भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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३/१०७-११० ] कहते हैं और साक्षात्-भजनमें प्रवृत्तिहीन भजनको 'अनासङ्ग-साधन' कहते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु (पूर्व १/२०)—“साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या सुचिरादपि।” अर्थात् अनासङ्ग साधनोंको चिरकालतक करते रहनेपर भी हरिभक्ति प्राप्त नहीं होती। (आदि ८/१६)—“बहु जन्म करे यदि श्रवण, कीर्त्तन। तबु त' ना पाय कृष्णपदे प्रेमधन॥” अर्थात् “[अपराधके साथ] अनेक जन्मों तक भी यदि श्रवण, कीर्त्तनादि नवधा भक्तिके अङ्गोंका अनुष्ठान किया जाय, तो भी [नामके वास्तविक फल] श्रीकृष्ण-प्रेमधनकी प्राप्ति नहीं होगी॥”१०७॥ कृष्णेर आह्वान करेन करिया हुङ्कार। एमते कृष्णेरे कराइल अवतार ॥ १०८॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य हुङ्कार करके श्रीकृष्णका आह्वान करने लगे। इस प्रकार उन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाया॥१०८॥ श्रीकृष्णप्रेम-वितरणरूप भक्तकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये ही स्वयं-श्रीकृष्णकी श्रीगौरलीला :— चैतन्येर अवतारे एइ मुख्य हेतु। भक्तेर इच्छाय अवतारे धर्मसेतु ॥ १०९॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-चैतन्य अवतारका यह मुख्य कारण है। भक्तकी इच्छासे धर्मसेतु अर्थात् धर्मरक्षक श्रीभगवान् अवतार ग्रहण करते हैं॥१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्मके सेतुस्वरूप श्रीकृष्ण भक्तकी इच्छासे अवतीर्ण होते हैं। परमभक्त श्रीअद्वैताचार्यकी प्रार्थनासे श्रीचैतन्य महाप्रभुका अवतार हुआ॥१०९॥ अमृताणुकणिका—'धर्मसेतु'—सेतुका अर्थ है मेड़ अर्थात् खेतके चारों ओर मिट्टीका बनाया हुआ घेरा। खेतके चारों ओर मेड़ रहनेसे खेतकी उर्वरता-शक्ति आदिकी रक्षा होती है, इसलिये मेड़को क्षेत्ररक्षक कहते हैं। इस प्रकार सेतुका अर्थ रक्षक भी होता है, इसलिये धर्मसेतुका अर्थ हुआ धर्मरक्षक। सेतु जिस प्रकार बाहरके असमय जलादिसे खेतकी फसलकी रक्षा करता है और समयपर खेतमें भरे जलको फसलके लिये उसमें स्थिर रखकर फसलकी वृद्धिका आनुकूल्य करता है, उसी प्रकार जो शास्त्रनिषिद्ध आचरणको प्रवेश नहीं करने दें और शास्त्रविहित आचरणादिको जीवोंके मध्य प्रतिष्ठित करके धर्मकी रक्षा करें, वे ही धर्मसेतु अथवा धर्मरक्षक हैं। धर्मरक्षक भगवान् भक्तकी इच्छाको उपलक्ष्य करके धर्मरक्षार्थ जगत्में अवतीर्ण होते हैं॥१०९॥ श्रीमद्भागवत (३/९/११)— त्वं भक्तियोगपरिभावित-हृत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम्। यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ ११०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ब्रह्माजी बोले,—“हे नाथ! आप भक्तोंके श्रवणपथ और नयनपथमें सदा विहार करते हैं। भक्तियोगके द्वारा पवित्र हुए उनके हृदयरूपी कमलमें आप सदा अवस्थान करते तीसरा अध्याय | १४३

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