श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/९५-१०० नैष्कर्म्यवादी जीवन्मुक्त मुनि-ऋषियोंकी संसार-वासना उत्पत्तिकी कथा सुनी जाती है। यथा (वासनाभाष्यधृत श्रीभगवत्-परिशिष्ट-वचन)- “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्बन्धनं यान्ति कर्मभिः। यद्यचिन्त्यमहाशक्तौ भगवत्यपराधिनः ॥” अर्थात् “अचिन्त्य महाशक्तिसम्पन्न श्रीभगवान्के निकट अपराध करनेपर अर्थात् उनमें नित्य भक्ति परित्याग करनेपर जीवन्मुक्त व्यक्ति भी अपने कर्मोंके द्वारा पुनः बन्धनको प्राप्त करते हैं।” ज्ञानी, योगीगण भी भगवद्भक्तिरहित होनेपर संसारको जय नहीं कर पाते, इस बातके सैकड़ों प्रमाण शास्त्रोंमें पाये जाते हैं। यथा भागवत (१०/२/३२)- “येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन- स्त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः। आरुह्य कृच्छ्रे पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः ॥” अर्थात् “यदि कोई कहे कि भगवत्-चरणाश्रयकी क्या आवश्यकता है? शुष्कज्ञानके द्वारा ही तो भव-सागरको पार किया जा सकता है! इसके उत्तरमें कहते हैं-हे कमललोचन! आपके भक्तोंके अतिरिक्त अन्य जो व्यक्ति स्वयंको 'मुक्त' मानकर अभिमान करते हैं, आपके प्रति उनकी प्रीति नहीं रहनेके कारण वे मलिनचित्तवाले हैं। वे व्यक्ति अतिशय कष्ट उठाकर किसी प्रकार मोक्षके निकट तक पहुँचनेपर भी आपके चरणकमलोंका अनादर करनेके कारण वहाँसे गिर जाते हैं।” तात्पर्य यह है कि ज्ञानी लोग अपने आपको बहुत कष्टसाध्य तपस्याके प्रभावसे जीवन्मुक्त माननेपर भी और अति उन्नत पदवीपर आरूढ़ होनेपर भी 'मैं ही ब्रह्म हूँ'-ऐसा विचार करके भगवान्की भक्ति परित्याग करके अधःपतित हो जाते हैं। भागवत (४/२३/१२)- “तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रमत्तो यावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात्॥” अर्थात् “मुमुक्षु व्यक्ति जब तक गदाग्रज श्रीहरिकी कथामें अनुराग प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक वे केवल योगादि साधनोंके द्वारा दूसरे विषयोंसे अनासक्त नहीं हो सकते॥” ९५-९६॥ आचार्यकी जीवोंके लिये दया-विषयक चिन्ता :- लोकगति देखि' आचार्य करुण-हृदय। विचार करेन, लोकेर कैछे हित हय॥९७॥ आपनि श्रीकृष्ण यदि करेन अवतार। आपने आचरि' भक्ति करेन प्रचार॥९८॥ नाम बिनु कलिकाले धर्म नाहि आर। कलिकाले कैछे हवे कृष्ण अवतार॥९९॥ शुद्धभावे करिब कृष्णेर आराधन। निरन्तर सदैन्ये करिब निवेदन॥१००॥ १४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत