श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/७८-८२ है। किन्तु नामका यही एकमात्र फल नहीं है, एक शुद्ध श्रीकृष्णनामसे श्रीकृष्णप्रेम और श्रीकृष्णसेवा तक प्राप्त होते हैं, जो कोटि-कोटि अश्वमेध यज्ञोंके द्वारा भी सम्भव नहीं है॥७८॥ 'भागवतसन्दर्भ'-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे। ए श्लोक जीवगोसाञि करियाछे व्याख्याने॥७९॥ अनुवाद-जीवगोस्वामी पादने अपना स्वकृत ग्रन्थ 'भागवतसन्दर्भ' के मङ्गलाचरणमें निम्नलिखित श्लोकके द्वारा व्याख्या की है॥७९॥ तत्त्वसन्दर्भ (२)- अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं दर्शिताङ्गादिवैभवम्। कलौ सङ्कीर्त्तनाद्यैः स्म कृष्णचैतन्यमाश्रिताः॥८०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अङ्ग-उपाङ्गादि वैभवके द्वारा लक्षित भीतरमें साक्षात् श्रीकृष्ण और बाहर श्रीगौरस्वरूप श्रीकृष्णचैतन्यका कलियुगमें सङ्कीर्तनादि अङ्गोंके द्वारा हम आश्रय ग्रहण करते हैं॥८०॥ अनुभाष्य-श्रीजीवगोस्वामीने 'कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं' श्लोकको 'भागवत-सन्दर्भ' (षट्सन्दर्भ) के मङ्गलाचरणमें लिखा है। इसके अनुरूप उनके द्वारा रचित श्लोक-'अन्तःकृष्णं बहिर्गौरम्'-मङ्गलाचरणका दूसरा श्लोक है और यह भागवतमें वर्णित करभाजनके श्लोककी व्याख्यामात्र है। षट्सन्दर्भकी अनुव्याख्या 'सर्वसंवादिनी' ग्रन्थके प्रारम्भमें इसका तात्पर्य वर्णित हुआ है। अन्तःकृष्णं (अन्तर्मध्ये चित्ताभ्यन्तरे कृष्णो यस्य तं, राधा हृदयभावेन आवृतकृष्णहृद्गत-नागरभावं) बहिर्गौरं (देहकान्तिकिरणैः पीतवर्णविग्रहं) दर्शिताङ्गादिवैभवं (दर्शितं प्रकटितं अङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदवैभवं येन तं) कृष्णचैतन्यं कलौ सङ्कीर्तनाद्यैः (नामसङ्कीर्तनयज्ञाद्यैः) [वयम्] आश्रिताः स्म। श्लोक-भावानुवाद-वे जो चित्तमें भीतरसे श्रीकृष्ण हैं और श्रीकृष्णके हृदयगत-नागरभाव अभी राधाजीके हृदयके भावोंसे आवृत हैं, बाहरसे देहकान्तिकी किरणोंसे पीतवर्ण विग्रहवाले हैं, जो अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षदादि वैभवको प्रकट कर रहे हैं, उन श्रीकृष्णचैतन्यके कलियुगमें नामसङ्कीर्तन यज्ञादिके द्वारा हम आश्रित होते हैं॥८०॥ उपपुराणेह शुनि श्रीकृष्णवचन। कृपा करि व्यास प्रति करियाछेन कथन॥८१॥ अनुवाद-उपपुराणोंमें भी श्रीकृष्णका यह वचन सुना जाता है, जो उन्होंने कृपा करके व्यासजीको कहा है॥८१॥ उपपुराण- अहमेव क्वचिद् ब्रह्मन् संन्यासाश्रममाश्रितः। हरिभक्तिं ग्राहयामि कलौ पापहतान्नरान्॥८२॥ १३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत