भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 178

[ ३/८४-८६ प्रेमदानरूप जो समस्त अलौकिक कर्म किये, वे स्वयं श्रीकृष्णके अतिरिक्त और किसीके लिये सम्भव नहीं हैं। ३)—नदियाविहारी श्रीकृष्णचैतन्यके श्रीअङ्गोंमें जो समस्त प्रेम-विकारादि दिखलायी दिये, वे किसी जीवके पक्षमें तो दूरकी बात है, अन्य किसी भगवत्-स्वरूपके पक्षमें भी सम्भव नहीं है; वास्तवमें राधा-भाव-द्युति-सुवलित श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीके भी पक्षमें सम्भव नहीं है। शास्त्रकथित लक्षणोंके साथ मिलाकर अवतारकी भगवत्ता-निर्धारण-विषयमें भक्तोंकी अनुभूति ही मुख्य प्रमाण है। भक्तिके प्रभावसे भक्तका चित्त गुणातीत निर्मलत्व प्राप्त करता है और भगवान्‌की कृपाशक्तिको धारण करनेकी योग्यता भी प्राप्त करता है। इस कृपाशक्तिके प्रभावसे ही भक्त भगवान्‌के रूप-गुण-लीलादिको यथार्थ अनुभव करनेमें सक्षम होता है, अन्य लोग नहीं। क्योंकि भक्तिदेवीकी कृपासे भक्तके चित्तसे सभी दोष दूर हो जाते हैं और वह दिव्यज्ञान लाभ करता है। (आदि २/८६)—“भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। आर्ष-विज्ञवाक्ये नाहि दोष एइसब।”॥८४॥ अधोक्षज-तत्त्व भोगनेत्रोंके द्वारा नहीं देखे जा सकते :— देखिया ना देखे यत अभक्तेर गण। उलूके ना देखे येन सूर्येर किरण॥८५॥ अनुवाद—जैसे उल्लू सूर्यको ना देख पानेके कारण उसके अस्तित्वको नकार देता है, वैसे अभक्त लोग भी इस लीलावैचित्र्यको देखकर भी अनदेखा करते हैं॥८५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘उलूक’—सूर्यके प्रकाशमें देखनेमें असमर्थ उल्लू। सूर्यके किरणोंको देखनेमें सक्षम ना होनेके कारण वह सूर्यके अस्तित्वको स्वीकार नहीं कर पाता है॥८५॥ अमृताणुकणिका—दिनके समय उल्लू जैसे वृक्षके छिद्रमें रहकर उसके बाहर सूर्यकिरणको नहीं देखता और अपनी आँख बन्दकर भीतर ही रहता है, वैसे ही जो अभक्त हैं, संसार-आसक्तिवशतः संसारके छिद्रमें ही आबद्ध रहकर वे भी विषयोंसे अतीत श्रीभगवत्-अनुभव लाभ नहीं कर पाते; संसार-सुखसे मुग्ध होकर भगवत्-अनुभव लाभ करनेकी चेष्टा भी नहीं करते। उल्लूको जैसे अन्धकारमें रहना अच्छा लगता है, वैसे ही अभक्त लोगोंको भी अज्ञान-अन्धकारमें ही रहना अच्छा लगता है॥८५॥ आलवन्दारु यामुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (१५)— त्वां शीलरूपचरितैः परमप्रकृष्टैः सत्त्वेन सात्त्विकतया प्रबलैश्च शास्त्रैः। प्रख्यातदैवपरमार्थविदां मतैश्च नैवासुरप्रकृतयः प्रभवन्ति बोद्धुम्॥८६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! आपके अवतार-तत्त्वज्ञ परमार्थको जाननेवाले व्यासादि भक्त प्रबल सात्त्विक शास्त्रोंके द्वारा (और) आपके शील-स्वभाव, रूप, चरित्र एवं परम सात्त्विकभावको लक्ष्य करके आपको जान पाते हैं, किन्तु रजो और तमोगुण प्रधान आसुरिक प्रकृतिवाले जीव आपको पहचाननेमें समर्थ नहीं हो पाते॥८६॥ १३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत