श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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अर्थात् अनन्य भावसे भजन करनेवाले साधक भक्तोंमें कभी-कभी परधन-अपहरण, परस्त्रीगमनादि सुदुराचार दिखलायी देता है; उनका यह निन्दनीय आचरण अनुकरणीय नहीं है। तो क्या सिद्ध और साधक भक्त, दोनों ही हमारे लिये अनुसरणीय नहीं हैं? नहीं, ऐसा नहीं कहना चाहिये। विचारपूर्वक आचार्योंने सिद्धान्त किया है कि जो सभी भक्त भक्ति-शास्त्रोंकी विधियोंका पालन करते हैं, उनका भक्ति-शास्त्रानुमोदित आचरण ही अनुसरणीय है। यहाँ एक और प्रश्न हो सकता है—गीतामें श्रीकृष्णने कहा—'श्रेष्ठ व्यक्ति जो-जो करते हैं, साधारण लोग उसका अनुसरण करते हैं; त्रिलोकमें मेरे लिये कोई भी कर्म नहीं है, किन्तु मैं यदि कोई कर्म नहीं करूँ, तो मेरा अनुसरण करके लोग भी कर्म नहीं करेंगे और समाजमें व्यभिचार फैलेगा। इसलिये लोगोंके मङ्गलके लिये अनासक्त भावसे कर्म करना उचित है।' इन सभी उक्तियोंसे यह समझा जाता हैं कि श्रीकृष्णका आचरण अनुकरणीय हैं। जब आदर्शकी स्थापनाके लिये वे कर्म करते हैं, तब उनका आचरण अनुकरणीय क्यों नहीं है? इसका उत्तर यह है कि श्रीकृष्ण किस प्रकारके कर्मकी बात कर रहे हैं, इसका विवेचन आवश्यक है। स्वजनोंके वधके भयसे अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे। गीताके द्वितीय अध्यायमें श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा कि तुम क्षत्रिय हो और युद्ध करना तुम्हारा स्वधर्म है तथा धर्मयुद्धमें स्वजनोंका वध पाप नहीं है। तृतीय अध्यायमें यही बात अन्य प्रकारसे कही है। यहाँपर भी स्वधर्म अथवा वर्णाश्रम-धर्मकी बात कही है। भागवतमें कहा गया है कि जब तक कर्मोंसे निर्वेद अवस्था नहीं आती, किम्वा भगवत्-कथादिमें श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, तब तक कर्म करना चाहिये। कर्मोंसे निर्वेद अवस्था उत्पन्न होनेपर लोग ज्ञानमार्गका साधन और तत्पश्चात् भगवत्-कथामें रुचि उत्पन्न होनेपर भक्तिमार्गके साधनका अवलम्बन करेंगे। इससे पूर्व कर्म करनेका विधान इसलिये किया गया है कि यथायथ भावसे कर्मानुष्ठानसे चित्त शुद्धिकी सम्भावना है, चित्तशुद्धि होनेपर किसी भाग्यसे भक्तिमार्गके अनुष्ठानमें रति उत्पन्न हो सकती है। गीता ३/१७में आगे कहा है— “यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥” अर्थात् “जो व्यक्ति आत्माराम हैं और आत्मामें ही तृप्त रहनेवाले हैं एवं आत्मामें ही सन्तुष्ट हैं, उनके लिये कोई कर्त्तव्य कर्म नहीं हैं।” किन्तु लोग उनकी आन्तरिक दशाको नहीं समझकर उनके बाह्य आचरणका अनुसरण करेंगे, इसलिये ऐसे आत्माराम पुरुष भी लोक कल्याणके लिये कर्मका आचरण करते हैं। श्रीकृष्णका जन्म और कर्म दिव्य हैं, वे अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, उनका जन्म किसी कर्मके फलसे नहीं है, वे स्वेच्छासे जन्म ग्रहण करते हैं। स्वरूपतः उनका कोई वर्णाश्रम भी नहीं है, इसलिये वर्णाश्रमोचित धर्म उनका नहीं है। वर्णाश्रमोचित कर्म बद्धजीवोंकी चित्तशुद्धि और समाजके मङ्गलके लिये हैं। ये श्रीकृष्णके लिये नहीं हैं, तो भी जब वे नरलीला करनेके लिये जगत्में अवतीर्ण होते हैं, वे क्षत्रियकुलमें आविर्भूत होकर गृहस्थाश्रमका अभिनय करते हैं। इसलिये वे वर्णाश्रमोचित जो-जो कर्म, जैसे द्वारकामें वे कहीं होम करते, कहीं पञ्चसूना-यज्ञ करते, सन्ध्या-वन्दनादि करते हुए दिखलायी देते हैं, वह केवल आदर्श-स्थापना
चौथा अध्याय | १६५