श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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हो जायेगा। इसी प्रकार श्रीकृष्णमें निरपेक्ष बुद्धि ना होनेसे जीव श्रीकृष्णविमुख होकर जड़वस्तुसे निरपेक्ष अर्थात् ब्रह्ममें लीन एक पत्थरकी भाँति मोक्ष या निर्वाणका दास होकर निर्विशेषवादी हो जायेगा। श्रीकृष्णलीलामें प्रवेश करनेमें जिनकी उदासीनता होगी, उनकी ही इन्द्रिय-परायण भोगबुद्धि और उसके परिणामस्वरूप सत्कर्म और कुकर्ममें औपाधिक अस्मिता (देहमें 'मैं' और देह-सम्बन्धी वस्तुओंमें 'मेरा' का भाव) समृद्ध होकर परम कल्याणसे वञ्चित करेगी॥ ३५॥ अमृताणुकणिका - 'तत्परः' - भगवत्परायण अथवा लीलापरायण। परायण-पर (श्रेष्ठ) + अयन (गति या आश्रय); अर्थात् श्रेष्ठ गति अथवा आश्रय जिसका। इसलिये 'तत्परः' का अर्थ 'लीलाअनुष्ठानमें रत' नहीं है। जीव भगवत्-लीला-अनुष्ठानमें रत नहीं हो सकता, क्योंकि जीव भगवान् नहीं है। भगवान् स्वरूपशक्तिके सङ्गमें लीला करते हैं, किन्तु स्वरूपशक्तिके सङ्ग बद्धजीवकी क्रीड़ा सम्भव नहीं है। और 'तत्परः' शब्दका अर्थ 'भगवत्-लीलाके अनुकरणमें रत' भी नहीं है, क्योंकि भगवत्-लीलाका अनुकरण जीवके लिये निषिद्ध है। रासलीलाके प्रसङ्गमें श्रीशुकदेवने कहा (भाः १०/३३/३१)- “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः। विनश्यत्याचरन्मौढ्याद्यथा रुद्रोऽब्धिजं विषम्॥” अर्थात् “श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये। यदि मूर्खतावश कोई ऐसा करता है, तो उसका विनाश अनिवार्य है। जैसे शिवके अतिरिक्त अन्य कोई हलाहल विषपान करे, तो उसका विनाश अवश्यम्भावी है।” यदि कहें उक्त रीतिसे परकीया प्रेम और औपपत्य रसका उत्कर्ष सिद्ध करनेसे तो सभी लोगोंका कल्याणके स्थानपर महान अकल्याण ही होगा। उनका इहलोक और परलोक, दोनों नष्ट हो जायेंगे। इस शङ्काके समाधान हेतु उत्तर देते हैं (उः नीः ३/२४)- “वर्तितव्यं शमिच्छद्भिर्भक्तवन्न तु कृष्णवत्। इत्येवं भक्तिशास्त्राणां तात्पर्यस्य विनिर्णयः॥” अर्थात् “अपना कल्याण चाहने वाले व्यक्तियोंको भक्तके समान आचरण करना चाहिये, श्रीकृष्णकी भाँति नहीं। यही समस्त भक्ति शास्त्रोंका निर्णयात्मक तात्पर्य है।” इस श्लोककी टीकामें श्रीजीव गोस्वामी लिखते हैं- “शृङ्गाररसकी बात तो दूर रहे, अन्य रसोंमें भी श्रीकृष्णके भाव अनुकरणीय नहीं हैं।” श्रीकृष्णवत् आचरण निषेध करके भक्तवत् आचरणकी विधि कही गयी है। अर्थात् वैष्णवजन जैसा आचरण करते हैं, उनके समान ही वैसा आचरण करना चाहिये। इसपर शङ्का हो सकती है कि भक्त दो प्रकारके होते हैं - सिद्ध और साधक, तो किन भक्तोंके आचरणका अनुसरण करें? इसके उत्तरमें कहते हैं-सिद्धोंका नहीं, साधकोंका अनुसरण करना चाहिये। लीलाविष्ट अवस्थामें प्रेमवैवश्य-वशतः अनेक बार सिद्ध कोटिके भक्तोंका आचरण प्रायः श्रीकृष्णके आचरण-तुल्य हो जाता है, जैसे रासस्थलीसे श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर गोपियाँ श्रीकृष्णके आचरणका अनुकरण करने लगीं। साधक कोटिके भक्तोंका आचरण भी सर्वथा अनुकरणीय नहीं है। साधकोंमें भी दुराचारी मिल जाते हैं, जैसे (गीता ९/३०) में भगवत्-वाक्य है 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।'
१६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत