श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/२९-३१ ] अनेक स्थानोंपर 'अभिमान' नामक एक सत्ता है। गोलोकमें श्रीकृष्ण अनादि और अजन्मा हैं। तो भी वहाँपर लीलाके सहायक नन्द-यशोदाने पिता-माताके अभिमानके द्वारा वात्सल्यरसको मूर्तिमान किया हुआ है। शृङ्गाररसमें विप्रलम्भ और सम्भोगादि अभिमानके रूपमें वर्तमान हैं। और परकीयभावमें शुद्ध स्वकीयत्व रहनेपर भी परकीय अभिमान और औपपत्य अर्थात् उपपति होनेका अभिमान नित्य वर्तमान हैं। प्रकट-व्रजमें वे सब अभिमान मायाके प्रभावसे स्थूल होकर लक्षित होते हैं। यशोदाका प्रसव, श्रीकृष्णका सूतिकागृह, अभिमन्यु-गोवर्धन आदिके साथ नित्यसिद्धा गोपियोंका विवाहमूलक परकीय अभिमान-यह सब कुछ अत्यन्त स्थूलरूपमें दिखलायी पड़ता है। यह सब कुछ ही योगमायाके द्वारा ही सम्पादित होता है और अत्यन्त सूक्ष्म-मूलतत्त्वसे संयोजित है। इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है और गोलोकके सर्वथा अनुरूप है। शुद्धस्वकीय भाव वैकुण्ठमें विराजमान है। स्वकीयत्व परकीयत्व अचिन्त्यभेदाभेदरूपमें गोलोकमें दिखायी पड़ते हैं। और देखो, आश्चर्यका विषय यह है कि व्रजमें परकीयभाव स्थूल रूपसे होनेपर, पर-दार अर्थात् परायी स्त्रीका सङ्ग दिखायी देनेपर भी उसमें परदारत्व नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्णकी शक्तियाँ उनकी निजशक्ति हैं। अनादिकालसे गोपियोंके साथ श्रीकृष्णका संयोग रहनेके कारण उनका स्वकीयत्व और दाम्पत्य ही सिद्ध होता है। अभिमन्यु आदि केवल उस-उस अभिमानके अवतार विशेष हैं, उन्होंने श्रीकृष्णकी लीलापुष्टिके लिये गोपियोंके पति होकर श्रीकृष्णको उपपतिभावमें व्रजरङ्गका नेता किया है। प्रपञ्चसे अतीत गोलोकमें केवल अभिमानसे ही रसकी सम्पूर्ण पुष्टि हो जाती है। परन्तु प्रपञ्चके अन्तर्गत गोकुलमें विवाहधर्म और उस धर्मके उल्लङ्घनकी प्रतीतिके लिये उस-उस अभिमानकी प्रकटता पृथक् सत्ता (अभिमन्यु आदि) रूपमें योगमायाके द्वारा सम्पादित होती है।" (जैवधर्म) ॥ २९॥ आमिह ना जानि ताहा, ना जाने गोपीगण। दुँहार रूपगुणे दुँहार नित्य हरे मन ॥३०॥ अनुवाद-योगमायाके प्रभावके कारण इसे ना तो मैं जान सकूँगा और ना ही गोपियाँ जान सकेंगी, क्योंकि हमारा मन एक-दूसरेके रूप और गुणोंके द्वारा नित्य आकृष्ट रहेगा ॥ ३० ॥ अनुभाष्य-ईश्वरका उनके वश्य अर्थात् जीवके प्रति जो भाव है, उस भावकी अनुभूतिसे आश्रयके (जीवके) अपने प्रयाससे विषयकी अर्थात् ईश्वरकी चमत्कारिता उत्पादनकी चेष्टासे (ईश्वरकी) उपलब्धि नहीं होती। इसलिये ही योगमायाकी विशेषताओंके वर्णनमें उनको आश्रय-जातिका सहायक बतलाया गया है। विषय और आश्रय, दोनों अपने-अपने भावोंकी अनुभूतिसे एक-दूसरेके भावोंकी प्रतीतिमें अवस्थित होकर आकृष्ट होते हैं। इस लीलावैचित्र्यके सम्बन्धमें भौतिक जगत्में भ्रमणशील (मायाबद्ध) जीव प्रवेश नहीं कर सकते। वैसी अवस्था ना आनेपर अथवा उसमें रुचि उदय होनेसे पहलेतक जीवोंका इसे अनुभव करनेका सौभाग्य उदित नहीं होता है ॥ ३० ॥ धर्म छाड़ि' रागे दुँहे करये मिलन। कभु मिले, कभु ना मिले, दैवेर घटन ॥ ३१ ॥ चौथा अध्याय | १५९