श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३/११०-११३ ] रूपसे प्रकट करते हैं। भगवान् स्वतन्त्र होनेपर भी अपने भक्तोंकी वश्यताको स्वीकार करते हैं। श्रीअद्वैताचार्यकी आराधना और उनकी इच्छानुसार भगवान् जगत्में अवतीर्ण हुए, इसे प्रमाणित करनेके लिये यह श्लोक उद्धृत किया है॥११०॥ एइ श्लोकेर अर्थ संक्षेपेर सार। भक्तेर इच्छाय कृष्णेर सर्व अवतार॥१११॥ चतुर्थ श्लोकेर अर्थ हैल सुनिश्चिते। अवतीर्ण हैला गौर प्रेम प्रकाशिते॥११२॥ अनुवाद—संक्षेपमें इस श्लोकके अर्थका सार यही है कि भक्तकी इच्छासे ही श्रीकृष्णके सभी अवतार होते हैं। चौथे श्लोकका अर्थ यह सुनिश्चित हो गया है कि प्रेम प्रकाश करनेके लिये ही गौराङ्ग महाप्रभु अवतरित हुए हैं॥१११-११२॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥११३॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे आशीर्वाद-मङ्गलाचरणे चैतन्यावतार-सामान्यकारणं नाम तृतीय-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥११३॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डके आशीर्वाद-मङ्गलाचरणमें चैतन्यावतारका सामान्य कारण नामक तीसरा अध्याय समाप्त। तीसरा अध्याय | १४५