भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

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हैं। हे उरुगाय! भक्तगण अपने हृदयमें आपके जिस-जिस नित्यस्वरूपकी भावना करते हैं, उनके प्रति अनुग्रह करके आप उस-उस स्वरूपको प्रकट करते हैं॥”११०॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये तृतीय परिच्छेदः। तृतीय अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—ब्रह्माजी तपस्याके द्वारा भगवान्‌के दर्शन और कृपा प्राप्त करके सृष्टि करनेकी इच्छासे स्तव कर रहे हैं— ननु हे नाथ (हे प्रभो) श्रुतेक्षितपथः (श्रुतं शास्त्रसिद्धान्त-श्रवणं तेन ईक्षितः दृष्टः पन्थाः यस्य सः) त्वं पुंसां भक्तियोग परिभावित-हृत्सरोजे (भक्तियोगेन प्रेम्णा परिभावितं योग्यतां आपादितं यत् हृत्सरोजं तस्मिन्) आस्से (तिष्ठसि)। ते धिया यद् यद् विभावयन्ति (चिन्तयन्ति), हे उरुगाय, (उरुधा एव गीयस इति उरुक्रम) सदनुग्रहाय (सतां भक्तानां अनुग्रहाय) तत् तत् वपुः (शरीरं) प्रणयसे (प्रकर्षेण तत्समीपे नयसि प्रकटयसि)। श्लोक-भावानुवाद—(निःसन्देह) हे प्रभो! शास्त्रसिद्धान्तोंका श्रवण और उनके दिखलाये पथपर जिनकी दृष्टि है, उनके प्रेमसे विभावित हृदयकमलमें आप विराजमान होते हैं। उनकी बुद्धि जिस-जिस रूपका चिन्तन करती है, हे उरुगाय! भक्तोंपर अनुग्रह करके उस-उस शरीरको प्रकृष्टरूपसे आप उनके समीप प्रकट करते हैं। [उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिनका स्तुतिगान किया जाता है, उन्हें उरुगाय अथवा उरुक्रम कहते हैं] ॥११०॥ इति अनुभाष्ये तृतीय परिच्छेदः। तृतीय अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृताणुकणिका—‘श्रुतेक्षित-पथ’—शास्त्रोंमें नाना प्रकारके साधन-पन्थोंका उल्लेख है; जो जिस भावसे भगवान्‌को पानेकी इच्छा करता है, वह शास्त्रोंसे उसके अनुकूल साधन-पन्थको ग्रहण करेगा। इस वाक्यका भाव यह है कि शास्त्रोंसे बहिर्भूत किसी भी मनोकल्पित साधनसे भगवत्प्राप्ति सम्भव नहीं है। भक्तिरसामृतसिन्धु-धृत-ब्रह्मयामल वचन (पूर्व २/१०१)— “श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते॥” अर्थात् “श्रुति, स्मृति, पुराण तथा पञ्चरात्रादि शास्त्रोंमें वर्णित विधिकी उपेक्षा करके ऐकान्तिक हरिभक्ति केवल उत्पातका ही कारण बनती है।” भक्तियोग-परिभावित-हृत्सरोज—भक्तियोगके द्वारा परिभावित हुआ हृदयरूप कमल अर्थात् भक्तियोगका अनुष्ठान करके साधकका हृदय कमलके समान निर्मल, कोमल और पवित्र हो जाय। साधनभक्तिका अनुष्ठान करते हुए अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, रति आदि सोपानोंको पार करते हुए चित्त जब परिभावित हो अर्थात् शुद्धसत्त्वके आविर्भावसे उज्ज्वलता धारण करके शुद्धसत्त्व-स्वरूप भगवान्‌के आविर्भावकी योग्यता लाभ करे, तभी उस हृदय-कमलमें श्रीभगवान् आविर्भूत होते हैं, उसके पूर्व नहीं। वे ऐसे हृदय कमलको कभी त्याग नहीं करते और सदा उसमें अवस्थान करते हैं। शास्त्रोंमें भगवान्‌के जिन-जिन रूपोंका वर्णन किया गया है, उनमेंसे भक्त निज बुद्धिके द्वारा जिन-जिन रूपोंका चिन्तन करते हैं, भक्तवत्सल भगवान् उन्हीं रूपोंको भक्तोंके समक्ष प्रकृष्ट

१४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत