श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/८६-८९ ] अनुभाष्य—श्रीरामानुजाचार्यके गुरु और परमगुरु श्रीयामुनाचार्य, जिनका दूसरा नाम आलवन्दारु है, उन्होंने अपने द्वारा रचित स्तोत्ररत्नके पन्द्रहवें और अठारहवें, दो श्लोकोंमें भगवान्की महिमा और ऐश्वर्यका वर्णन किया है— हे भगवन्! परमप्रकृष्टैः (सर्वोत्कृष्टतमैः) शीलरूपचरितैः (शीलं रूपाणि च चरितानि च तैः) सत्त्वेन (अलौकिक प्रभावेण) सात्त्विकतया (सत्त्वप्रधानतया) प्रबलैः शास्त्रैः प्रख्यातदैवपरमार्थविदां (प्रसिद्धं दैवं परमार्थञ्च विदन्ति ये तेषां) मतैश्च आसुर-प्रकृतयः (दुर्बुत्ताः भक्तद्रोहिनः) त्वां बोद्धुं (ज्ञातुं) न प्रभवन्ति (समर्थाः भवन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८६॥ किन्तु भक्तके प्रेमसे अजित भगवान्को भी जीता जाता है, वैकुण्ठको मापा जा सकता है :— आपना लुकाइते कृष्ण नाना यत्न करे। तथापि ताँहार भक्त जानये ताँहारे॥८७॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीकृष्ण अपने आपको छिपानेके लिये बहुत प्रयत्न करते हैं, तथापि उनके भक्त उनको पहचान लेते हैं॥८७॥ आलवन्दारु यामुनाचार्य-कृत स्तोत्ररत्न (१८)— उल्लङ्घितत्रिविधसीमसमातिशायि सम्भावनं तव परिव्रढ़िम-स्वभावम्। मायाबलेन भवतापि निगुह्यमानं पश्यन्ति केचिदनिशं त्वदनन्यभावाः॥८८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे भगवन्! देश, काल और चिन्तन—इन तीन सीमाओंके द्वारा सभी वस्तुएँ आबद्ध हैं, किन्तु आपका गूढ़स्वभाव असमोर्ध्व और अद्वितीय होनेके कारण उक्त तीन प्रकारकी सीमाओंका अतिक्रमणकर वर्तमान है। आप अपनी मायाके द्वारा इस स्वभावको आच्छादित करते हैं, किन्तु आपके अनन्यभक्त सदा आपका दर्शन करनेमें सक्षम होते हैं॥८८॥ अनुभाष्य—उल्लङ्घित-त्रिविध-सीम-समातिशायि-सम्भावनं (उल्लङ्घिता अतिक्रान्ता त्रिविधानां देशकालद्रव्यानां सीमा समा अतिशायिनी च सम्भावना च येन तं) भवता मायाबलेन (स्वयोगमायासामर्थ्येन) निगुह्यमानं अपि तव परिब्रढ़िम-स्वभावं (परिब्रढ़िम्नः प्रभुत्वस्य स्वभावं स्वरूपं) केचित् त्वदनन्यभावाः (त्वयि अनन्यभावाः एकान्तभक्ताः) अनिशं (निरन्तरं) पश्यन्ति। श्लोक-भावानुवाद—जिनके समान अथवा अधिक होनेकी किसीकी कोई सम्भावना नहीं है, वे आप देश-काल-द्रव्य इन तीन प्रकारकी सीमाओंका उल्लङ्घन करके अपनी योगमायाके बलसे अपनेको गोपनीय रखनेका प्रयास करते हैं, तो भी आपके गूढ़ स्वभाव या स्वरूपको आपके अनन्य भक्त निरन्तर देखते हैं॥८८॥ अधोक्षज—भक्तिके द्वारा प्राप्य, इन्द्रियोंके ज्ञानसे अतीत :— असुरस्वभाव कृष्णे कभु नाहि जाने। लुकाइते नारे कृष्ण भक्तजन-स्थाने॥८९॥ तीसरा अध्याय | १३७