श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/३२-३४ ] “नास्था धर्मे न वसुनिचये नैव कामोपभोगे, यद्यद् भव्यं भवतु भगवन् पूर्वकर्मानुरूपम्। एतत् प्रार्थ्यं मम बहुमतं जन्मजन्मान्तरेऽपि, त्वत्पादाम्भोरुहयुगगता निश्चला भक्तिरस्तु॥” अर्थात् “हे भगवन्! धार्मिक कार्योंमें मेरी रुचि नहीं है, ना ही मुझे पृथ्वीका राज्य चाहिये और ना ही मैं इन्द्रिय-भोगोंकी कामना करता हूँ। वे मेरे पूर्वकृत कर्मोंके फलस्वरूप आते-जाते रहें। भले ही मुझे बार-बार जन्म लेने पड़ें, मेरी एकमात्र अभिलाषा यही है कि आपके चरणकमलोंमें मेरी निश्चला भक्ति हो।” आदि श्लोकोंमें उन्होंने स्वधर्मसे अतीत रागभक्तिकी बात लिखी है। (भाः ११/११/३२)— “आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयादिष्टानपि स्वकान्। धर्मान् सन्त्यज्य यः सर्वान् मां भजेत् स च सत्तमः॥” अर्थात् “जो मेरे द्वारा वेद-शास्त्रोंमें उपदिष्ट स्वधर्मके पालनसे चित्तशुद्धि आदि गुणों और उल्लङ्घनके दोषोंसे अवगत होकर तथा उस प्रकारके सभी धर्मोंको मेरे ध्यानमें बाधा समझकर उन्हें त्यागकर केवल मेरी भक्ति करता है, वह परम सन्त है।”॥३३॥ अमृताणुकणिका—जिन समस्त जातप्रेम-भक्तोंने यथावस्थित देहमें साधनकी पूर्णता लाभकी है, उन्हें नित्यलीलामें प्रवेश करानेके उद्देश्यसे भक्तवत्सल श्रीकृष्ण प्रकटलीलामें उनका गोप गृहमें जन्म कराते हैं। तब वे नित्यसिद्ध परिकरोंका आनुगत्य करके नित्यलीलामें प्रवेशकी योग्यता लाभ करते हैं। प्रकटलीलाके योगसे ही साधनसिद्ध भक्त नित्यलीलामें प्रवेश करते हैं। प्रपञ्चमें अवतीर्ण होकर श्रीकृष्ण जो सब लीलाएँ प्रकट करते हैं, साधक भक्त उन सभी लीलाओंका श्रवण, कीर्तन करके सिद्धिके मार्गमें अग्रसर होते हैं। श्रीकृष्ण जगत्में अवतीर्ण होकर भाग्यवान् साधक भक्तोंको दर्शनादि देकर कृतार्थ करते हैं। इसलिये प्रकटलीला साधक भक्तोंको भी कृतार्थ करनेके लिये है। और जो भजन करनेके इच्छुक हैं, किन्तु साध्य-साधनतत्त्वका निर्णय करनेमें असमर्थ होनेसे किसी एक निर्दिष्ट भजनपथका अनुसरण नहीं कर पाते, श्रीकृष्णकी प्रकटलीलाके असमोर्ध्व माधुर्यकी कथा शास्त्रादिसे अथवा किसी महाजनके मुखसे श्रवणकर अन्य सभी पन्थोंका त्यागकर श्रीकृष्णकी माधुर्यमयी व्रजलीलाकी उपासनाके प्रति लुब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार प्रकटलीला भजनोन्मुख भक्तोंको कृतार्थ करने हेतु भी है। और जो विषयोंमें आसक्त साधारण लोग हैं, श्रीकृष्णकी लीलाकी अपूर्व रस-वैचित्रीकी कथा सुनकर वे भी विषयसुखोंकी तुच्छताकी उपलब्धि कर पाते हैं तथा रागानुगा भक्तिके प्रति उनका लोभ जाग्रत हो जाता है। इसलिये प्रकटलीलामें विषयासक्त लोगोंके प्रति भी श्रीकृष्णकी असीम करुणा अभिव्यक्त होती है॥३२-३३॥ रागानुग साधनसिद्ध मुक्त पुरुष ही अप्राकृत रासलीला-श्रवणके अधिकारी :— श्रीमद्भागवत (१०/३३/३६)— अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमाश्रितः। भजते तादृशीः क्रीड़ा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥३४॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्ण भक्तोंके ऊपर अनुग्रह करनेके लिये अपनी नित्य नरदेहको चौथा अध्याय | १६१