श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 181, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें३/९१-९६ ] भगवान् दो प्रकारसे अवतीर्ण होते हैं-सद्वारक और अद्वारक। जब भगवान् मनुष्यके समान पिता-माताके द्वारा आविर्भूत होते हैं, तब इस प्रकारके अवतारको सद्वारक कहा जाता है, पिता-माता उन अवतारके द्वार स्वरूप हैं। श्रीराम-श्रीकृष्ण-श्रीवामनादि सद्वारक अवतार हैं। पिता-माताकी अपेक्षा नहीं रखकर भगवान् जब स्वयं अवतीर्ण होते हैं, तब उन्हें अद्वारक कहा जाता हैं-मत्स्य, कूर्म, नृसिंहादि अद्वारक अवतार हैं। भगवान् जब नरलीला प्रकट करते हैं, तब पिता-माताके योगसे मनुष्यके समान जन्मलीला प्रकट करते हैं। अवश्य ही प्रकटलीलामें भगवान्के जो माता-पिता होते हैं, वे भी साधारण मनुष्य नहीं होते, वे भगवान्की सन्धिनी-शक्तिका परिणाम हैं, अनादिकालसे ही वे उनके माता-पितारूपमें विराजमान हैं। अप्रकटलीलामें उनका मातृत्व और पितृत्व गर्भधारण अथवा जन्मदानके लिये नहीं है, वहाँ भगवान्का जन्म ही नहीं है, उनके मातृत्व और पितृत्वका अभिमान मात्र उनके चित्तमें अनादिकालसे विराजित है। इसलिये भगवान् पहले अनादिसिद्ध पिता-माताको जगत्में अवतीर्ण कराते हैं और बादमें उनके चित्तमें प्रविष्ट होकर जन्मलीला प्रकट करते हैं, प्रकटलीलामें भी भगवान्का साधारण मनुष्यके समान शौक्र जन्म नहीं होता। श्रीमन्महाप्रभु भी सद्वारक अवतार हैं और पिता-माताके योगसे अवतीर्ण होकर उन्होंने नरलीला प्रकट की। प्रकटलीलामें भी उनका श्रीविग्रह प्राकृत अस्थि-मांस-मज्जाके द्वारा गठित नहीं होता, वह नित्य चिन्मय कलेवर ही होता है॥९१-९४॥ अवतरणसे पूर्व तात्कालिक समाजकी अवस्था :- प्रकटिया देखे आचार्य सकल संसार। कृष्णभक्तिगन्धहीन विषय-व्यवहार ॥ ९५ ॥ केह पापे, केह पुण्ये करे विषयभोग। भक्तिगन्ध नाहि, याते याय भवरोग ॥ ९६ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने पहले प्रकट होकर देखा कि सारा संसार श्रीकृष्ण-भक्तिसे शून्य है और सभी लोग विषय भोगोंमें रत हैं। उस समय कोई पाप कार्योंके द्वारा और तो कोई पुण्य कार्योंके द्वारा विषयोंको भोग कर रहे थे। किन्तु जिसके द्वारा यह भवरोग दूर होता है, उस श्रीकृष्णभक्तिकी गन्धतक भी उनमें नहीं थी ॥ ९५-९६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—साक्षात् भगवान्ने अवतीर्ण होनेसे पहले ही 'गुरुवर्गेर सञ्चार' अर्थात् पृथ्वीपर गुरुवर्गोंको जन्म ग्रहण करवाया। अन्यान्य गुरुवर्गोंके साथ श्रीमाधवेन्द्रपुरी, श्रीईश्वरपुरी, श्रीशची, श्रीजगन्नाथ, श्रीअद्वैताचार्य प्रकट हुए। श्रीअद्वैताचार्य प्रभुने प्रकट होकर देखा कि समस्त संसार ही पाप-पुण्य कार्योंमें लगा है और उनमें श्रीकृष्णभक्ति है ही नहीं। सभी जीव विषयभोग कर रहे हैं, किन्तु जिससे भवरोग दूर होता है, उस श्रीकृष्णभक्तिको वे अपने कार्योंके साथ नहीं कर रहे हैं॥ ९२-९६॥ अमृतानुकणिका—अच्युत भक्तिरहित सत्कर्म हो, अथवा नैष्कर्म्य ही हो, ज्ञान ही हो, अथवा अज्ञान ही हो; नीति ही हो अथवा दुर्नीति ही हो, कोई भी संसाररूपी दावाग्निके हाथोंसे जीवका उद्धार नहीं कर सकते। तथाकथित परोपकार अथवा महाराज भरतके समान असहाय, निरीह मृगशावकके प्रति सात्त्विक दयारूपी सत्कर्म हो, किन्तु वह संसारसे मुक्त नहीं कर सकता। तीसरा अध्याय | १३९