श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४/३६-४१ ] अवतरित हुए और भक्तोंके साथ स्वयं प्रेम एवं नामसङ्कीर्त्तनका आस्वादन किया तथा इसके द्वारा उन्होंने कीर्त्तनका प्रचारकर चण्डाल जैसे नीच लोगोंको भी प्रेमदान किया। उन्होंने नाम-प्रेमरूपी मालाको गूँथकर सम्पूर्ण संसारको पहनायी ॥ ३९-४० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णावतारमें जिस प्रकार उक्त अभिलाषाके लिये श्रीकृष्ण प्रकट हुए थे और असुर-संहार उनका मूलप्रयोजन ना होकर केवल आनुषङ्गिक प्रयोजन था, उसी प्रकार गौरावतारमें श्रीकृष्णचैतन्य पूर्णतम भगवान् हैं। नामसङ्कीर्त्तनरूप युगधर्मकी स्थापना उनका अपना कार्य नहीं था, परन्तु किसी गूढ़ कारणके लिये जब पूर्ण भगवान्ने अवतीर्ण होनेके लिये इच्छा की, तो घटनाक्रमसे उसी समय युगधर्मकाल भी आकर उपस्थित हो गया। इसलिये श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके गूढ़ अन्तरङ्ग प्रयोजन और युगधर्म प्रचाररूप बाह्य प्रयोजन-इन दो कारणोंसे अवतीर्ण होकर उन्होंने प्रेम और नामसङ्कीर्त्तनका भक्तोंके साथ आस्वादन किया ॥ ३६-३९ ॥ एइमत भक्तभाव करि' अङ्गीकार। आपनि आचरि' भक्ति करिल प्रचार ॥ ४१ ॥ अनुवाद-इस प्रकार उन्होंने भक्तभावको अङ्गीकार करके स्वयं आचरण किया और भक्तिका प्रचार भी किया ॥ ४१ ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णने अपनी औदार्यलीलाको प्रकट करनेकी इच्छासे अपनी नित्य गौरलीलाको इस प्रपञ्चमें प्रकाशित किया। नित्य गौरलीलामें श्रीकृष्णका भक्तभाव ही उनकी नित्यलीलाकी चमत्कारिता है। स्वयंरूप श्रीकृष्णने नित्यगौरलीलाको इस प्रपञ्चमें प्रकट करके सेव्य श्रीकृष्णकी सेवाको जीवके लिये सुलभ किया है। प्राकृत-साहजिक लम्पट-सम्प्रदायके लोग अप्राकृत विप्रलम्भके स्वरूपज्ञानको नहीं जानते हैं। श्रीगौरसुन्दरने जिस कारणसे भक्तभावको अङ्गीकार किया, उसका खण्डन करके वे उन्हें अवैधरूपसे सम्भोगविग्रह 'नागर' कहकर स्वयंको “नदीय-नागरी” या “गौरनागरी” आदि काल्पनिक शब्दोंसे भूषित करते हैं। इस प्रकार नित्य विप्रलम्भ रसके भक्त अथवा आश्रय-जातीय भावोंको विलुप्तकर वे लोग जो कुकर्म करते हैं, उससे स्वयंरूप श्रीकृष्ण कभी सन्तुष्ट नहीं होते हैं। स्वयंरूप श्रीगौरविग्रह उन सभी प्राकृत भोगपरायण साहजिकगणोंपर कृपा करनेके बदले बहुत दूरसे उनका त्याग कर देते हैं। उनका श्रीकृष्णलीलाके सम्भोग विचारसे विप्रलम्भ-रस-लीलामय कृष्णभक्तिके विनाशका प्रयास श्रीगौरसुन्दरसे विद्वेषके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ॥ ४१ ॥ अमृतानुकणिका-श्रीकृष्णके औदार्यमय गौरावतारका वैशिष्ट्य यह है कि इस बार साधारण जीवोंको, यहाँ तक पापियोंको भी अपने भजनकी शिक्षा देनेके लिये स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण जगत्में अवतीर्ण हुए हैं। इस बार भगवान् द्वापर युगकी भाँति केवल “मामेकं शरणं व्रज” नहीं कह रहे हैं। अपितु क्या करनेसे उनके शरणागत हुआ जायेगा, हाथ पकड़कर वह शिक्षा देनेके लिये अपनी अचिन्त्य-शक्तिबलसे भक्तभाव अङ्गीकार करके अवतीर्ण हुए हैं। कोई लोग तर्क करके कह सकते हैं कि श्रीचैतन्यदेवके भक्तोन्मत्त भाव साधारण लोगोंके लिये अनुसरणीय नहीं हैं। इस प्रसङ्गमें वे श्रीचैतन्यदेवके श्रीनृसिंह अथवा श्रीवराह अवतारके भाव-प्रदर्शनका दृष्टान्त उल्लेख करते हैं, परन्तु यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि श्रीमन्महाप्रभुका श्रीनृसिंह चौथा अध्याय | १६७