श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
३/१०७-११० ] कहते हैं और साक्षात्-भजनमें प्रवृत्तिहीन भजनको 'अनासङ्ग-साधन' कहते हैं। भक्तिरसामृतसिन्धु (पूर्व १/२०)—“साधनौघैरनासङ्गैरलभ्या सुचिरादपि।” अर्थात् अनासङ्ग साधनोंको चिरकालतक करते रहनेपर भी हरिभक्ति प्राप्त नहीं होती। (आदि ८/१६)—“बहु जन्म करे यदि श्रवण, कीर्त्तन। तबु त' ना पाय कृष्णपदे प्रेमधन॥” अर्थात् “[अपराधके साथ] अनेक जन्मों तक भी यदि श्रवण, कीर्त्तनादि नवधा भक्तिके अङ्गोंका अनुष्ठान किया जाय, तो भी [नामके वास्तविक फल] श्रीकृष्ण-प्रेमधनकी प्राप्ति नहीं होगी॥”१०७॥ कृष्णेर आह्वान करेन करिया हुङ्कार। एमते कृष्णेरे कराइल अवतार ॥ १०८॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य हुङ्कार करके श्रीकृष्णका आह्वान करने लगे। इस प्रकार उन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाया॥१०८॥ श्रीकृष्णप्रेम-वितरणरूप भक्तकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये ही स्वयं-श्रीकृष्णकी श्रीगौरलीला :— चैतन्येर अवतारे एइ मुख्य हेतु। भक्तेर इच्छाय अवतारे धर्मसेतु ॥ १०९॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-चैतन्य अवतारका यह मुख्य कारण है। भक्तकी इच्छासे धर्मसेतु अर्थात् धर्मरक्षक श्रीभगवान् अवतार ग्रहण करते हैं॥१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—धर्मके सेतुस्वरूप श्रीकृष्ण भक्तकी इच्छासे अवतीर्ण होते हैं। परमभक्त श्रीअद्वैताचार्यकी प्रार्थनासे श्रीचैतन्य महाप्रभुका अवतार हुआ॥१०९॥ अमृताणुकणिका—'धर्मसेतु'—सेतुका अर्थ है मेड़ अर्थात् खेतके चारों ओर मिट्टीका बनाया हुआ घेरा। खेतके चारों ओर मेड़ रहनेसे खेतकी उर्वरता-शक्ति आदिकी रक्षा होती है, इसलिये मेड़को क्षेत्ररक्षक कहते हैं। इस प्रकार सेतुका अर्थ रक्षक भी होता है, इसलिये धर्मसेतुका अर्थ हुआ धर्मरक्षक। सेतु जिस प्रकार बाहरके असमय जलादिसे खेतकी फसलकी रक्षा करता है और समयपर खेतमें भरे जलको फसलके लिये उसमें स्थिर रखकर फसलकी वृद्धिका आनुकूल्य करता है, उसी प्रकार जो शास्त्रनिषिद्ध आचरणको प्रवेश नहीं करने दें और शास्त्रविहित आचरणादिको जीवोंके मध्य प्रतिष्ठित करके धर्मकी रक्षा करें, वे ही धर्मसेतु अथवा धर्मरक्षक हैं। धर्मरक्षक भगवान् भक्तकी इच्छाको उपलक्ष्य करके धर्मरक्षार्थ जगत्में अवतीर्ण होते हैं॥१०९॥ श्रीमद्भागवत (३/९/११)— त्वं भक्तियोगपरिभावित-हृत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम्। यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ ११०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥११०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ब्रह्माजी बोले,—“हे नाथ! आप भक्तोंके श्रवणपथ और नयनपथमें सदा विहार करते हैं। भक्तियोगके द्वारा पवित्र हुए उनके हृदयरूपी कमलमें आप सदा अवस्थान करते तीसरा अध्याय | १४३
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हैं। हे उरुगाय! भक्तगण अपने हृदयमें आपके जिस-जिस नित्यस्वरूपकी भावना करते हैं, उनके प्रति अनुग्रह करके आप उस-उस स्वरूपको प्रकट करते हैं॥”११०॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये तृतीय परिच्छेदः। तृतीय अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—ब्रह्माजी तपस्याके द्वारा भगवान्के दर्शन और कृपा प्राप्त करके सृष्टि करनेकी इच्छासे स्तव कर रहे हैं— ननु हे नाथ (हे प्रभो) श्रुतेक्षितपथः (श्रुतं शास्त्रसिद्धान्त-श्रवणं तेन ईक्षितः दृष्टः पन्थाः यस्य सः) त्वं पुंसां भक्तियोग परिभावित-हृत्सरोजे (भक्तियोगेन प्रेम्णा परिभावितं योग्यतां आपादितं यत् हृत्सरोजं तस्मिन्) आस्से (तिष्ठसि)। ते धिया यद् यद् विभावयन्ति (चिन्तयन्ति), हे उरुगाय, (उरुधा एव गीयस इति उरुक्रम) सदनुग्रहाय (सतां भक्तानां अनुग्रहाय) तत् तत् वपुः (शरीरं) प्रणयसे (प्रकर्षेण तत्समीपे नयसि प्रकटयसि)। श्लोक-भावानुवाद—(निःसन्देह) हे प्रभो! शास्त्रसिद्धान्तोंका श्रवण और उनके दिखलाये पथपर जिनकी दृष्टि है, उनके प्रेमसे विभावित हृदयकमलमें आप विराजमान होते हैं। उनकी बुद्धि जिस-जिस रूपका चिन्तन करती है, हे उरुगाय! भक्तोंपर अनुग्रह करके उस-उस शरीरको प्रकृष्टरूपसे आप उनके समीप प्रकट करते हैं। [उत्तम व्यक्तियोंके द्वारा जिनका स्तुतिगान किया जाता है, उन्हें उरुगाय अथवा उरुक्रम कहते हैं] ॥११०॥ इति अनुभाष्ये तृतीय परिच्छेदः। तृतीय अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृताणुकणिका—‘श्रुतेक्षित-पथ’—शास्त्रोंमें नाना प्रकारके साधन-पन्थोंका उल्लेख है; जो जिस भावसे भगवान्को पानेकी इच्छा करता है, वह शास्त्रोंसे उसके अनुकूल साधन-पन्थको ग्रहण करेगा। इस वाक्यका भाव यह है कि शास्त्रोंसे बहिर्भूत किसी भी मनोकल्पित साधनसे भगवत्प्राप्ति सम्भव नहीं है। भक्तिरसामृतसिन्धु-धृत-ब्रह्मयामल वचन (पूर्व २/१०१)— “श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव कल्पते॥” अर्थात् “श्रुति, स्मृति, पुराण तथा पञ्चरात्रादि शास्त्रोंमें वर्णित विधिकी उपेक्षा करके ऐकान्तिक हरिभक्ति केवल उत्पातका ही कारण बनती है।” भक्तियोग-परिभावित-हृत्सरोज—भक्तियोगके द्वारा परिभावित हुआ हृदयरूप कमल अर्थात् भक्तियोगका अनुष्ठान करके साधकका हृदय कमलके समान निर्मल, कोमल और पवित्र हो जाय। साधनभक्तिका अनुष्ठान करते हुए अनर्थ-निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, रति आदि सोपानोंको पार करते हुए चित्त जब परिभावित हो अर्थात् शुद्धसत्त्वके आविर्भावसे उज्ज्वलता धारण करके शुद्धसत्त्व-स्वरूप भगवान्के आविर्भावकी योग्यता लाभ करे, तभी उस हृदय-कमलमें श्रीभगवान् आविर्भूत होते हैं, उसके पूर्व नहीं। वे ऐसे हृदय कमलको कभी त्याग नहीं करते और सदा उसमें अवस्थान करते हैं। शास्त्रोंमें भगवान्के जिन-जिन रूपोंका वर्णन किया गया है, उनमेंसे भक्त निज बुद्धिके द्वारा जिन-जिन रूपोंका चिन्तन करते हैं, भक्तवत्सल भगवान् उन्हीं रूपोंको भक्तोंके समक्ष प्रकृष्ट
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३/११०-११३ ] रूपसे प्रकट करते हैं। भगवान् स्वतन्त्र होनेपर भी अपने भक्तोंकी वश्यताको स्वीकार करते हैं। श्रीअद्वैताचार्यकी आराधना और उनकी इच्छानुसार भगवान् जगत्में अवतीर्ण हुए, इसे प्रमाणित करनेके लिये यह श्लोक उद्धृत किया है॥११०॥ एइ श्लोकेर अर्थ संक्षेपेर सार। भक्तेर इच्छाय कृष्णेर सर्व अवतार॥१११॥ चतुर्थ श्लोकेर अर्थ हैल सुनिश्चिते। अवतीर्ण हैला गौर प्रेम प्रकाशिते॥११२॥ अनुवाद—संक्षेपमें इस श्लोकके अर्थका सार यही है कि भक्तकी इच्छासे ही श्रीकृष्णके सभी अवतार होते हैं। चौथे श्लोकका अर्थ यह सुनिश्चित हो गया है कि प्रेम प्रकाश करनेके लिये ही गौराङ्ग महाप्रभु अवतरित हुए हैं॥१११-११२॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥११३॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे आशीर्वाद-मङ्गलाचरणे चैतन्यावतार-सामान्यकारणं नाम तृतीय-परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥११३॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डके आशीर्वाद-मङ्गलाचरणमें चैतन्यावतारका सामान्य कारण नामक तीसरा अध्याय समाप्त। तीसरा अध्याय | १४५
प्रिया यदि मान करि' करये भर्त्सन। वेदस्तुति हैते हरे सेइ मोर मन ॥ एइ सब रसनिर्यांस करिब आस्वाद। एइ द्वारे करिब सब भक्तरे प्रसाद ॥
चौथा अध्याय चौथे अध्यायका कथासार—इस चौथे अध्यायमें श्रीकृष्णदास कविराज यह दृढ़तापूर्वक कह रहे हैं कि तीन गूढ़ प्रयोजन-सिद्धिके लिये श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण हुए। (प्रथम प्रयोजन)—राधिका मेरे प्रेमकी आश्रय है और मैं उस प्रेमका विषय होनेके कारण आश्रयजातीय सुखका अनुभव करनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये मैं आश्रयस्वरूप राधिकाके भावोंका अवलम्बनकर उसका आस्वादन करूँगा। (द्वितीय प्रयोजन)—श्रीमती राधिका मेरी जिस माधुरीका आस्वादन करती है, वह जगत्-आकर्षक होनेपर भी मैं उसका आस्वादन नहीं कर पाता हूँ; इसलिये राधिकाके भावों और अङ्गकान्तिको ग्रहण किये बिना मेरा यह प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। (तृतीय प्रयोजन)—श्रीराधिकाके सङ्गमें मुझे जो सुख मिलता है, उसकी अपेक्षा अधिक सुख राधिकाको मेरे सङ्गसे मिलता है। इसलिये मुझमें कोई एक ऐसा अपूर्व रस है, जिसका भोग करके राधिकाको मुझसे अधिक सुख प्राप्त होता है। मेरे लिये विजातीय भावसे इस सुखको अनुभव करना सम्भव नहीं है। राधिकाके भाव और कान्तिको अङ्गीकार करके राधिकाके स्वजातीय भावोंका आस्वादन कर पाऊँगा। इन तीन गूढ़ इच्छाओंको पूर्ण करनेके लिये श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण हुए। युगधर्मकी स्थापना और श्रीअद्वैतचन्द्रादि भक्तोंकी आराधनाको स्वीकार करना श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारका केवल बाह्य कारण है। श्रीस्वरूप गोस्वामी श्रीचैतन्य महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंमें प्रधान हैं; उनके कड़चाके श्लोकोंसे यह गूढ़ तत्त्व प्राप्त होता है। श्रीरूपगोस्वामीके श्लोक द्वारा भी इस सिद्धान्तकी दृढ़ता स्थापित हुई है। इस अध्यायमें काम और प्रेमके तत्त्वका भेद दिखलाकर श्रीकृष्णप्रीतिकी कामनाको कामतत्त्वसे पृथक् किया गया है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकृपासे श्रीकृष्णस्वरूपका निर्णय :— श्रीचैतन्यप्रसादेन तद्रूपस्य विनिर्णयम्। बालोऽपि कुरुते शास्त्रं दृष्ट्वा व्रजविलासिनः ॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक मूर्ख व्यक्ति भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे शास्त्रोंको देखकर व्रजविलासी श्रीकृष्णके तत्त्वस्वरूपका निरूपण करनेमें समर्थ हो जाता है॥ १॥ अनुभाष्य—बालः (अर्भकः) अपि श्रीचैतन्यप्रसादेन (गौरकृपया) शास्त्रं दृष्ट्वा व्रजविलासिनः (ब्रजेन्द्रनन्दनस्य) तद्रूपस्य (राधाकृष्णाभिन्नगौररूपस्य) विनिर्णयं (तत्त्वनिर्देशं) कुरुते। श्लोक-भावानुवाद—एक बालक भी श्रीगौरसुन्दरकी कृपासे शास्त्रोंको देखकर व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णके अर्थात् श्रीराधा-कृष्णसे अभिन्न श्रीगौरसुन्दररूपके तत्त्वका निरूपण कर सकता है॥ १॥
[ ४/२-८ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर-भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ चतुर्थ श्लोकेर अर्थ कैल विवरण। पञ्चम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥३॥ अनुवाद-इससे पूर्व अध्यायमें मङ्गलाचरणके चौथे श्लोकके अर्थको विस्तारसे कहा है। हे भक्तों! अब आप उसके पाँचवें श्लोकके अर्थको ध्यानपूर्वक श्रवण कीजिये। मूल-श्लोकेर अर्थ करिते प्रकाश। अर्थ लगाइते आगे कहिये आभास॥४॥ अनुवाद-मूल श्लोकके अर्थको प्रकाश करनेसे पहले उसकी भूमिका प्रस्तुत कर रहा हूँ॥४॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमें चतुर्थ श्लोक-तात्पर्य— नाम-प्रेम-प्रचार श्रीगौरावतारका बाह्य कारण :— चतुर्थ श्लोकेर अर्थ एइ कैल सार। प्रेम-नाम प्रचारिते एइ अवतार॥५॥ अनुवाद-मैंने चौथे श्लोकका सारार्थ यह दिया है कि श्रीगौरसुन्दरका अवतार जगत्में नाम-सङ्कीर्तनके प्रचार और श्रीकृष्णप्रेमको प्रदान करनेके लिये हुआ है॥५॥ सत्य एइ हेतु, किन्तु एहो बहिरङ्ग। आर एक हेतु, शुन, आछे अन्तरङ्ग॥६॥ अनुवाद-यह बात सत्य है, किन्तु यह अवतार लेनेका बाह्य कारण है। उसका एक और कारण है; वह अन्तरङ्ग अर्थात् गूढ़ कारण है, उसे अब श्रवण करो॥६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तीसरे अध्यायमें चौथे श्लोकका सारार्थ इस प्रकार निरूपित किया गया है—प्रेम अर्थात् प्रेमभक्ति और श्रीकृष्णनाम प्रचार करने लिये गौराङ्ग महाप्रभुका अवतार हुआ है। उस सिद्धान्तका जिस कारणसे उल्लेख किया गया, वह सत्य होनेपर भी बहिरङ्ग अर्थात् बाह्य कारण है, गूढ़ कारण नहीं। इसका एक अन्तरङ्ग (गूढ़) कारण भी है, अब उसका वर्णन कर रहा हूँ॥४-६॥ श्रीगौरावतारके गुह्यकारण वर्णन करनेके लिये पहले श्रीकृष्ण और विष्णुलीलाके वैचित्र्यका वर्णन :— पूर्वे येन पृथिवीर भार हरिबारे। कृष्ण अवतीर्ण हैला शास्त्रेते प्रचारे॥७॥ विष्णुका कार्य—साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका नाश; स्वयं श्रीकृष्णका वह कार्य नहीं :— स्वयं भगवानेर कर्म नहे भारहरण। स्थितिकर्त्ता विष्णु करेन जगत्पालन॥८॥ १४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/७-१४ ] अवतारी श्रीकृष्णके अवतरणकालमें उनके साथ अवतार विष्णुका मिलन :- किन्तु कृष्णेर येइ हय अवतार-काल। भारहरण-काल ताते हइल मिशाल॥ ९॥ अनुवाद—शास्त्रोंमें यह वर्णन है कि पूर्वकाल अर्थात् द्वापरयुगमें श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये अवतीर्ण हुए थे। भू-भारहरण स्वयं-भगवान्का कार्य नहीं है, स्थितिकर्त्ता विष्णु ही असुरोंका संहारकर जगत्का पालन करते हैं। किन्तु जब श्रीकृष्णके अवतार ग्रहणका समय आया, तो उस समय पृथ्वीके भारहरणका काल भी उपस्थित हो गया॥७-९॥ पूर्ण भगवान् अवतरे येइ काले। आर सब अवतार ताँते आसि' मिले॥१०॥ नारायण, चतुर्व्यूह, मत्स्याद्यवतार। युग-मन्वन्तरावतार, यत आछे आर॥११॥ सबे आसि' कृष्ण-अङ्गे हय अवतीर्ण। ऐछे अवतरे कृष्ण भगवान् पूर्ण॥ १२॥ देहस्थित अंश-विष्णुके द्वारा जगत्का भारहरण और पालनलीला :- अतएव विष्णु तखन कृष्णेर शरीरे। विष्णुद्वारे कृष्ण करे असुर-संहारे॥१३॥ आनुषङ्ग-कर्म एइ असुर-मारण। ये लागि' अवतार, कहि से मूल कारण॥ १४॥ अनुवाद—पूर्ण भगवान् जिस समय अवतरित होते हैं, उस समय अन्य सभी अवतार भी उनमें समाहित हो जाते हैं। भगवान् नारायण, चतुर्व्यूह (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध), मत्स्यादि अंशावतार, युगावतार, मन्वन्तरावतार और जितने भी अन्य अवतार हैं, वे सभी श्रीकृष्णके अङ्गोंमें समाहित होकर अवतीर्ण होते हैं। इस प्रकार पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णका अवतार होता है। इसलिये विष्णु उस समय श्रीकृष्णके शरीरमें रहते हैं और विष्णुके द्वारा ही श्रीकृष्ण असुर-संहार कराते हैं। असुरोंको मारना आदि आनुषङ्गिक कार्य हैं। किन्तु जिसके लिये उनका अवतार होता है, उस मूलकारणको अब कह रहा हूँ॥१०-१४॥ अमृतानुकणिका—श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा (गीता ४/७-८)— “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥” अर्थात् “हे भारत! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने नित्यसिद्ध देहको प्रकट करता हूँ। मैं अपने एकान्त भक्तोंके परित्राण, दुष्टोंके विनाश और धर्मकी संस्थापनाके लिए युग-युगमें आविर्भूत होता हूँ।” चौथा अध्याय | १४९
[ ४/१०-१५ किन्तु वे स्वयंरूपमें ब्रह्माके एक दिनमें (एक हजार चतुर्युगमें) एक बार ही अवतीर्ण होते हैं, प्रति युगमें नहीं। इसलिये गीताके इन श्लोकोंका तात्पर्य यह है कि श्रीकृष्ण युगावतारके रूपमें प्रत्येक युगमें अवतीर्ण होते हैं, स्वयंरूपमें नहीं। दैत्यों आदिके अत्याचारोंसे दुःखित पृथ्वीकी प्रार्थनापर ब्रह्माजी क्षीरसमुद्रके तटपर गये और पृथ्वीके दुःखोंकी गाथा कही तथा उसके त्राणके लिये भगवान्से निवेदन किया। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर स्वयं भगवान् क्यों अवतीर्ण हुए? वे युगावतारको भेजकर पृथ्वीके कष्टोंका निवारण कर सकते थे। इसके उत्तरमें कहा जा सकता है—स्वयं भगवान् ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर जगत्में अवतीर्ण नहीं हुए। ब्रह्माजीके क्षीरसमुद्रके तटपर जानेसे पहले ही भगवान्ने अवतार लेनेका निर्णय ले लिया था। आकाशवाणीके द्वारा उन्होंने ब्रह्माजीको बतलाया कि वे पृथ्वीकी दुर्दशाके विषयमें पहलेसे ही जानते हैं और शीघ्र ही स्वयं भगवान् प्रपञ्चमें अवतीर्ण होंगे। ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे उसी समय भूभार हरणके लिये युगावतारका भी समय आ गया। इसलिये श्रीकृष्णके अवतारकालमें भारहरणकाल भी मिल गया। स्वयं भगवान्में उनके सभी अवतार रहते हैं और अपने शरीरमें स्थित विष्णुके द्वारा श्रीकृष्णने असुरोंका संहार करवाया। स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने अवतरित होनेकी इच्छा स्वयं ही की, वे किसीकी प्रार्थनापर अवतीर्ण नहीं हुए, इसके अनेक प्रमाण हैं। जैसे भागवत (१०/२/३९) श्लोककी टीकाके प्रारम्भमें ही श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने लिखा है—“हमारी प्रार्थनासे आप हमारा पालन करनेके लिये जगत्में अवतरित हो रहे हैं—ऐसा विचार केवल हमारा अभिमानमात्र है, वास्तवमें आपका जन्म, कर्म और लीला आपकी स्वेच्छासे सिद्ध है।” कुन्तीदेवीने भी श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए कहा (भागवत १/८/२०)— “तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम्। भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ॥ ” अर्थात् “मननशील, आसक्तिरहित, आत्म-अनात्म विवेकी जीवन्मुक्त परमहंस पुरुष भी आपकी महिमाके प्रभावके कारण आपका दर्शन नहीं कर पाते। इसलिये ऐसे पुरुषोंमें भी अपने प्रति भक्ति उत्पन्न करानेके उद्देश्यसे अवतीर्ण आपका मेरे जैसी मुग्ध स्त्रियाँ कैसे दर्शन कर सकती हैं अर्थात् किस प्रकार आपको जाननेमें समर्थ हो सकती हैं?” अक्रूरजी श्रीकृष्ण-बलरामको मथुरा ले जानेके लिये ब्रजमें आते हुए मनमें उनका चिन्तन करते हुए कह रहे हैं (विष्णुपुराण ५/१७/११)— “साम्प्रतं च जगत्स्वामी कार्यमात्महृदि स्थितम्। कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तः स्वेच्छादेहधृगव्ययम् ॥” अर्थात् “इस समय उन अव्ययात्मा जगत्-स्वामी श्रीकृष्णने अपने हृदयमें स्थित कार्य करनेके उद्देश्यसे ही अब नरलीला प्रकट की है।” ॥ १०-१४॥ वैधी भक्तिके प्रचारके लिये विष्णुका अवतार, रागमार्गकी भक्तिके प्रचारके लिये श्रीकृष्णका अवतार :- प्रेमरस-निर्यास करिते आस्वादन। रागमार्ग भक्ति लोके करिते प्रचारण ॥ १५ ॥ १५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१५-१६ ] रसिक-शेखर कृष्ण परमकरुण। एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम॥ १६ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण रसिकशेखर हैं, इसलिये अपने ही प्रेमरसके सारका आस्वादन और वे परम करुण हैं, इसलिये जगत्में बद्धजीवोंके उद्धारके लिये रागमार्ग भक्तिका प्रचार—इन दो कारणोंसे श्रीकृष्णकी अवतीर्ण होनेकी इच्छा उत्पन्न हुई॥ १५-१६॥ अमृतानुकणिका—'प्रेमरस निर्यास'—विभाव-अनुभावादिके मिलनसे परमास्वादन-चमत्कारिता-प्राप्त प्रेमका सार। 'रागमार्ग भक्ति'—रागानुगा भक्ति। (भःरःसिः पूर्व २/२७२,२७०)— “इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत्। तन्मयी या भवेद्भक्तिः साऽत्र रागात्मिकोदिता॥ विराजन्तीमभिव्यक्तं व्रजवासिजनादिषु। रागात्मिकामनुसृता या सा रागानुगोच्यते॥” अर्थात् “इष्ट (श्रीकृष्ण) में स्वाभाविकी जो एक प्रेममयी तृष्णा है, उसके कारण इष्टमें परमाविष्टता अथवा आवेश हुआ करता है। उस प्रेममयी-तृष्णाका नाम है—'राग'। रागमयी भक्तिको 'रागात्मिका-भक्ति' कहते हैं और यह व्रजवासी-जनोंमें सुस्पष्ट भावसे विराजमान है। उस रागात्मिका-भक्तिका जो अनुगमन अथवा अनुसरण करती है, उसे 'रागानुगा-भक्ति' कहते हैं।” अन्य युगावतार जगत्में वैधीभक्तिकी स्थापनाके लिये अवतीर्ण होते हैं। परन्तु स्वसुख-वासनाशून्य और श्रीकृष्णसुखैकतात्पर्यमयी सेवामें श्रीकृष्णके प्रति भक्तोंका जो ऐश्वर्यज्ञानहीन विशुद्ध प्रेम प्रकाश पाता है, उस प्रेम-रस-सारका आस्वादन करनेके लिये और जीवोंमें रागानुगा भक्तिके प्रचारके लिये श्रीकृष्ण व्रजमें अवतीर्ण हुए—यही स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके अवतारका अन्तरङ्ग कारण है। इन दो उद्देश्योंकी सिद्धिकी इच्छा उनके दो स्वरूपानुबन्धि गुणोंके कारण ही हुई, किसी अन्यके द्वारा नहीं। श्रीकृष्णका रसिक-शेखरत्व और परम-करुणत्व—ये दो गुण उनके स्वरूपानुबन्धि गुण हैं। वे रसिक शेखर हैं, इसलिये उत्कृष्ट रसास्वादनकी उनकी स्वाभाविकी इच्छा है, रसोंमें भक्तोंका प्रेमरस-निर्यास (सार) सर्वोत्कृष्ट है। तभी उनकी भक्तोंके प्रेमरस-निर्यासके आस्वादनकी इच्छा हुई। मायाबद्ध जीव संसारमें अनादिकालसे दुःख भोग रहे हैं। उनके इस संसार दुःखको दूरकर अपने श्रीचरणसेवाका अन्तरङ्गतम अधिकार देकर परमसुखके अधिकारी बनानेके अभिप्रायसे परम-करुण श्रीकृष्णकी रागानुगाभक्तिके प्रचारकी इच्छा हुई। जगत्में तब केवल वैधीभक्ति प्रचलित थी, परन्तु वैधीभक्तिके द्वारा व्रजके भावको प्राप्त नहीं किया जा सकता। 'रसिक-शेखर'—रसिकोंमें सर्वश्रेष्ठ; रसिकेन्द्र चूड़ामणि। परतत्त्व श्रीकृष्णको श्रुतियोंमें कहा गया हैं—'रसो वै सः' अर्थात् वे रसस्वरूप हैं। रस-शब्दके दो अर्थ हैं। 'रस्यते आस्वाद्यते इति रसः'—जिसका आस्वादन किया जाय, वह रस है; जैसे मधु। और 'रसयति आस्वादयति इति रसः'—जो आस्वादन करे, उसे भी रस कहा गया है; जैसे भ्रमर। इसलिये रस-शब्दके अर्थ हैं—आस्वाद्य रस और आस्वादक रसिक। इस पयारमें आस्वादक रसिक—केवल एक ही अर्थका उल्लेख हुआ है। श्रीकृष्ण अद्वय-तत्त्व हैं, उनके समान रसिक अन्य कोई नहीं हैं, इसलिये वे रसिक-शेखर हैं। चौथा अध्याय | १५१
[ ४/१५-१९ 'एइ दुइ हेतु हैते इच्छार उद्गम'-ये दो इच्छाएँ श्रीकृष्ण अवतारके मूल कारण होनेपर भी दोनों इच्छाओंको एक समान प्रधान नहीं कहा जा सकता। रसास्वादन उनका निजी कार्य है, केवल अपने लिये है- “अवतारेर आर एक आछे मुख्य बीज। रसिकशेखर कृष्णेर सेइ कार्य निज॥” (आदि ४/१०३) और करुणा उनका एक स्वरूपगत गुण है, इसीके वशीभूत होकर वे जीवके निस्तारकी चेष्टा करते हैं- “'लोक निस्तारिब', - एइ ईश्वर-स्वभाव॥” (अन्त्य २/६) इस करुणाके वशीभूत होकर उन्होंने जीवोंके निस्तारके उद्देश्यसे रागमार्गकी भक्तिके प्रचारकी इच्छा की। रसास्वादन-स्पृहाके परिपूर्ण होनेसे जीवोंके लिये रागमार्गकी भक्तिका प्रचार आनुषङ्गिक रूपसे स्वतः ही सम्पन्न हो जायेगा। इसलिये प्रेमरस-निर्यासर-आस्वादन ही श्रीकृष्ण अवतारका मुख्य अन्तरङ्ग कारण है; और रागमार्ग भक्ति-प्रचारको गौण अन्तरङ्ग कारण मानना होगा। तथापि दोनों कारणोंको अन्तरङ्ग कहनेका हेतु यह है- दोनों कार्य श्रीकृष्णके निज कार्य हैं, उनके अतिरिक्त अन्य कोई भी भगवत्स्वरूप रागमार्गकी भक्तिका प्रचार नहीं कर सकते॥ १५-१६॥ ऐश्वर्यज्ञानेते सब जगत् मिश्रित। ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत॥ १७॥ अनुवाद-सभी लोगोंकी भक्ति मेरे ऐश्वर्य ज्ञानसे मिश्रित है। किन्तु ऐसे ऐश्वर्य-ज्ञानसे शिथिल प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥ १७॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/१६ में यह पद्य द्रष्टव्य है॥ १७॥ आमारे ईश्वर माने, आपनाके हीन। तार प्रेमे वश आमि ना हइ अधीन॥ १८॥ अनुवाद-जो मुझे ईश्वर मानता है और स्वयंको हीन (छोटा) समझता है, ऐसे व्यक्तियोंके प्रेमसे मैं वशीभूत नहीं होता हूँ॥ १८॥ आमाके त' ये ये भक्त भजे येइ भावे। तारे से से भावे भजि, - ए मोर स्वभावे॥ १९॥ अनुवाद-जो-जो भक्त जिस-जिस भावसे मेरा भजन करता है, मैं उसी-उसी भावसे उसका भजन करता हूँ, यह मेरा स्वभाव है॥ १९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस समय स्वयं-भगवान् श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए थे, उसी समय जगत्के भार-हरणका काल भी उपस्थित हुआ। जगत्के भार-हरणका दायित्व स्थितिकर्त्ता विष्णुके ऊपर है, भार-हरण स्वयं-भगवान्का कार्य नहीं है। श्रीकृष्णके अवतीर्ण होनेके समय भारहरणका काल उपस्थित होनेसे, पूर्ण भगवान् श्रीकृष्णमें इसलिये नारायण, चतुर्व्यूह अर्थात् वासुदेव- सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध, मत्स्यादि सभी अंशावतार, युगावतार और मन्वन्तरावतार-सभी श्रीकृष्णके अङ्गोंमें अवतीर्ण हुए थे। पूर्ण भगवान्में उनके अङ्ग और अंशादि-खण्डरूप सभी १५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/१७-२० ]
भगवतावतार अवश्य ही आश्रय करके रहते हैं तथा उनके द्वारा नियुक्त पालनकर्त्ता विष्णु श्रीकृष्णके स्वरूपमें ही थे। विष्णुके द्वारा ही श्रीकृष्ण सभी असुरोंका संहार करते हैं। असुरोंका वध श्रीकृष्णावतारका केवल आनुषङ्गिक कार्यमात्र है। किन्तु प्रेमरस-सारके आस्वादन और राग तथा भक्तिको जगत्में प्रचार करनेके लिये परम-रसिक और परम-करुणामय श्रीकृष्णने अवतीर्ण होनेके लिये इच्छा की थी। श्रीकृष्णके मनका भाव यह है— “ऐश्वर्यज्ञानसे जगत् परिपूरित है; उस ऐश्वर्यज्ञानसे जो शिथिल प्रेम उदित होता है, उसमें मेरी प्रीति नहीं रहती। जो भक्त स्वयंको छोटा मानकर मुझे ईश्वर मानता है, उसका प्रेम ऐश्वर्यगत है, मैं कभी भी उस प्रेमके अधीन नहीं होता हूँ; मेरा जो जिस भावसे भजन करता है, मैं भी उसका उसी भावसे भजन करता हूँ, यह मेरा स्वभाव है।” ॥ १७-१९॥ अमृतानुक्रमणिका—ऐश्वर्यज्ञानी भक्त श्रीकृष्णको अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके और समस्त भगवत्स्वरूपोंके भी ईश्वर मानकर स्वयंको एक धूलिकणसे भी तुच्छ मानते हैं, इसलिये वे श्रीकृष्णके अनुग्रहके प्रार्थी हैं अर्थात् श्रीकृष्णके अधीन हैं, किन्तु श्रीकृष्ण उनके अधीन नहीं हैं। प्रेमकी जिस अवस्थामें पहुँचकर भक्त श्रीकृष्णको वशीभूत कर सकते हैं, ऐश्वर्यज्ञानी भक्त प्रेमकी उस अवस्थाको प्राप्त नहीं कर सकते, क्योंकि ऐश्वर्यज्ञानसे उनका प्रेम शिथिल हो जाता है और श्रीकृष्ण ऐसे प्रेमके वशीभूत नहीं होते तथा उस प्रेममें उनकी प्रीति नहीं है। यहाँ प्रश्न हो सकता है—श्रीकृष्ण शुद्धप्रेमवाले भक्तोंके अधीन होते हैं, किन्तु ऐश्वर्यज्ञानयुक्त भक्तोंके अधीन नहीं होते, तो क्या इसके द्वारा श्रीकृष्णका पक्षपातित्वरूप वैषम्य परिलक्षित नहीं होता? इसके उत्तरमें कह रहे हैं—जो भक्त जिस भावसे श्रीकृष्णका भजन करता है, वे उसपर उसीके अनुरूप अनुग्रह करते हैं। जो स्वयंको श्रीकृष्णके अधीन मानकर उनसे अनुग्रहकी प्रार्थना करते हैं, श्रीकृष्ण भी उन्हें अपने अधीन भक्त मानकर अधीनसूचक अनुग्रह प्रकाश करते हैं। और जो भक्त श्रीकृष्ण-वशीकरण प्रेमकी प्रार्थना करते हैं, श्रीकृष्ण भी उन्हें वह प्रेम प्रदानकर उसके अधीन हो जाते हैं। श्रीकृष्ण सदा ही भक्तोंकी प्रार्थनाके अनुरूप अनुग्रह प्रकाश करते हैं। यह श्रीकृष्णका स्वभाव है, इसलिये इसमें उनका पक्षपातित्व प्रकाश नहीं होता। यदि वे किसी-किसीपर उसके भावानुरूप कृपा करें और किसी-किसीपर उसके भावानुरूप कृपा नहीं करें, तब उनका पक्षपातित्व प्रकाशित होगा। यदि कहें कि सर्वशक्तिमान् श्रीकृष्ण क्या इस भक्तका ऐश्वर्यज्ञान दूरकर उसे निजवशीकरण प्रेम नहीं प्रदान कर सकते? इस पयार (१९) में इसके उत्तरमें कह रहे हैं—भक्तकी प्रार्थनाके अनुरूप अनुग्रह प्रकाश करना ही श्रीकृष्णका स्वभाव अथवा स्वरूपानुबन्धि गुण है और इसमें कभी भी परिवर्तन नहीं होता। इसलिये श्रीकृष्ण ऐश्वर्यज्ञानयुक्त भक्तके भावका परिवर्तन नहीं करते॥ १७-१९॥ श्रीमद्भगवद्गीता (४/११)— ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ २० ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२०॥
चौथा अध्याय | १५३
[ ४/२० अमृतप्रवाह भाष्य—हे पार्थ ! जो मेरी जिस भावसे उपासना करता है, मैं उसे उसी भावसे प्राप्य होता हूँ। सभी मनुष्य मेरे ही पथ अर्थात् मेरे द्वारा प्रदर्शित पथके अनुगामी हैं ॥२०॥ अनुभाष्य—भगवान्ने पहले सूर्यको जिस योगविषयमें उपदेश दिया था, उसके परम्पराक्रमसे आते हुए नष्ट हो जानेपर वे पुनः अर्जुनको वही उपदेश कर रहे हैं। भगवान् अपनी प्रकटलीलाका कारण बतलाते हुए यह श्लोक कह रहे हैं— हे पार्थ (अर्जुन), ये (भक्ताः) यथा (येन भावेन) मां (कृष्णं) प्रपद्यन्ते, अहं तथैव तान् भजामि (अनुगृह्णामि)। मनुष्याः सर्वशः (सर्वप्रकारेण एव) मम वर्त्म (सिद्धमार्गं) अनुवर्त्तन्ते (अनुसरन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—हे अर्जुन ! भक्त जिस भावसे मेरी शरण ग्रहण करता है, मैं भी उसी भावसे उसपर अनुग्रह करता हूँ। मनुष्य सभी प्रकारसे ही मेरे द्वारा सिद्ध किये गये मार्गका अनुसरण करते हैं ॥२०॥ अमृतानुकणिका—जो व्यक्ति जिस भावसे मेरे प्रति प्रपत्ति स्वीकार करते हैं, मैं उनका उसी भावसे भजन करता हूँ। सभी मतोंका चरम उद्देश्यस्वरूप मैं, सबको ही प्राप्य हूँ। शुद्ध भक्तगण मेरे सच्चिदानन्द विग्रहकी नित्य-सेवा प्राप्तिके लिये मेरी आराधना करते हैं, मैं ऐसे प्रेमी भक्तोंको अपना नित्य परिकर बनाकर उनको अभिलषित प्रेममयी सेवा प्रदान करता हूँ। सकाम कर्मियोंके निकट मैं कर्मफल प्रदाता ईश्वरके रूपमें प्राप्त होता हूँ। जो निर्विशेषवादी हैं, मैं उनको (उनके) आत्मविनाशके द्वारा निर्विशेष ब्रह्मस्वरूप निर्वाण-मुक्ति प्रदान करता हूँ। मेरे सच्चिदानन्द विग्रहके नित्यत्वको स्वीकार नहीं करनेके कारण उनके चिदानन्द स्वरूपका लोप हो जाता है। उनमेंसे निष्ठाभेदके अनुसार किसी-किसीको नश्वर जन्म भी प्रदान करता हूँ। जो शून्यवादी हैं, मैं शून्यस्वरूप होकर उनकी सत्ताको शून्यगत कर देता हूँ। जो जड़, जड़कर्म अथवा जड़विधिवादी हैं, उनके आत्माको आच्छादित चेतनरूपमें जड़प्राय बनाकर जड़रूपमें ही उनको प्राप्य होता हूँ। जो योगी हैं, उनके निकट मैं ईश्वरके रूपमें विभूति प्रदान करता हूँ अथवा कैवल्य दान करता हूँ। इस प्रकार सर्वस्वरूप होकर मैं सभी मतवादियोंके लिये प्राप्य होता हूँ। परन्तु इन सबमें गोलोक-व्रजमें मेरी सेवा-प्राप्तिको ही प्रधान समझना चाहिये। मनुष्यमात्र ही मेरे विविध पथका अनुसरण करते हैं। श्रीगीताके इस श्लोकके द्वारा यह ठीक प्रकारसे समझना चाहिये कि जो जिस-जिस प्रकारसे भजन करते हैं, उन्हें अपनी-अपनी कामनाके अनुरूप ही फल प्राप्त होता है, सबका फल एक समान कदापि नहीं होता। 'मनुष्याः पार्थ सर्वशः'—इसका अर्थ कुछ लोग इस प्रकार करते हैं कि जो जैसा भी करें, वे सभी भगवान्के ही भजनपथमें हैं और एक ही फल प्राप्त करेंगे, यह सर्वथा भ्रान्त धारणा है। कुकर्मियोंकी, ज्ञानियोंकी, भक्तोंकी और प्रेमी भक्तोंकी अन्तमें एक ही गति होगी—इस विचारका गीता, भागवतादि शास्त्रोंमें खण्डन किया गया है, क्योंकि गीता (९/२५) में आगे कहा गया है— “यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्॥” “देवपूजकगण देवलोकको प्राप्त होते हैं, पितृपूजकगण पितृलोकको प्राप्त होते हैं, भूतपूजकगण भूतलोकको प्राप्त होते हैं और मेरी पूजा करनेवाले मुझे ही प्राप्त होते हैं।” ॥२०॥ १५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२१-२३ ] मोर पुत्र, मोर सखा, मोर प्राणपति। एइभावे येइ मोरे करे शुद्धभक्ति॥ २१॥ आपनाके बड़ माने, आमारे सम-हीन। सेइ भावे हइ आमि ताहार अधीन॥ २२॥ अनुवाद-यदि कोई शुद्धभक्ति भावसे मुझे अपने पुत्र, मित्र अथवा प्राणप्रियतमके रूपमें भावना करते हुए अपनेको बड़ा मानता है और मुझे अपने समान या छोटा समझता है, तो मैं उसके प्रेमके वशीभूत हो जाता हूँ॥ २१-२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो 'कृष्ण मेरा पुत्र हैं', इस प्रकार वात्सल्य भाव; 'कृष्ण मेरे सखा हैं', इस प्रकार सख्य भाव; 'कृष्ण मेरे प्राणपति हैं', इस प्रकार मधुरभावसे शुद्धभक्ति करते हैं और रसभेदसे मुझे छोटा मानकर स्वयंको बड़ा मानते हैं, उनके उस भावसे मैं उनके अधीन हो जाता हूँ। 'शुद्धभक्ति'-ज्ञानकर्म-आवरणहीन, अन्याभिलाषाशून्य, अनुकूल सङ्कल्पयुक्त श्रीकृष्णानुशीलनरूप भक्ति ही 'शुद्धभक्ति' कहलाती है॥ २१-२२॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचरितामृतमें हम 'भक्ति' और 'शुद्धभक्ति'के साथ-साथ 'बिद्धभक्ति'का भी उल्लेख देखकर भक्तिके तीन विभागोंको लक्ष्य करते हैं। अन्याभिलाषितायुक्त, ज्ञानकर्मयोगादिके द्वारा आवृत, श्रीकृष्णसे पृथक् भोगके अनुशीलनके साथ हरिसेवाकी सजावटको 'बिद्धभक्ति' कहते हैं। कर्ममिश्रा, ज्ञानमिश्रा, योगमिश्रा और भोगमय-व्रतमिश्रा आदिके द्वारा आवृत सेवाचेष्टा बिद्धभक्तिके अन्तर्गत है। इसमें शुद्धभक्तिसे पृथक् अन्यरूप चेष्टा वर्तमान रहती है। अबिद्धा-सेवामयी विधिके अनुगमनसे 'भक्ति' होती है। यह भक्ति बिद्धभक्तिसे स्वतन्त्र और विष्णुकी अनुकूल-चेष्टामयी होती है। रागात्मिक भक्तोंकी अहैतुकी, नित्य-हरिसेवाके अनुगमनके लोभसे उदित प्रेमसेवाको 'शुद्धभक्ति' कहा जाता है; वह केवलमात्र शास्त्रके नियमोंके द्वारा परिचालित नहीं होती। 'वैधीभक्ति' या 'भक्ति' या 'अबिद्धा भक्ति' शुद्धभक्तिकी सहायिका होनेपर भी 'शुद्धभक्ति' शब्दसे रागानुगा-सेवाको ही लक्ष्य किया है। शुद्धभक्तिको भक्तिकी पराकाष्ठा कहा जाता है। यह गोलोकके भक्तोंकी रागमयी भक्ति है और वैधीभक्ति परव्योम या वैकुण्ठके भक्तोंकी गौरवमयी भक्ति है॥ २२॥ श्रीमद्भागवत (१०/८२/४४)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः॥ २३॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ २३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है॥ २३॥ अनुभाष्य-स्यमन्तपञ्चकमें सूर्यग्रहणके उपलक्ष्यपर द्वारकासे यादवगण और व्रजसे सभी व्रजवासियोंके साथ नन्दमहाराज उपस्थित हुए थे। गोकुलवासिनी व्रजगोपियोंके साथ श्रीकृष्णका मिलन होनेपर श्रीकृष्ण गोपियोंसे कह रहे हैं- मयि भूतानां (प्राणिनां) भक्तिः (श्रवणकीर्त्तनाख्या) अमृतत्वाय (नित्यपार्षदत्वाय) कल्पते (योग्यो भवति) हि। भवतीनां (गोपीनां) मदापनः (मत्साक्षात्कारकः) मत्स्नेहः यत् आसीत् तत् दिष्ट्या (तत् तु मद्भाग्येनैव)। चौथा अध्याय | १५५
[ ४/२३-२५ श्लोक-भावानुवाद—मेरे प्रति श्रवण-कीर्तनादि लक्षणोंवाली नवधाभक्तिके द्वारा प्राणी निःसन्देह अपने नित्यपार्षदस्वरूपको प्राप्त करनेके योग्य होते हैं। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, उससे तुम्हें मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है और वह मेरा सौभाग्य ही है॥२३॥ माता मोरे पुत्रभावे करेन बन्धन। अतिहीन-ज्ञाने करे लालन-पालन ॥ २४ ॥ अनुवाद—मेरी माता कभी-कभी अपने पुत्र-भावसे मुझे बाँध देती है। वह मुझे अत्यन्त असहाय समझकर मेरा लालन-पालन भी करती है॥ २४॥ अमृतानुकणिका—'माता'—वात्सल्य प्रेमकी परमाश्रय यशोदा माता। यशोदा माता श्रीकृष्णको अपना पुत्र मानकर उनका लालन-पालन और कभी शासन भी करती हैं। उनकी श्रीकृष्णमें ईश्वर बुद्धि नहीं है। उनका मानना है कि श्रीकृष्ण उनके गर्भजात पुत्र हैं, उनके दुग्धपोष्य शिशु, नितान्त निराश्रय और नितान्त दुर्बल हैं, अपने आप शरीरपर बैठी मक्खी भी नहीं उड़ा सकते, भूख लगनेपर उसे मुखसे कह भी नहीं पाते। उनको छोड़कर श्रीकृष्णका अन्य कोई सहारा नहीं है; वे खिलायेंगी, तो श्रीकृष्ण खायेंगे; वे रक्षा करेंगी, तो श्रीकृष्णकी रक्षा होगी। उनका मानना है कि श्रीकृष्णमें अपने अच्छे-बुरेका विचार करनेकी क्षमता नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णके मङ्गलके लिये ही उनपर शासन करती हैं, उन्हें डाँटती-फटकारती हैं और कभी रस्सीसे बाँध भी देती हैं—श्रीकृष्णके प्रति उनकी इतनी ममता बुद्धि है। श्रीकृष्ण उनके शुद्ध वात्सल्य-प्रेममें मुग्ध होकर उनके प्रेमकी वश्यताको स्वीकारकर यशोदा माताके लालन-पालन, ताड़न-भर्त्सन, सभीको अङ्गीकारकर अपरिमित आनन्दका अनुभव करते हैं। देवकीमें भी श्रीकृष्णके प्रति वात्सल्य प्रेम है, किन्तु वह ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित होनेके कारण विशुद्ध नहीं है। मथुरामें जन्मके समय देवकीने उनका भगवत्-रूप देखा था, इसलिये श्रीकृष्णको निराश्रय मानकर उनके लालन-पालनका भाव उनमें उदित नहीं होता है और उनपर वे शासन भी नहीं कर सकतीं। इसलिये इस पयारमें 'माता' कहनेसे उन्हें लक्ष्य नहीं किया गया है॥२४॥ सखा शुद्धसख्ये करे स्कन्धे आरोहण। तुमि कोन् बड़ लोक,—तुमि आमि सम ॥ २५ ॥ अनुवाद—सखालोग शुद्ध-सख्यभावसे मेरे कन्धेके ऊपर चढ़ जाते हैं और कहते हैं कि तुम कौनसे बड़े आदमी (धनी व्यक्ति) हो, तुम और हम समान हैं॥ २५ ॥ अमृतानुकणिका—'सखा'—श्रीदाम, सुबल, मधुमङ्गलादि। व्रजके इन सखाओंमें श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध सख्यभाव है। श्रीकृष्णमें उनकी ईश्वर-बुद्धि नहीं हैं, वे श्रीकृष्णको अपनेसे बड़ा नहीं मानते अपितु समान बुद्धि रखते हैं। इसी समान भावसे वे श्रीकृष्णके साथ निःसङ्कोच होकर खेलते हैं; कभी खेलमें हारकर श्रीकृष्णको कन्धेपर बैठाते हैं और कभी श्रीकृष्णके हार जानेपर उनके कन्धेपर चढ़ जाते हैं। कभी वनमें कोई फल प्राप्त होनेपर उसे चखकर देखते हैं और यदि वह स्वादिष्ट होता है, तो श्रीकृष्णको खिलाये बिना स्वयं खानेकी इच्छा नहीं करते। तब वे अपना जूठा फल श्रीकृष्णके मुखमें देकर कहते हैं—'कान्हा! यह फल खाकर तो देखो, कितना स्वादिष्ट है।' इस पयारमें दिखलाया है कि श्रीकृष्ण अपने व्रजके सखाओंके प्रेमके द्वारा कितने वशीभूत हैं। १५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२५-२६ ] द्वारका-मथुरादिके सखाओंका सख्य भाव इस पयारका लक्ष्य नहीं है। कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके विश्वरूपका दर्शनकर अर्जुन भयभीत होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। सख्य-भावसे पहले उन्होंने श्रीकृष्णके साथ हास-परिहासमें जो उनका अनादर किया था, उसके लिये वे क्षमा प्रार्थना करने लगे। किन्तु श्रीकृष्णके द्वारा अनेक बार गोवर्धन-धारण, वैकुण्ठ दर्शनादि अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित करनेपर भी सुबलादि सखाओंकी ऐसी अवस्था कभी नहीं हुई॥२५॥ प्रिया यदि मान करि' करये भर्त्सन। वेदस्तुति हैते हरे सेइ मोर मन॥२६॥ अनुवाद—यदि मेरी प्रियतमा मान करके मेरी भर्त्सना (निन्दा) करती है, तो वह भर्त्सना वेदस्तुतियोंसे भी अधिक मेरे मनको हरण कर लेती है॥२६॥ अनुभाष्य—शुद्ध-अनुरागवश अपना परम-आत्मनीय माननेसे आश्रय (भक्त) के विषय (श्रीकृष्ण) के प्रति ताड़ना-भर्त्सनारूपी दुर्वचन भी उनकी आत्यन्तिक और ऐकान्तिक प्रीतिका ही परिचय हैं। जहाँपर विषयके प्रति पूज्य और गुरुबुद्धि होती है, वहाँ स्वाभाविक प्रीतिकी शिथिलता न्यूनाधिक रूपमें अवश्य वर्तमान होती है। प्रीतिरहित अज्ञानी जनोंके लिये वेदशास्त्रोंमें जो विधि और निषेध निर्धारित हुए हैं, उस प्रकार विधिके अनुरूप गौरव वाक्योंके द्वारा की गयी स्तुति (वैधस्तुति) की यदि उपरोक्त प्रीतिमूलक वाक्यों (भर्त्सना)से तुलना की जाय, तो इनमें गौरव-पूजाका अभाव होनेपर भी इनका उत्कर्ष वैधस्तुतिकी अपेक्षा श्रेष्ठ है। श्रीकृष्णसे इतर विषयोंसे मुक्त शुद्धभक्तोंका भगवान्के साथ अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। ऐसे सम्बन्धज्ञानसे जो नित्यवृत्तिका उदय देखा जाता है, वह ऐश्वर्यप्रधान वैध गौरवकी अपेक्षा सब प्रकारसे उपादेय अर्थात् कल्याणप्रद है॥२६॥ अमृतानुकणिका—मान—उःनीः शृङ्गारभेद-प्रकरण (१५/७४)— “दाम्पत्योर्भाव एकत्र सतोरप्यनुरक्तयोः। स्वाभीष्टाश्लेषवीक्षादिनिरोधी मान उच्यते॥” अर्थात् “परस्पर अनुरक्त और एकत्र अवस्थित रहनेपर भी नायक-नायिकामें अपने-अपने अभिलषित आलिङ्गन, दर्शन, चुम्बन, प्रियभाषणके प्रतिबन्धक भावको 'मान' कहते हैं।” श्रीकृष्ण-प्रेयसी व्रजसुन्दरियाँ मानवती होकर अनेक बार श्रीकृष्णका तिरस्कार करती हैं, किन्तु श्रीकृष्ण इससे रुष्ट नहीं होते अपितु उन्हें इतना आनन्द होता है, जितना उन्हें वेद-स्तुति सुनकर भी नहीं होता। गोपियोंके निर्मल प्रेमके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत होकर स्वयं स्वीकार करते हैं कि वे उनके प्रेमके ऋणशोधनमें असमर्थ हैं (भाः १०/३२/२२—न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां ०)। श्रीराधिकाके मानभञ्जनके लिये श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् होकर भी उनके चरणोंमें अपने शीशको नत करते हैं (गीत-गोविन्दम्—'देहि पदपल्लवमुदारं')। साधारणतः नायकके किसी अपराधके कारण नायिका मान करती है। कभी-कभी नायिकाके प्रति भी नायकका कारणाभासजनित मानका उदय होता है। इस पयारमें 'यदि' शब्दका तात्पर्य यह है कि व्रजसुन्दरियोंका श्रीकृष्णके प्रति सदा मान नहीं होता, किसी-किसी समय होता है और तभी वे श्रीकृष्णका तिरस्कार करती हैं। जहाँ प्रणय विराजमान होता है, वहींपर मान चौथा अध्याय | १५७
[ ४/२६-२९ सम्भव होता है। यह हेतुक और अहैतुक भेदसे दो प्रकारका होता है। श्रीराधिकाकमें कभी किसी कारणसे मान होता हैं और कभी अकारण मान भी होता है। श्रीराधिकाके मान प्रसादनमें श्रीकृष्णको सुख मिलता है, इसलिये उनके सुख विधानके लिये श्रीराधिकाको मान होता है। द्वारकाकी महिषियोंका कान्ताभाव ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित है और वह श्रीकृष्णके लिये उतना तृप्तिदायक नहीं है। इसलिये द्वारकामें महिषियोंके साथ रहते हुए भी श्रीकृष्णका मन गोपियोंकी तीव्र विरह-वेदनासे हाहाकार कर उठता है। ऐश्वर्यज्ञानवशतः श्रीकृष्णके प्रति महिषियोंकी ममता बुद्धि गोपियोंके समान प्रगाढ़ नहीं है। कभी-कभी वे मानवती होती हैं, परन्तु वे श्रीकृष्णका तिरस्कार नहीं कर पातीं, अपितु श्रीकृष्ण ही कभी-कभी उनका तिरस्कार करते हैं। श्रीकृष्ण कहीं उनका त्याग नहीं कर दें, इस आशङ्कासे श्रीकृष्णके तिरस्कार करनेपर शीघ्र ही अपना मान त्याग देती हैं। किन्तु तिरस्कारकी कल्पना भी दूरकी बात है, काकुति-मिनती और यहाँतक कि चरण-धारणके द्वारा श्रीकृष्ण अनेक बार व्रजसुन्दिरियोंके मान-भञ्जनमें समर्थ नहीं होते। इसलिये व्रजसुन्दिरियोंका प्रेम ही इस पयारका लक्ष्य है, महिषियोंका प्रेम नहीं ॥ २६ ॥ एइ शुद्धभक्ति लञा करिमु अवतार। करिब विविधविध अद्भुत विहार ॥ २७ ॥ वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ये लीलार प्रचार। से से लीला करिब याते मोर चमत्कार ॥ २८ ॥ अनुवाद-इस शुद्धभक्तिको लेकर मैं अवतार लूँगा और ऐसी नाना प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करूँगा, जो वैकुण्ठादिमें अर्थात् वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका और मथुरामें भी अज्ञात हैं। मैं ऐसी-ऐसी लीलाओंका प्रकाश करूँगा जिनसे मैं स्वयं भी चमत्कृत हो जाता हूँ ॥ २७-२८ ॥ मो-विषये गोपीगणेर उपपति-भावे। योगमाया करिबेक आपनप्रभावे ॥ २९ ॥ अनुवाद-योगमायाके प्रभावसे प्रेरित होकर गोपियाँ मेरे प्रति उपपति-भावको प्रकाश करेंगी ॥ २९ ॥ अनुभाष्य-मायासे अतीत वैकुण्ठादि लोकोंमें भगवान्का जो सब लीलावैचित्र्य दिखलायी देता है, उसमें स्वयंरूप श्रीकृष्णकी चमत्कारिता नवनवायमान रूपमें नहीं होती। उसके ऊपर स्थित गोलोकमें स्वयंरूप श्रीकृष्ण निजसुख-उद्देश्यसे जिस प्रकारकी लीलाएँ करते हैं, वैसी लीलाओंके उत्कर्षको ऐश्वर्यप्रधान भक्तोंके सामने प्रदर्शन करनेके लिये उन लीलाओंको प्रपञ्चमें प्रकट करनेकी श्रीकृष्णकी इच्छा हुई। आश्रयकी अपने विचारसे विषयके प्रति वैध गौरवकी अपेक्षा होती है, आश्रय अर्थात् गोपियोंका जिनके प्रति गौरव वर्तमान है, उन पतियोंकी वञ्चना और त्यागकर श्रीकृष्ण-अनुरागवशतः ऐश्वर्यरहित माधुर्यके आकर्षणसे आकृष्ट होकर जो चेष्टा देखी जाती है, वह परकीया सेवाप्रवृत्ति योगमायाके द्वारा ही सम्पन्न होती है। ऐसी चिन्मयी मायाका प्रभाव श्रीकृष्णके लिये भी अज्ञेय विषय है, वह उनकी कृपास्वरूपा योगमायाके द्वारा ही सम्भवपर है ॥ २९ ॥ अमृतानुकणा-गोलोकमें शुद्ध चित्-प्रतीति है, वहाँपर जड़-प्रतीति नामकी कोई वस्तु ही नहीं है। चित्शक्तिने रसकी पुष्टिके लिये जिन सभी विचित्र भावोंको वहाँ उदय किया है, उसमें १५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/२९-३१ ] अनेक स्थानोंपर 'अभिमान' नामक एक सत्ता है। गोलोकमें श्रीकृष्ण अनादि और अजन्मा हैं। तो भी वहाँपर लीलाके सहायक नन्द-यशोदाने पिता-माताके अभिमानके द्वारा वात्सल्यरसको मूर्तिमान किया हुआ है। शृङ्गाररसमें विप्रलम्भ और सम्भोगादि अभिमानके रूपमें वर्तमान हैं। और परकीयभावमें शुद्ध स्वकीयत्व रहनेपर भी परकीय अभिमान और औपपत्य अर्थात् उपपति होनेका अभिमान नित्य वर्तमान हैं। प्रकट-व्रजमें वे सब अभिमान मायाके प्रभावसे स्थूल होकर लक्षित होते हैं। यशोदाका प्रसव, श्रीकृष्णका सूतिकागृह, अभिमन्यु-गोवर्धन आदिके साथ नित्यसिद्धा गोपियोंका विवाहमूलक परकीय अभिमान-यह सब कुछ अत्यन्त स्थूलरूपमें दिखलायी पड़ता है। यह सब कुछ ही योगमायाके द्वारा ही सम्पादित होता है और अत्यन्त सूक्ष्म-मूलतत्त्वसे संयोजित है। इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है और गोलोकके सर्वथा अनुरूप है। शुद्धस्वकीय भाव वैकुण्ठमें विराजमान है। स्वकीयत्व परकीयत्व अचिन्त्यभेदाभेदरूपमें गोलोकमें दिखायी पड़ते हैं। और देखो, आश्चर्यका विषय यह है कि व्रजमें परकीयभाव स्थूल रूपसे होनेपर, पर-दार अर्थात् परायी स्त्रीका सङ्ग दिखायी देनेपर भी उसमें परदारत्व नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्णकी शक्तियाँ उनकी निजशक्ति हैं। अनादिकालसे गोपियोंके साथ श्रीकृष्णका संयोग रहनेके कारण उनका स्वकीयत्व और दाम्पत्य ही सिद्ध होता है। अभिमन्यु आदि केवल उस-उस अभिमानके अवतार विशेष हैं, उन्होंने श्रीकृष्णकी लीलापुष्टिके लिये गोपियोंके पति होकर श्रीकृष्णको उपपतिभावमें व्रजरङ्गका नेता किया है। प्रपञ्चसे अतीत गोलोकमें केवल अभिमानसे ही रसकी सम्पूर्ण पुष्टि हो जाती है। परन्तु प्रपञ्चके अन्तर्गत गोकुलमें विवाहधर्म और उस धर्मके उल्लङ्घनकी प्रतीतिके लिये उस-उस अभिमानकी प्रकटता पृथक् सत्ता (अभिमन्यु आदि) रूपमें योगमायाके द्वारा सम्पादित होती है।" (जैवधर्म) ॥ २९॥ आमिह ना जानि ताहा, ना जाने गोपीगण। दुँहार रूपगुणे दुँहार नित्य हरे मन ॥३०॥ अनुवाद-योगमायाके प्रभावके कारण इसे ना तो मैं जान सकूँगा और ना ही गोपियाँ जान सकेंगी, क्योंकि हमारा मन एक-दूसरेके रूप और गुणोंके द्वारा नित्य आकृष्ट रहेगा ॥ ३० ॥ अनुभाष्य-ईश्वरका उनके वश्य अर्थात् जीवके प्रति जो भाव है, उस भावकी अनुभूतिसे आश्रयके (जीवके) अपने प्रयाससे विषयकी अर्थात् ईश्वरकी चमत्कारिता उत्पादनकी चेष्टासे (ईश्वरकी) उपलब्धि नहीं होती। इसलिये ही योगमायाकी विशेषताओंके वर्णनमें उनको आश्रय-जातिका सहायक बतलाया गया है। विषय और आश्रय, दोनों अपने-अपने भावोंकी अनुभूतिसे एक-दूसरेके भावोंकी प्रतीतिमें अवस्थित होकर आकृष्ट होते हैं। इस लीलावैचित्र्यके सम्बन्धमें भौतिक जगत्में भ्रमणशील (मायाबद्ध) जीव प्रवेश नहीं कर सकते। वैसी अवस्था ना आनेपर अथवा उसमें रुचि उदय होनेसे पहलेतक जीवोंका इसे अनुभव करनेका सौभाग्य उदित नहीं होता है ॥ ३० ॥ धर्म छाड़ि' रागे दुँहे करये मिलन। कभु मिले, कभु ना मिले, दैवेर घटन ॥ ३१ ॥ चौथा अध्याय | १५९
[ ४/३१-३३ अनुवाद-संसारके मर्यादारूपी धर्मको त्यागकर हमारा अनुराग ही हम दोनोंका मिलन करायेगा। योगमायाके प्रभावसे कभी मिलन होगा, तो कभी मिलन नहीं होगा॥३१॥ अनुभाष्य-परस्पर आकर्षणके कारण श्रीकृष्ण और गोपियोंका मर्यादामय वैधधर्मको त्यागकर सभी बाधाओंको पार करते हुए मिलन होता है। एक-दूसरेकी उद्दीपना होनेपर वे अपने सभी वैध कर्त्तव्योंको तत्क्षणात् भूलकर मिलनेके लिये अति उत्कण्ठित हो जाते हैं। मिलनके उत्कर्षकी समृद्धिके लिये कभी-कभी विप्रलम्भ-रसके द्वारा उसकी पुष्टि होती है। प्राकृत जड़जगत् निरानन्द होनेके कारण इसमें विप्रलम्भका अभाव दिखायी देता है, किन्तु अप्राकृत राज्यमें विरहमें पूर्ण तन्मयताके कारण चमत्कारिता समृद्ध होती है। मिलनमें अभिलषित वस्तुको पानेकी उत्कण्ठामें किञ्चित् शिथिलता होती है, परन्तु विरहमें मिलनकी उत्कण्ठा प्रबल होनेके कारण वही अधिक चमत्कारिता उदय कराती है॥३१॥ एइ सब रसनिर्यास करिब आस्वाद। एइ द्वारे करिब सब भक्तरे प्रसाद॥३२॥ अनुवाद-इस प्रकार मैं इन सब रसोंके सारका आस्वादन करूँगा और इन्हीं लीलाओंके द्वारा सभी भक्तोंके ऊपर कृपा करूँगा॥३२॥ व्रजेर निर्मल राग शुनि' भक्तगण। रागमार्गे भजे येन छोड़ि' धर्म-कर्म॥३३॥ अनुवाद-व्रजके इस निर्मल अनुरागके विषयमें श्रवणकर भक्त लोग सभी अनित्य धर्मों-कर्मोंको छोड़कर मेरा रागमार्गमें भजन करेंगे॥३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैकुण्ठादिमें अर्थात् वैकुण्ठ-गोलोकादिमें जिन सब लीलाओंका प्रचार नहीं है, उन-उन लीलाओंका मैं इस कृष्णावतारमें प्रचार करूँगा। उन लीलाओंसे स्वयं मैं भी चमत्कृत हो जाऊँगा। मेरी योगमाया स्वरूप-शक्ति अचिन्त्य प्रभावसे मेरी इच्छासे मेरी नित्यप्रिया गोपियोंके हृदयमें उपपति भावका सञ्चार करेगी। मैं भी उस समय रसकी पुष्टिके लिये उसे जान नहीं पाऊँगा, अर्थात् मेरी अचिन्त्यशक्ति मेरी सर्वज्ञताको गोपन करके उसमें एक प्रकार अद्भुत रस उत्पन्न करेगी और गोपियाँ मेरी स्वरूपशक्ति होनेपर भी उसे नहीं जान पायेंगी। मेरे और मेरी गोपियोंके अद्भुतरूप-गुणोंसे परस्परके मनको हरण करनेपर सामान्य धर्मपथको त्याग करते हुए शुद्ध-रागमार्गमें हम लोगोंमें परस्पर मिलन-सुख उदित होगा; दैव-घटनाकी भाँति कभी मिलन और कभी विच्छेद होगा। मैं इन सभी रसोंके सारका आस्वादन करूँगा और इसे भक्तोंको प्रसन्न होकर दान करूँगा। सभी भक्तोंको उस रसके दान करनेकी प्रक्रिया यह कि मैं व्रजमें जो निर्मल राग प्रकट करूँगा, उसे श्रवण करके भक्तगण अन्य सभी धर्मों-कर्मोंका त्यागकर रागमार्गमें मेरा भजन करेंगे॥२८-३३॥ अनुभाष्य-श्रीलरघुनाथदास गोस्वामीकृत 'मनःशिक्षा' दूसरे श्लोकमें- “न धर्मं नाधर्मं श्रुतिगण-निरुक्तं किल कुरु" अर्थात् “हे मेरे प्यारे मन ! श्रुतियोंमें कथित (पुण्यजनक) धर्म और (पापमूलक) अधर्म कुछ भी मत करो"; और राजा श्रीकुलशेखरकृत 'मुकुन्दमाला-स्तोत्र' पाँचवें श्लोकमें- १६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
४/३२-३४ ] “नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे, यद्यद् भव्यं भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम्। एतत् प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि, त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु॥” अर्थात् “हे भगवन्! धार्मिक कार्योंमें मेरी रुचि नहीं है, ना ही मुझे पृथ्वीका राज्य चाहिये और ना ही मैं इन्द्रिय-भोगोंकी कामना करता हूँ। वे मेरे पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप आते-जाते रहें। भले ही मुझे बार-बार जन्म लेने पड़ें, मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि आपके चरणकमलोंमें मेरी निश्चला भक्ति हो।” आदि श्लोकोंमें उन्होंने स्वधर्मसे अतीत रागभक्तिकी बात लिखी है। (भाः ११/११/३२)— “आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत् स च सत्तमः॥” अर्थात् “जो मेरे द्वारा वेद-शास्त्रोंमें उपदिष्ट स्वधर्मके पालनसे चित्तशुद्धि आदि गुणों और उल्लङ्घनके दोषोंसे अवगत होकर तथा उस प्रकारके सभी धर्मोंको मेरे ध्यानमें बाधा समझकर उन्हें त्यागकर केवल मेरी भक्ति करता है, वह परम सन्त है।”॥३३॥ अमृताणुकणिका—जिन समस्त जातप्रेम-भक्तोंने यथावस्थित देहमें साधनकी पूर्णता लाभकी है, उन्हें नित्यलीलामें प्रवेश करानेके उद्देश्यसे भक्तवत्सल श्रीकृष्ण प्रकटलीलामें उनका गोप गृहमें जन्म कराते हैं। तब वे नित्यसिद्ध परिकरोंका आनुगत्य करके नित्यलीलामें प्रवेशकी योग्यता लाभ करते हैं। प्रकटलीलाके योगसे ही साधनसिद्ध भक्त नित्यलीलामें प्रवेश करते हैं। प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर श्रीकृष्ण जो सब लीलाएँ प्रकट करते हैं, साधक भक्त उन सभी लीलाओंका श्रवण, कीर्तन करके सिद्धिके मार्गमें अग्रसर होते हैं। श्रीकृष्ण जगत्में अवतीर्ण होकर भाग्यवान् साधक भक्तोंको दर्शनादि देकर कृतार्थ करते हैं। इसलिये प्रकटलीला साधक भक्तोंको भी कृतार्थ करनेके लिये है। और जो भजन करनेके इच्छुक हैं, किन्तु साध्य-साधनतत्त्वका निर्णय करनेमें असमर्थ होनेसे किसी एक निर्दिष्ट भजनपथका अनुसरण नहीं कर पाते, श्रीकृष्णकी प्रकटलीलाके असमोर्ध्व माधुर्यकी कथा शास्त्रादिसे अथवा किसी महाजनके मुखसे श्रवणकर अन्य सभी पन्थोंका त्यागकर श्रीकृष्णकी माधुर्यमयी व्रजलीलाकी उपासनाके प्रति लुब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकटलीला भजनोन्मुख भक्तोंको कृतार्थ करने हेतु भी है। और जो विषयोंमें आसक्त साधारण लोग हैं, श्रीकृष्णकी लीलाकी अपूर्व रस-वैचित्रीकी कथा सुनकर वे भी विषयसुखोंकी तुच्छताकी उपलब्धि कर पाते हैं तथा रागानुगा भक्तिके प्रति उनका लोभ जाग्रत हो जाता है। इसलिये प्रकटलीलामें विषयासक्त लोगोंके प्रति भी श्रीकृष्णकी असीम करुणा अभिव्यक्त होती है॥३२-३३॥ रागानुग साधनसिद्ध मुक्त पुरुष ही अप्राकृत रासलीला-श्रवणके अधिकारी :— श्रीमद्भागवत (१०/३३/३६)— अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः। भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥३४॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्ण भक्तोंके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये अपनी नित्य नरदेहको चौथा अध्याय | १६१
[ ४/३४-३५
प्रकटकर चित्तको आकृष्ट करनेवाली विविध प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं, जिसे सुनकर साधारण जीव भी भगवत्-परायण हो जाया करते हैं॥३४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान्ने नरदेह प्रकटकर जिस रासलीलाको प्रकाश किया है, उसे श्रवण करके उसके अधिकारी भक्त उस लीलापरायण होकर उस क्रीड़ाका भजन करेंगे अर्थात् उनकी सेवा करेंगे॥३४॥ अनुभाष्य—राजा परीक्षित्के द्वारा श्रीशुकदेवके निकट श्रीकृष्णकी पारकीया विहारकी यथार्थता और प्रयोजनीयताके सम्बन्धमें प्रश्न करनेपर उसके उत्तरमें शुकदेवजी कह रहे हैं— भक्तानां (रसभेदावस्थितानां हरिजनानां) अनुग्रहाय (कृपावितरणाय) मानुषं देहं (नरोचितं परम् अप्राकृतशरीरम्) आश्रितः (दधत्) तादृशीः क्रीड़ाः भजते (करोति), याः (क्रीड़ाः लीलाः) श्रुत्वा (अन्योऽपि जनः भगवति श्रद्धान्वितो भूत्वा) तत्परः (कृष्णसेवापरायणः) भवेत्। श्लोक-भावानुवाद—विभिन्न रसोंमें स्थित भक्तोंपर कृपा वितरण करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण परम अप्राकृत नरदेह धारण करके विविध अप्राकृत क्रीड़ाएँ करते हैं। उन लीलाओंको सुनकर अन्य व्यक्ति भी भगवान्में श्रद्धावान् होकर श्रीकृष्ण सेवापरायण हो जाते हैं॥३४॥ 'भवेत्' क्रिया विधिलिङ्, सेइ इहा कय। कर्त्तव्य अवश्य एइ, अन्यथा प्रत्यवाय॥३५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उक्त श्लोकमें “भवेत्” पदरूप क्रियामें विधिलिङ् व्यवहार किया है, इसलिये यह निश्चित रूपसे आवश्यक कर्त्तव्य है; अन्यथा अर्थात् नहीं करनेसे प्रत्यवाय अर्थात् दोष होता है॥३५॥ अनुभाष्य—अनन्तलीलामय भगवान्की विविध प्रकाशमूर्तियाँ वैकुण्ठमें नित्य विराजमान हैं। यह देवीधाम उस गोलोक-वैकुण्ठका विकृत छायारूप है। इसलिये गोलोक-वैकुण्ठके अनुरूप इस प्रपञ्चमें भी विचित्रताएँ दिखलायी पड़ती हैं, परन्तु वे नित्य ना होकर खण्डित, तुच्छ, अकल्याणकारी और कालके द्वारा परिवर्तनशील हैं। विषय-विग्रह (भगवान्) के विविध प्रकाश आश्रित जीवोंकी यथोपयोगी सेव्य-सेवाधर्ममें नित्य अवस्थित हैं। वैकुण्ठमें विशुद्धसत्त्व और प्रपञ्चमें मिश्र तथा गुणमय सत्त्व दिखायी देता है। विषय और आश्रयमें नित्यानुभूतिसे विविध लीलावैचित्र्य नित्य वर्तमान होनेसे आश्रयकी उपयोगिताके विचारसे “नरतनु ही भजनका मूल है”, इस वाक्यकी सार्थकता है। इसलिये जगत्में मनुष्य योनिको सभी योनियोंमें सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। आश्रयजातीय जीव प्रपञ्चमें रहते हुए उनके उपयोगी विषय-विग्रहकी सेवामें अधिकार प्राप्त करते हैं। भगवान्के मनुष्यरूपके अतिरिक्त अमानुषिक (मत्स्य, कूर्म, वराहादि) विविध रूप भी हैं। जीवकी जैसी स्वरूपवृत्ति उदय होती है, उसीके अनुसार भजनीय वस्तुके प्रकाशभेदसे लीला-वैचित्र्य होता है। उस लीलावैचित्र्यकी उपयोगिताके विचारसे तारतम्य देखनेपर मनुष्य देहमें ही नित्य लीला-आश्रित भक्तोंपर अधिक कृपा वितरित होती है। ऐसी लीलाएँ जब प्रपञ्चमें प्रकट होती हैं, तब सर्वोत्तम मनुष्य सेव्य-वस्तुकी उन-उन सेवाओंमें उत्साहित होते हैं। भजनकी उन्नत अवस्थामें भजनीय वस्तुकी अनुभूतिके वर्णन-श्रवणसे जीवके
१६२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत