भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/३५ ] स्वरूपको प्रकट करनेमें विपुल सहायता होती है। पाँच प्रकारकी स्थायीभाव रतियोंमें सर्वश्रेष्ठ मधुर-रतिका सामग्रीसे योग जिस सर्वश्रेष्ठ रसको प्रकाश करता है, उसके प्रति जिसकी रुचि जाग्रत हुई है, वही उसका अधिकारी है। उस रुचिको जाग्रत करनेकी सुविधाके लिये भगवान् मत्स्य-कूर्म-वराहादि लीलाओंके विनिमयमें रामादि लीलाओंको इस प्रपञ्चमें प्रकट करते हैं। और भी, रामादि नरलीलाओंमें जिस रसकी चमत्कारिता प्रबल नहीं है, वह जीवकी जड़ बुद्धिसे परे होनेपर भी तथा अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी ऐश्वर्य एवं माधुर्य विचारके तारतम्यसे पारकीया मधुर रति अतुलनीय नवनवायमान चमत्कारिताको प्रकाशित करती है। प्राकृत बुद्धिवाले सहजिया लोग श्रीराधा-कृष्णकी अप्राकृत लीलाओंको ना समझनेके कारण उनका अनुकरण करके व्यभिचारमें प्रवृत्त होते हैं। ऐसे व्यभिचारके द्वारा विशुद्धसत्त्वमय गोलोकका वैचित्र्य उद्दिष्ट नहीं होता, अपितु वह उनके चित्तको मलिन करके इन्द्रिय-परायणतामें अधोपतित कराता है। अप्राकृत-लीलामें अधोक्षजकी सेवा वर्तमान है। प्राकृत सहजिया लोग यह बात नहीं समझकर श्रीकृष्णसेवाको भी भोगमय इन्द्रियतर्पण मानकर भ्रमित हो जाते हैं। प्रपञ्चागत भगवत्-लीला कुछ प्राकृत सहजियोंकी विचरण भूमि नहीं है अर्थात् उनका इसमें अधिकार नहीं है। श्रीकृष्णकी रासलीलादि योगमायाके द्वारा सम्पादित होती है और वह भौतिक विचारमें यथारूप परिलक्षित नहीं होती। सहजिया लोग श्रीकृष्णलीलाको नश्वर भोगोंके अन्तर्गत मानते हैं। वे “तत्परत्वेन निर्मलम्” और “तत्परो भवेत्” पदका विकृत अर्थ करके अप्राकृत-तत्त्वको प्राकृत-तत्त्व समझनेकी भूल करते हैं। वे “तादृशी क्रीड़ा” शब्दके अर्थभ्रमसे इन्द्रिय-तर्पणमें निमग्न होते हैं, किन्तु वास्तवमें अप्राकृत रति ही “तादृशी” शब्दका मुख्य अर्थ है। अविद्याग्रस्त हरिविमुख जीव अप्राकृत क्रीड़ाको नहीं समझकर अपनी प्राकृत बुद्धिके द्वारा जड़भोगमें उन्मत्त होकर इस श्लोकके अर्थका अनर्थ करते हैं। साधन और सिद्धिकी भूमिकामें विवर्त्त उपस्थित होनेपर ही अर्थात् साधनकी अवस्थामें स्वयंको सिद्ध समझनेपर ही जीव प्राकृत-सहजिया हो पड़ता है। विधिलिङ्का “भवेत्” शब्द देखकर किसीको केवल रुचिके द्वारा प्राप्य इस रागानुग पथको अधिकारका विचार किये बिना अनर्थयुक्त भोगियोंका ही वैधपथ नहीं समझना चाहिये। प्रपञ्चमें कर्त्तव्य (नैतिकता) और अकर्त्तव्य (अनैतिकता) का विचार होता है। गोलोक-वृन्दावनमें इस प्रकारका कोई नियम नहीं होता। वहाँ केवल लोभके वशीभूत होकर अनुरागके पथपर सभी आश्रित-तत्त्व श्रीकृष्ण-प्रीतिरूप रसका अनुसन्धान करते हैं। यदि कोई जीवात्माके नित्य और अवश्य सेव्य प्रपञ्चागत परमश्रेष्ठ मधुरभावके प्रति उदासीन होता है, तो वह निश्चितरूपसे ही भगवत्सेवाको छोड़कर नश्वर व्यभिचारमें अधःपतित होगा। मधुररतिमें तत्पर ना होनेपर जीवका मधुर-रतिके विपरीत जड़भोगवाद प्रबल हो जायेगा। इसी प्रकार वात्सल्यरतिसे श्रीकृष्णसेवासे विमुख होनेपर भोगप्रवृत्ति उसको नश्वर पुत्र-मोहमें अधोपतित करेगी। उसी प्रकार श्रीकृष्णको एकमात्र बन्धु ना माननेसे इन्द्रियपरायण नश्वर बन्धुगण आकर जीवको अधोपतित करेंगे। उस प्रकार भगवत्-विमुखता उपस्थित होनेपर जीव श्रीकृष्णसेवासे उदासीन होकर भोगपर इन्द्रियसेवी नश्वर देहकी सेवा करते-करते स्वरूप-विभ्रान्त चौथा अध्याय | १६३