ अमृतानुकणिका-श्रीचैतन्यदासानुदास आत्माकी स्वाभाविक वृत्तिसे निरन्तर “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥” सम्बोधनात्मक नामोच्चारण करते रहते हैं। एकमात्र इसीके द्वारा ही विप्रलम्भ-विग्रह सपारषद श्रीगौरसुन्दरकी आराधना होती है। क्योंकि इस प्रकार सङ्कीर्तन और सम्बोधनात्मक उच्चारण अत्यन्त विरह-कातर भक्तोंके हृदयसे प्रस्फुटित प्रस्रवन है। सङ्कीर्तनके समान विरहोत्सव और नहीं है। इसलिये श्रीचैतन्यदासगण अन्यान्य सम्भोग-गन्धमय साधनोंका परित्याग करके एकमात्र 'सङ्कीर्तन'को ही साधन और साध्य कहकर निरूपण करते हैं॥७६॥ सेइ त' सुमेधा, आर कुबुद्धि संसार। सर्व-यज्ञ हैते कृष्णनामयज्ञ सार॥७७॥ जड़कर्मके साथ श्रीनामप्रभुका समान-ज्ञान पाषण्डता :- कोटि अश्वमेध एक कृष्ण-नाम सम। येइ कहे, से पाषण्डी, दण्डे तारे यम॥७८॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७-७८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो सङ्कीर्त्तन यज्ञके द्वारा श्रीकृष्णचैतन्यका भजन करते हैं, वे ही सुमेधा अर्थात् सुबुद्धिवाले हैं और संसारमें जो लोग उनका इस प्रकार भजन नहीं करते हैं, वे लोग नितान्त मन्दबुद्धिवाले हैं। श्रीकृष्णनाम-यज्ञ सभी यज्ञोंका सार है। करोड़ों अश्वमेध-यज्ञोंके साथ भी एक श्रीकृष्णनामकी तुलना नहीं हो सकती। जो दोनोंको समान समझता है, वह पाषण्डी है और उसे यमराजके दण्डका भागी बनना पड़ता है अर्थात् बार-बार जन्म-मरणके चक्रमें घूमना पड़ता है॥७७-७८॥ अनुभाष्य- “धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्वशुभ-क्रिया-साम्यमपि प्रमादः।” अर्थात् धर्म, व्रत, त्याग, होमादि प्राकृत शुद्ध कर्मोंको अप्राकृत भगवन्नामके समान या तुल्य समझना भी प्रमाद या असावधानी है, पद्मपुराणमें वर्णित दस नामापराधोंमें यह आठवाँ नामापराध सम्पूर्णरूपसे वर्जनीय है। “गो-कोटिदानं ग्रहणे खगस्य, प्रयाग-गङ्गोदक-कल्पवासः। यज्ञायुतं मेरुसुवर्णदानं, गोविन्दकीर्त्तनं समं शतांशैः।” (स्कन्द पुराण) अर्थात् “यदि कोई सूर्य या चन्द्र-ग्रहणके समय एक करोड़ गाय दान करता है, गङ्गा-यमुनाके सङ्गम-स्थल प्रयागमें एक कल्पतक वास करता है, दस हजार यज्ञ करता है और ब्राह्मणोंको सुमेरू पर्वतके समान ऊँचे स्वर्णके पर्वतका दान करता है, तो भी उसका फल श्रीगोविन्दके कीर्तनके सौवें भागके बराबर भी नहीं होता।”॥७८॥ अमृतानुकणिका-पद्मपुराणके पातालखण्डमें अश्वमेध यज्ञकी महिमाको अगस्त्य मुनि श्रीरामचन्द्रजीको बतलाते हुए कहते हैं-

१३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत