श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४/२६-२९ सम्भव होता है। यह हेतुक और अहैतुक भेदसे दो प्रकारका होता है। श्रीराधिकाकमें कभी किसी कारणसे मान होता हैं और कभी अकारण मान भी होता है। श्रीराधिकाके मान प्रसादनमें श्रीकृष्णको सुख मिलता है, इसलिये उनके सुख विधानके लिये श्रीराधिकाको मान होता है। द्वारकाकी महिषियोंका कान्ताभाव ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित है और वह श्रीकृष्णके लिये उतना तृप्तिदायक नहीं है। इसलिये द्वारकामें महिषियोंके साथ रहते हुए भी श्रीकृष्णका मन गोपियोंकी तीव्र विरह-वेदनासे हाहाकार कर उठता है। ऐश्वर्यज्ञानवशतः श्रीकृष्णके प्रति महिषियोंकी ममता बुद्धि गोपियोंके समान प्रगाढ़ नहीं है। कभी-कभी वे मानवती होती हैं, परन्तु वे श्रीकृष्णका तिरस्कार नहीं कर पातीं, अपितु श्रीकृष्ण ही कभी-कभी उनका तिरस्कार करते हैं। श्रीकृष्ण कहीं उनका त्याग नहीं कर दें, इस आशङ्कासे श्रीकृष्णके तिरस्कार करनेपर शीघ्र ही अपना मान त्याग देती हैं। किन्तु तिरस्कारकी कल्पना भी दूरकी बात है, काकुति-मिनती और यहाँतक कि चरण-धारणके द्वारा श्रीकृष्ण अनेक बार व्रजसुन्दिरियोंके मान-भञ्जनमें समर्थ नहीं होते। इसलिये व्रजसुन्दिरियोंका प्रेम ही इस पयारका लक्ष्य है, महिषियोंका प्रेम नहीं ॥ २६ ॥ एइ शुद्धभक्ति लञा करिमु अवतार। करिब विविधविध अद्भुत विहार ॥ २७ ॥ वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ये लीलार प्रचार। से से लीला करिब याते मोर चमत्कार ॥ २८ ॥ अनुवाद-इस शुद्धभक्तिको लेकर मैं अवतार लूँगा और ऐसी नाना प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करूँगा, जो वैकुण्ठादिमें अर्थात् वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका और मथुरामें भी अज्ञात हैं। मैं ऐसी-ऐसी लीलाओंका प्रकाश करूँगा जिनसे मैं स्वयं भी चमत्कृत हो जाता हूँ ॥ २७-२८ ॥ मो-विषये गोपीगणेर उपपति-भावे। योगमाया करिबेक आपनप्रभावे ॥ २९ ॥ अनुवाद-योगमायाके प्रभावसे प्रेरित होकर गोपियाँ मेरे प्रति उपपति-भावको प्रकाश करेंगी ॥ २९ ॥ अनुभाष्य-मायासे अतीत वैकुण्ठादि लोकोंमें भगवान्का जो सब लीलावैचित्र्य दिखलायी देता है, उसमें स्वयंरूप श्रीकृष्णकी चमत्कारिता नवनवायमान रूपमें नहीं होती। उसके ऊपर स्थित गोलोकमें स्वयंरूप श्रीकृष्ण निजसुख-उद्देश्यसे जिस प्रकारकी लीलाएँ करते हैं, वैसी लीलाओंके उत्कर्षको ऐश्वर्यप्रधान भक्तोंके सामने प्रदर्शन करनेके लिये उन लीलाओंको प्रपञ्चमें प्रकट करनेकी श्रीकृष्णकी इच्छा हुई। आश्रयकी अपने विचारसे विषयके प्रति वैध गौरवकी अपेक्षा होती है, आश्रय अर्थात् गोपियोंका जिनके प्रति गौरव वर्तमान है, उन पतियोंकी वञ्चना और त्यागकर श्रीकृष्ण-अनुरागवशतः ऐश्वर्यरहित माधुर्यके आकर्षणसे आकृष्ट होकर जो चेष्टा देखी जाती है, वह परकीया सेवाप्रवृत्ति योगमायाके द्वारा ही सम्पन्न होती है। ऐसी चिन्मयी मायाका प्रभाव श्रीकृष्णके लिये भी अज्ञेय विषय है, वह उनकी कृपास्वरूपा योगमायाके द्वारा ही सम्भवपर है ॥ २९ ॥ अमृतानुकणा-गोलोकमें शुद्ध चित्-प्रतीति है, वहाँपर जड़-प्रतीति नामकी कोई वस्तु ही नहीं है। चित्शक्तिने रसकी पुष्टिके लिये जिन सभी विचित्र भावोंको वहाँ उदय किया है, उसमें १५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत