श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/३५-४०
और लोक-संग्रहके लिये है। इन्हीं कर्मोंका उन्होंने गीताके दूसरे और तीसरे अध्यायमें वर्णन किया है, भक्तोंके साथ उनकी आनन्दमयी क्रीड़ारूपी लीलाका नहीं। किन्तु 'अनुग्रहाय भक्तानामादि' श्लोकोंमें उनकी लीलाओंका वर्णन है। वे रसिकशेखर हैं, वे लीलाओंके द्वारा अपने प्रेमीभक्तोंके साथ रसास्वादन करके आनन्द अनुभव करते हैं और भक्तोंको भी आनन्द प्रदान करते हैं। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है, इसलिये दासोचित सेवाका भाव चित्तमें स्फुरित करानेके लिये श्रीकृष्णकी लीलाओंके श्रवण-कीर्तनादि साधनभक्तिका अनुष्ठान ही जीवका कर्तव्य है। इसके विपरीत कुछ भी करनेपर श्रीकृष्ण-दासत्व स्फुरित होनेकी कोई भी सम्भावना नहीं है। श्रीकृष्णकी लीलाके अनुकरणसे केवलमात्र अपराध ही सञ्चित होंगे। विशेषतः लीलानुकरण साधनभक्तिका अङ्ग है, ऐसा किसी भी शास्त्रमें नहीं कहा गया है; इसलिये लीलानुकरणसे भक्तिदेवीकी कृपा प्राप्त करनेकी सम्भावना भी नहीं है, अपितु शास्त्रादेश-उल्लङ्घनजनित अपराध ही होंगे। श्रीमद्भागवत और अन्यान्य शास्त्रोंमें सर्वत्र ही श्रीकृष्ण कथा श्रवण करनेका महात्म्य ही वर्णित हुआ है, लीलानुकरणका कहीं भी उल्लेख नहीं है॥ ३५॥ रागमयी भक्तिके प्रचारकी इच्छा ही श्रीगौरावतारका मुख्य कारण :- एइ वाञ्छा यैछे कृष्णप्राकट्य-कारण। असुरसंहार-आनुषङ्ग प्रयोजन॥ ३६॥ धर्मकी स्थापनादि स्वयंरूप श्रीकृष्ण या श्रीगौरका मुख्य कार्य नहीं :- एइ मत चैतन्य-कृष्ण पूर्ण भगवान्। युगधर्मप्रवर्त्तन नहे ताँर काम॥ ३७॥ अनुवाद-जिस प्रकार प्रेमरस-निर्यायसका आस्वादन और रागमार्गकी भक्तिके प्रचारकी इच्छाएँ ही श्रीकृष्णके प्रकट होनेका मुख्य कारण है तथा असुरोंका संहार तो केवल आनुषङ्गिक प्रयोजन है, उसी प्रकार श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु स्वयं-भगवान् हैं, नामसङ्कीर्त्तनरूप युगधर्मकी स्थापना इनका कार्य नहीं है॥ ३६-३७॥ स्वांश युगावतारके साथ अवतारीका मिलन :- कोन कारणे यबे हैल अवतारे मन। युगधर्मकाल हैल से काले मिलन॥ ३८॥ अनुवाद-जिस-किसी कारणसे जब स्वयं-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अवतार लेनेकी इच्छा हुई, तब युगधर्म-काल उस कालमें मिल गया॥ ३८॥ गुह्य और बाह्य कारणसे अवतीर्ण होकर स्वयं आचार और प्रचार :- दुइ हेतु अवतरि' लञा भक्तगण। आपने आस्वादे प्रेम-नाम-सङ्कीर्त्तन॥ ३९॥ सेइ द्वारे आचण्डाले कीर्त्तन सञ्चारे। नाम-प्रेममाला गाँथि पराइल संसारे॥ ४०॥ अनुवाद-अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग, इन दो कारणोंसे स्वयं-भगवान् अपने भक्तोंको लेकर
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