भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 175

३/७८ ] “एवं प्रकुर्वतः कर्म यज्ञः सम्पूर्णातां गतः। करोति सर्वपापानां नाशनं रिपुनाशनं ॥ ४/१९१॥” अर्थात् “यथाविधि इसका अनुष्ठान करनेसे समस्त पाप और शत्रु नष्ट हो जाते हैं।” अश्वमेध यज्ञ वेदोंके कर्मकाण्ड विधानके अन्तर्गत है। कर्मकाण्डके अनुष्ठानमें मन्त्रोंके उच्चारणमें स्वरादि-भ्रंशजनित त्रुटि, तन्त्रोक्त विधानके क्रमभङ्गजनित त्रुटि, देश-काल-पात्रादिकी त्रुटि, वस्तु और दक्षिणादि विषयक त्रुटि-ऐसी बहुतसी त्रुटियाँ होनेकी सम्भावना रहती है। इन समस्त त्रुटियोंका शोधन किये बिना कोई भी कर्म अपना फल प्रदान नहीं करता। इसलिये इन समस्त त्रुटियोंके शोधनके लिये प्रत्येक वैदिक अनुष्ठानके पश्चात् ‘अच्छिद्र-मन्त्र’के पाठका विधान है। यह अच्छिद्र मन्त्र भी हरिनाम-सङ्कीर्तनके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। भागवत (८/२३/१६) में शुक्राचार्यकी भगवान् वामनदेवके प्रति उक्ति- “मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुतः। सर्वं करोति निश्छिद्रं नामसङ्कीर्तनं तव॥” अर्थात् “हे भगवन्! मन्त्रोंकी, अनुष्ठान पद्धतिकी, देश, काल, पात्र और वस्तुकी समस्त त्रुटियाँका आपके नाम-सङ्कीर्तनसे शोधन हो जाता है; आपका नाम समस्त त्रुटियोंको पूर्ण कर देता है।” इससे समझा जा सकता हैं कि नाम-सङ्कीर्तनकी सहायताके बिना अश्वमेध यज्ञादिका फलदानके उपयोगी भावसे अनुष्ठित होनेकी सम्भावना अति अल्प है। और समस्त कर्मोंके फलदाता भी श्रीकृष्ण हैं, कर्म स्वयं फलदान करनेमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्ण और उनके नाममें कोई भेद नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णकी समस्त शक्ति उनके नाममें हैं, किसी यज्ञादिमें नहीं। इसलिये नाममें ही समस्त कर्मोंके फलदानकी अन्य-निरपेक्ष भावसे यथेष्ट शक्ति है। (हःभःविः ११/३९८-३९९, स्कन्दपुराण वचन)- “दानव्रततपस्तीर्थक्षेत्रादिनाश्च याः स्थितः। शक्तयो देव-महतां सर्वपापहराः शुभाः॥ राजसूयाश्वमेधानां ज्ञानस्याध्यात्मवस्तुनः। आकृष्य हरिणा सर्वाः स्थापिताः स्वेषु नामसु॥” अर्थात् “दान, व्रत, तपस्या, तीर्थयात्रादिके द्वारा जो पापसमूह विदूरित होते हैं, देवता और साधुसेवाके द्वारा जो सब पाप नष्ट होते हैं, राजसूय यज्ञ, अश्वमेध यज्ञके द्वारा और तत्त्व अध्यात्म वस्तु लाभसे जो पापसमूह विनष्ट होते हैं, मङ्गलमय श्रीहरिने उन सब शुभदायिनी शक्तियोंको आकर्षण करके अपने नामोंमें प्रतिष्ठित किया है।” दान-व्रतादि, राजसूय-अश्वमेध यज्ञादिकी पापनाशक शक्तिका जो वर्णन इस श्लोकमें किया गया है, उससे समझा जा सकता है कि ये सभी अनुष्ठान पापोंके प्रायश्चितके लिये ही हैं। किन्तु इन समस्त कर्मकाण्ड-विहित प्रायश्चित करनेके बाद अनुष्ठानकारीको पापोंमें पुनः लिप्त होना देखा जाता है। इसलिये इन सब अनुष्ठानोंसे पाप करनेकी मूल वृत्तिका नाश नहीं होता। किन्तु शुद्ध हरिनामकी बात तो दूर, नामाभाससे ही समस्त पापोंका समूल नाश हो जाता है और पाप करनेके वृत्ति सदाके लिये दूर हो जाती है, अजामिलका चरित्र ही इसका प्रमाण तीसरा अध्याय | १३३