श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/९७-१०३ विष्णुके द्वारा ही विष्णुका अवतरण; इसलिये उन्हें अद्वैत कहा है :- आनिया कृष्णेरे करों कीर्त्तन सञ्चार। तबे से 'अद्वैत'-नाम सफल आमार॥१०१॥ कृष्ण वश करिबेन कोन् आराधने। विचारिते एई श्लोक आइल ताँर मने॥१०२॥ अनुवाद—लोगोंकी इस प्रकार गतिविधियोंको देखकर श्रीअद्वैताचार्य प्रभुका हृदय करुणासे भर गया और किस प्रकार इन लोगोंका कल्याण हो, यह विचार करने लगे। यदि श्रीकृष्ण स्वयं अवतार ग्रहण करें, तो वे स्वयं आचरण करके इस भक्तिका प्रचार कर सकते हैं। कलिकालमें हरिनामके अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं है, किन्तु कलिकालमें श्रीकृष्णका अवतार कैसे होगा? इसलिये मैं श्रीकृष्णकी शुद्धभावसे आराधना करूँगा और दीनतापूर्वक निरन्तर उनसे अवतीर्ण होनेका निवेदन करूँगा। यदि मैं श्रीकृष्णको अवतीर्ण कराकर जगत्में श्रीकृष्णकीर्त्तनका सञ्चार कर पाऊँगा, तभी मेरा 'अद्वैत'-नाम सफल होगा। कौनसी आराधनासे श्रीकृष्णको वशीभूत किया जा सकता है, इसपर विचार करते-करते उनके मनमें यह श्लोक आया॥९७-१०२॥ भक्तके आत्मनिवेदनसे ही अजितकी पराजय :- विष्णुधर्म-वचन और गौतमीय-तन्त्र-वाक्य- तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः ॥१०३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तुलसीदल और चुल्लूमात्र जल उनको भक्तिपूर्वक अर्पण करनेसे श्रीकृष्ण अपने भक्तवात्सल्य गुणके कारण स्वयंको भक्तके हाथोंमें बेच देते हैं। किसी-किसी संस्करणमें ये दो श्लोक भी देखे जाते हैं,- “साग्रजं तुलसीपत्रं द्विदलं क्षुद्रमेव च। मञ्जरी सा तु विख्याता प्रशस्ता कृष्णपूजने ॥” अर्थात् “डण्ठलके साथ जुड़े हुए दो छोटे ही तुलसीके पत्र तथा उनमें जुड़ी हुई प्रसिद्ध मञ्जरी श्रीकृष्ण पूजनमें प्रशस्त (महिमायुक्त) माने गये हैं।” यथा राधा प्रिया विष्णोस्तथा च मञ्जरी हरेः। तस्माद्दद्यात् प्रयत्नेन चन्दनेन तु मिश्रिताम्॥” अर्थात् “जैसे राधाजी श्रीकृष्णकी प्रिया हैं, उसी प्रकार मञ्जरी भी उनकी प्रिया हैं, अतः प्रयत्नपूर्वक चन्दनसे मिश्रित मञ्जरी उन्हें प्रदान करनी चाहिये॥” १०३॥ अनुभाष्य-भक्तवत्सलः (निजजनरतः भगवान्) तुलसीदलमात्रेण (चन्दन-मन्त्रादिकं बिना केवलतुलसीपत्रेण) जलस्य चुलुकेन (गण्डूषेण) वा (च) भक्तेभ्यः आत्मानं विक्रीणीते (तदायत्तं करोति)। श्लोक-भावानुवाद-अपने भक्तोंके ध्यानमें रत भगवान्, चन्दन और मन्त्रादिके बिना भी केवल तुलसीपत्र और चुल्लूभर जलके विनिमयमें स्वयंको भक्तोंके आधीन कर देते हैं॥१०३॥ तीसरा अध्याय | १४१