भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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३/८२-८४ ] अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे ब्रह्मन् ! किसी विशेष कलियुगमें मैं संन्यासाश्रमको ग्रहणकर पापोंसे रहित मनुष्योंको हरिभक्ति प्रदान करूँगा॥८२॥ अनुभाष्य-किसी उपपुराणमें यह श्लोक मिलता है- हे ब्रह्मन्, अहं (भगवान्) एव क्वचित् कलौ (वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंश-चतुर्युगीय-कलियुगे प्रथम- सन्ध्यायां) संन्यासाश्रमं (तुर्याश्रमं) आश्रितः सन् (अवलम्ब्य) पापहतान् नरान् हरिभक्तिं ग्राहयामि (दास्यामि)। श्लोक-भावानुवाद-हे ब्रह्मन् ! मैं स्वयं-भगवान् कृष्ण ही किसी कलियुग [वैवस्वत मन्वन्तरके अट्ठाइसवें कलियुगकी प्रथम संध्यामें] चतुर्थ आश्रम संन्यासका अवलम्बन करके निष्पाप मनुष्योंको हरिभक्ति दूँगा॥८२॥ गौरसुन्दरकी स्वयं भगवत्ता-विषयमें शब्दप्रमाण :- भागवत, भारतशास्त्र, आगम पुराण। चैतन्य-कृष्ण-अवतार प्रकट प्रमाण ॥ ८३ ॥ अनुवाद-श्रीमद्भागवत, महाभारत, वेदों और पुराणोंमें श्रीकृष्णचैतन्य अवतारके स्पष्ट प्रमाण हैं॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भागवतमें “कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं”, “आसन वर्णास्त्रयो”, “छन्न कलौ” आदि वाक्योंसे; महाभारतमें “सम्भवामि युगे युगे”, “संन्यासकृत् शमः शान्तः” आदि वचनोंसे; “महान प्रभुर्वे पुरुषः” “यदा पश्यः पश्यति रुक्मवर्णं” आदि वेदवाक्योंसे; “मायापुरे भविष्यामि शचीसुतः” आदि आगम-अनुगत अनेक तन्त्रवाक्योंसे और “अहमेव” आदि उपपुराणोंके वाक्योंसे श्रीचैतन्यकृष्णका साक्षात् अवतार होना प्रमाणित हुआ है॥८३॥ अनुभाष्य-आदिलीला २/२२ का अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ इस विषयमें प्रत्यक्ष प्रमाण :- प्रत्यक्षे देखह नाना प्रकट प्रभाव। अलौकिक कर्म, अलौकिक अनुभाव ॥ ८४ ॥ अनुवाद-उनकी अलौकिक लीला और उनके अलौकिक अनुभावोंके द्वारा प्रकटित उनके प्रभावको प्रत्यक्ष रूपसे देखा जा सकता है॥८४॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुका लीलासार्मथ्य, उनका लोकातीत आचरण और लोकातीत महिमा-प्रभाव-वैचित्र्य स्वयं अपनी इन्द्रियोंके द्वारा प्रत्यक्ष देखनेपर ही शास्त्रोंका लक्ष्य श्रीगौर स्वयं श्रीकृष्ण हैं, यह समझा जा सकता है॥८४॥ अमृताणुकणिका-प्रश्न हो सकता है-श्रीकृष्ण कलियुगमें श्रीगौररूपमें अवतीर्ण हुए हैं, शास्त्र प्रमाणके अनुसार उसे तो स्वीकार किया जा सकता है, परन्तु नवद्वीपमें जो अवतीर्ण हुए हैं, क्या वे ही ये शास्त्रकथित श्रीकृष्णचैतन्य हैं? इसके उत्तरमें कहते हैं-नवद्वीप-विहारी श्रीकृष्णचैतन्य ही वे शास्त्रकथित कलि-अवतार हैं, इसके अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। १)-शास्त्रोंमें कलि-अवतारके जो समस्त प्रभावोंका वर्णन है, नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यका भी वैसा प्रभाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। २)-नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यने वनके पशु-पक्षी तकको तीसरा अध्याय | १३५