श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ३/८९-९४ अनुवाद-असुर स्वभाववाले व्यक्ति कभी भी श्रीकृष्णको जान नहीं पाते, किन्तु श्रीकृष्ण भक्तोंसे स्वयंको छिपा नहीं पाते हैं॥८९॥ पद्मपुराण- द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च। विष्णुभक्तः स्मृतो दैव आसुरस्तद्विपर्ययः॥९०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इस जगत्में 'दैव' और 'असुर' भेदसे दो प्रकारके लोगोंकी सृष्टि हुई है। विष्णुभक्त 'दैव' कहलाते हैं और जो विष्णुभक्त नहीं हैं, वे लोग उनके विपरीत अर्थात् आसुरी स्वभावके हैं॥९०॥ अनुभाष्य-अस्मिन् लोके दैवः आसुरश्च एव द्वौ भूतसर्गौ (प्राणीसृष्टी) - विष्णुभक्तः (हरिजनः) दैवः स्मृतः, तद्विपर्ययः (मायाभोगनिरतः) आसुरः (प्रकृतिजनः) एव। श्लोक-भावानुवाद-इस जगत्में देव और असुर, इन दो प्रकारके प्राणियोंकी सृष्टि हुई है। हरिका भजन करनेवाले हरिके जन देव कहलाते हैं, (इसके विपरीत) मायाके भोगोंमें रत असुर ही हैं॥९०॥ भक्तावतार कहनेसे ही आचार्यका गौरावतारण-सामर्थ्य :- आचार्य गोसाञि प्रभुर भक्त-अवतार। कृष्ण-अवतार हेतु याँहार हुङ्कार॥९१॥ स्वयंरूपावतारके पूर्व गुरुवर्गरूप सेवकगणोंका प्राकट्य :- कृष्ण यदि पृथिवीते करेन अवतार। प्रथमे करेन गुरुवर्गेर सञ्चार॥९२॥ पिता माता गुरु आदि यत मान्यगण। प्रथमे करेन सबार पृथिवीते जनम॥९३॥ माधव-ईश्वर-पुरी, शची, जगन्नाथ। अद्वैत आचार्य प्रकट हैला सेइ साथ॥९४॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य भगवान्के भक्त-अवतार हैं और उनकी हुङ्कारके कारण ही श्रीकृष्णने अवतार ग्रहण किया। जब श्रीकृष्ण इस पृथ्वीपर अवतरित होते हैं, तो वे पहले अपने गुरुवर्गोंको प्रकटित कराते हैं। पिता-माता तथा गुरु आदि जितने भी गुरुजन हैं, ये सब पहले पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करते हैं। श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीईश्वरपुरी, शचीमाता और जगन्नाथ मिश्र-ये सभी श्रीअद्वैताचार्यके साथ ही प्रकट हुए॥९१-९४॥ अमृतानुकणिका-श्रीअद्वैताचार्य जीव-तत्त्व नहीं हैं, कारणोदशायी पुरुषके एक स्वरूप होनेके कारण वे ईश्वर-तत्त्व हैं। वे जगत्में अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये वे अवतार हैं। किन्तु भगवदावतार होनेपर भी उन्होंने ईश्वर-भावको नहीं प्रकट किया, अपितु सदा भक्तभावको ही प्रकट किया, भक्तके समान आचरण किया और उनकी अनुभूति भी वैसी ही थी। इसलिये उनको महाप्रभुका भक्तावतार कहा गया है। १३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत