श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३/१०४-१०७ एइ श्लोकार्थ आचार्य करेन विचारण। कृष्णके तुलसीजल देय येइ जन ॥ १०४॥ तार ऋण शोधिते कृष्ण करेन चिन्तन। 'जल-तुलसीर सम किछु घरे नाहि धन' ॥ १०५॥ तबे आत्मा बेचि' करे ऋणरे शोधन। एत भावि' आचार्य करेन आराधन ॥ १०६॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य इस श्लोकके अर्थपर विचार करने लगे। यदि कोई श्रीकृष्णको तुलसी और जल देता है, तो श्रीकृष्ण उस ऋणका शोधन करनेके लिये चिन्ता करने लगते हैं कि जल और तुलसीपत्रके समान तो मेरे पास कुछ भी धन नहीं है। तब वे अपने-आपको बेचकर अर्थात् उस भक्तके वशीभूत होकर उस ऋणसे मुक्त होते हैं। ऐसा विचार करके श्रीअद्वैताचार्य श्रीकृष्णकी आराधना करने लगे॥१०४-१०६॥ गङ्गाजले तुलसीमञ्जरी अनुक्षण। कृष्णपादपद्म भावि' करे समर्पण ॥ १०७॥ अनुवाद-वे श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते हुए गङ्गाजलके साथ तुलसीमञ्जरी अनुक्षण अर्पण करने लगे॥१०७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो भक्त श्रीकृष्णको जल-तुलसी देते हैं, श्रीकृष्ण उनका ऋण चुका ना पानेके कारण स्वयंको उसके बदलेमें देकर ऋणका शोधन करते हैं। इसलिये श्रीअद्वैताचार्य श्रीकृष्णके साक्षात् स्वरूपको अवतीर्ण करानेके लिये गङ्गाजल तुलसीमञ्जरीके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें अर्पण करने लगे॥१०६-१०७॥ अमृताणुकणिका-'तुलसीमञ्जरी'-तुलसीके कोमल बीज-मुकुलको मञ्जरी कहते हैं। श्रीकृष्णकी पूजाके लिये मञ्जरीके दोनों ओर दो कोमल पत्तियोंके साथ मञ्जरीका चयन करना चाहिये। महाप्रभुका श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको गोवर्धन-शिलार्चन निर्देश (अन्त्य ६/२९७)- “दुइदिके दुइपत्र-मध्ये कोमल मञ्जरी। एइमत अष्टमञ्जरी दिबे श्रद्धा करि' ॥” अर्थात् “दोनों ओर दो पत्तियोंके सहित मञ्जरीका चयन करना और इस प्रकार प्रतिदिन श्रद्धाके साथ आठ मञ्जरियोंसे श्रीगोवर्धन शिलाका पूजन करना।" इससे जाना जा सकता है कि श्रीकृष्णपूजामें तुलसी मञ्जरीका अत्यन्त महत्व है। शास्त्रोंमें अन्यान्य स्थानोंपर भी तुलसी मञ्जरीका महत्व वर्णित है। द्वारका माहात्म्यमें मार्कण्डेय-इन्द्रद्युम्न संवाद (हःभःविः ७/२७९)- “यथा लक्ष्मीः प्रिया विष्णोस्तुलसी च ततोऽधिका।” अर्थात् "लक्ष्मी जिस प्रकार श्रीविष्णुकी प्रिया हैं, तुलसी उससे भी अधिक प्रिया हैं।" कृष्णपादपद्म भावि'- श्रीकृष्णके श्रीचरणोंका चिन्तन करते हुए। श्रीकृष्णके श्रीचरणोंमें तुलसी प्रदान करनेके समय इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये, जैसे श्रीकृष्णचरणके सान्निध्यमें उपस्थित हैं और साक्षात् भावसे उनके श्रीचरणोंमें तुलसी अर्पण कर रहे हैं। अन्यान्य उपचार अर्पणके समय भी इसी प्रकार चिन्ता करनी चाहिये। साक्षात्-भजनमें प्रवृत्तियुक्त भजनको 'सासङ्ग-भजन' १४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत