भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

[ ४/३१-३३ अनुवाद-संसारके मर्यादारूपी धर्मको त्यागकर हमारा अनुराग ही हम दोनोंका मिलन करायेगा। योगमायाके प्रभावसे कभी मिलन होगा, तो कभी मिलन नहीं होगा॥३१॥ अनुभाष्य-परस्पर आकर्षणके कारण श्रीकृष्ण और गोपियोंका मर्यादामय वैधधर्मको त्यागकर सभी बाधाओंको पार करते हुए मिलन होता है। एक-दूसरेकी उद्दीपना होनेपर वे अपने सभी वैध कर्त्तव्योंको तत्क्षणात् भूलकर मिलनेके लिये अति उत्कण्ठित हो जाते हैं। मिलनके उत्कर्षकी समृद्धिके लिये कभी-कभी विप्रलम्भ-रसके द्वारा उसकी पुष्टि होती है। प्राकृत जड़जगत् निरानन्द होनेके कारण इसमें विप्रलम्भका अभाव दिखायी देता है, किन्तु अप्राकृत राज्यमें विरहमें पूर्ण तन्मयताके कारण चमत्कारिता समृद्ध होती है। मिलनमें अभिलषित वस्तुको पानेकी उत्कण्ठामें किञ्चित् शिथिलता होती है, परन्तु विरहमें मिलनकी उत्कण्ठा प्रबल होनेके कारण वही अधिक चमत्कारिता उदय कराती है॥३१॥ एइ सब रसनिर्यास करिब आस्वाद। एइ द्वारे करिब सब भक्तरे प्रसाद॥३२॥ अनुवाद-इस प्रकार मैं इन सब रसोंके सारका आस्वादन करूँगा और इन्हीं लीलाओंके द्वारा सभी भक्तोंके ऊपर कृपा करूँगा॥३२॥ व्रजेर निर्मल राग शुनि' भक्तगण। रागमार्गे भजे येन छोड़ि' धर्म-कर्म॥३३॥ अनुवाद-व्रजके इस निर्मल अनुरागके विषयमें श्रवणकर भक्त लोग सभी अनित्य धर्मों-कर्मोंको छोड़कर मेरा रागमार्गमें भजन करेंगे॥३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैकुण्ठादिमें अर्थात् वैकुण्ठ-गोलोकादिमें जिन सब लीलाओंका प्रचार नहीं है, उन-उन लीलाओंका मैं इस कृष्णावतारमें प्रचार करूँगा। उन लीलाओंसे स्वयं मैं भी चमत्कृत हो जाऊँगा। मेरी योगमाया स्वरूप-शक्ति अचिन्त्य प्रभावसे मेरी इच्छासे मेरी नित्यप्रिया गोपियोंके हृदयमें उपपति भावका सञ्चार करेगी। मैं भी उस समय रसकी पुष्टिके लिये उसे जान नहीं पाऊँगा, अर्थात् मेरी अचिन्त्यशक्ति मेरी सर्वज्ञताको गोपन करके उसमें एक प्रकार अद्भुत रस उत्पन्न करेगी और गोपियाँ मेरी स्वरूपशक्ति होनेपर भी उसे नहीं जान पायेंगी। मेरे और मेरी गोपियोंके अद्भुतरूप-गुणोंसे परस्परके मनको हरण करनेपर सामान्य धर्मपथको त्याग करते हुए शुद्ध-रागमार्गमें हम लोगोंमें परस्पर मिलन-सुख उदित होगा; दैव-घटनाकी भाँति कभी मिलन और कभी विच्छेद होगा। मैं इन सभी रसोंके सारका आस्वादन करूँगा और इसे भक्तोंको प्रसन्न होकर दान करूँगा। सभी भक्तोंको उस रसके दान करनेकी प्रक्रिया यह कि मैं व्रजमें जो निर्मल राग प्रकट करूँगा, उसे श्रवण करके भक्तगण अन्य सभी धर्मों-कर्मोंका त्यागकर रागमार्गमें मेरा भजन करेंगे॥२८-३३॥ अनुभाष्य-श्रीलरघुनाथदास गोस्वामीकृत 'मनःशिक्षा' दूसरे श्लोकमें- “न धर्मं नाधर्मं श्रुतिगण-निरुक्तं किल कुरु" अर्थात् “हे मेरे प्यारे मन ! श्रुतियोंमें कथित (पुण्यजनक) धर्म और (पापमूलक) अधर्म कुछ भी मत करो"; और राजा श्रीकुलशेखरकृत 'मुकुन्दमाला-स्तोत्र' पाँचवें श्लोकमें- १६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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