श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/३४-३५
प्रकटकर चित्तको आकृष्ट करनेवाली विविध प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते हैं, जिसे सुनकर साधारण जीव भी भगवत्-परायण हो जाया करते हैं॥३४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये भगवान्ने नरदेह प्रकटकर जिस रासलीलाको प्रकाश किया है, उसे श्रवण करके उसके अधिकारी भक्त उस लीलापरायण होकर उस क्रीड़ाका भजन करेंगे अर्थात् उनकी सेवा करेंगे॥३४॥ अनुभाष्य—राजा परीक्षित्के द्वारा श्रीशुकदेवके निकट श्रीकृष्णकी पारकीया विहारकी यथार्थता और प्रयोजनीयताके सम्बन्धमें प्रश्न करनेपर उसके उत्तरमें शुकदेवजी कह रहे हैं— भक्तानां (रसभेदावस्थितानां हरिजनानां) अनुग्रहाय (कृपावितरणाय) मानुषं देहं (नरोचितं परम् अप्राकृतशरीरम्) आश्रितः (दधत्) तादृशीः क्रीड़ाः भजते (करोति), याः (क्रीड़ाः लीलाः) श्रुत्वा (अन्योऽपि जनः भगवति श्रद्धान्वितो भूत्वा) तत्परः (कृष्णसेवापरायणः) भवेत्। श्लोक-भावानुवाद—विभिन्न रसोंमें स्थित भक्तोंपर कृपा वितरण करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण परम अप्राकृत नरदेह धारण करके विविध अप्राकृत क्रीड़ाएँ करते हैं। उन लीलाओंको सुनकर अन्य व्यक्ति भी भगवान्में श्रद्धावान् होकर श्रीकृष्ण सेवापरायण हो जाते हैं॥३४॥ 'भवेत्' क्रिया विधिलिङ्, सेइ इहा कय। कर्त्तव्य अवश्य एइ, अन्यथा प्रत्यवाय॥३५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उक्त श्लोकमें “भवेत्” पदरूप क्रियामें विधिलिङ् व्यवहार किया है, इसलिये यह निश्चित रूपसे आवश्यक कर्त्तव्य है; अन्यथा अर्थात् नहीं करनेसे प्रत्यवाय अर्थात् दोष होता है॥३५॥ अनुभाष्य—अनन्तलीलामय भगवान्की विविध प्रकाशमूर्तियाँ वैकुण्ठमें नित्य विराजमान हैं। यह देवीधाम उस गोलोक-वैकुण्ठका विकृत छायारूप है। इसलिये गोलोक-वैकुण्ठके अनुरूप इस प्रपञ्चमें भी विचित्रताएँ दिखलायी पड़ती हैं, परन्तु वे नित्य ना होकर खण्डित, तुच्छ, अकल्याणकारी और कालके द्वारा परिवर्तनशील हैं। विषय-विग्रह (भगवान्) के विविध प्रकाश आश्रित जीवोंकी यथोपयोगी सेव्य-सेवाधर्ममें नित्य अवस्थित हैं। वैकुण्ठमें विशुद्धसत्त्व और प्रपञ्चमें मिश्र तथा गुणमय सत्त्व दिखायी देता है। विषय और आश्रयमें नित्यानुभूतिसे विविध लीलावैचित्र्य नित्य वर्तमान होनेसे आश्रयकी उपयोगिताके विचारसे “नरतनु ही भजनका मूल है”, इस वाक्यकी सार्थकता है। इसलिये जगत्में मनुष्य योनिको सभी योनियोंमें सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। आश्रयजातीय जीव प्रपञ्चमें रहते हुए उनके उपयोगी विषय-विग्रहकी सेवामें अधिकार प्राप्त करते हैं। भगवान्के मनुष्यरूपके अतिरिक्त अमानुषिक (मत्स्य, कूर्म, वराहादि) विविध रूप भी हैं। जीवकी जैसी स्वरूपवृत्ति उदय होती है, उसीके अनुसार भजनीय वस्तुके प्रकाशभेदसे लीला-वैचित्र्य होता है। उस लीलावैचित्र्यकी उपयोगिताके विचारसे तारतम्य देखनेपर मनुष्य देहमें ही नित्य लीला-आश्रित भक्तोंपर अधिक कृपा वितरित होती है। ऐसी लीलाएँ जब प्रपञ्चमें प्रकट होती हैं, तब सर्वोत्तम मनुष्य सेव्य-वस्तुकी उन-उन सेवाओंमें उत्साहित होते हैं। भजनकी उन्नत अवस्थामें भजनीय वस्तुकी अनुभूतिके वर्णन-श्रवणसे जीवके
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