भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ४/४१-४४

अथवा श्रीवराह अवतारका भाव-प्रदर्शन भक्तोन्मत्त भाव नहीं है। वह तो श्रीगौरनारायणका आत्मस्वरूप-ऐश्वर्य-प्रकाश-लीला है। भक्तभावसे कोई कभी भी अपनेमें श्रीकृष्ण, श्रीनृसिंह, श्रीवराह, श्रीराम आदि विष्णुतत्त्व होनेका अभिमान नहीं करता। भक्तोंमें विष्णुके दास या दासानुदासके अतिरिक्त अन्य कोई अभिमान नहीं है। “नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः” (भागवत १०/३३/३०) अर्थात् जीव कभी भी अपनेको मनके द्वारा भी ब्रह्म होनेकी कल्पना ना करे। क्योंकि जीव अनीश्वर अथवा वश्य-तत्त्व है। अनीश्वर होकर जो मूढ़तावशतः अपनेको ईश्वर मानते हैं, वे निश्चय ही विनष्ट हो जाते हैं। एकछत्र भोक्ता-तत्त्व भगवान् श्रीकृष्णकी रासादि-लीला, भगवान् बलदेवकी मद्यपान-लीला, द्वारकाधीशकी सोलह हजार महिषियोंसे विवाहकी लीला आदि भोग्य और वश्य जीवके लिये अनुकरणीय नहीं है। किन्तु श्रीकृष्ण और श्रीबलदेवने लोकशिक्षाके लिये सान्दीपनी मुनिके आश्रममें रहकर जो वेदाध्ययन और गुरुसेवाका आदर्श उन्होंने दिखलाया है, वहाँ यदि कोई उपरोक्त श्लोकका प्रयोग करके श्रीराम-कृष्णके आदर्शके अनुसरणसे विमुख हो जाय, तब उसे मन्दभाग्य ही कहा जायेगा। भगवान्की लोकशिक्षाके उद्देश्यसे की गयी लीलाओंका अवश्य अनुसरण करना चाहिये। अनर्थयुक्त जीव भगवान् श्रीगौरसुन्दर अथवा श्रीनित्यानन्द प्रभुके जैसे स्त्रीके स्वामी होनेकी इच्छा करके माल्य, चन्दन, ताम्बूल आदि भोग करनेकी स्पृहा करके परम अनर्थ-सागरमें पतित होंगे। किन्तु लोक-शिक्षक श्रीगौर-नित्यानन्दके द्वारा आचरित और प्रचारित विष्णु-वैष्णव-सेवा, सर्वात्माके द्वारा सब समय श्रीकृष्ण-अनुसन्धानके आदर्शको ग्रहण ना करनेके कारण श्रीगौरसुन्दरकी अहैतुकी-महावदान्यतारूपी गङ्गाके तटपर अवस्थित रहकर भी माया मरीचिकाके द्वारा ही भ्रान्त होंगे-ऐसा समझना चाहिये॥४१॥ शान्तके अतिरिक्त चारों रसोंके आश्रयवर्गकी श्रीकृष्णप्रीति ही काम्य :- दास्य, सख्य, वात्सल्य, आर ये शृङ्गार। चारि प्रेम, चतुर्विध भक्तइ आधार ॥४२॥ भक्तगण अपने-अपने रसकी श्रेष्ठता मानते हैं :- निज निज भाव सबे श्रेष्ठ करि' माने। निजभावे करे कृष्णसुख-आस्वादने ॥ ४३ ॥ निरपेक्ष विचारसे अप्राकृत मधुररसमें अन्यान्य रस अन्तर्भुक्त होनेपर श्रीकृष्णप्रीतिचेष्टा सर्वापेक्षा अधिक :- तटस्थ हइया हृदि विचार यदि करि। सब रस हैते शृङ्गारे अधिक माधुरी ॥ ४४ ॥ अनुवाद-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर, ये चार प्रकारके रस हैं। चार प्रकारके भक्त इन रसोंमें प्रेमके आधार हैं। अपने-अपने भावको सभी भक्त श्रेष्ठ मानते हैं और अपने भावोंसे श्रीकृष्णकी सेवाकर उनके सुखमें स्वयं सुखका आस्वादन करते हैं। परन्तु निरपेक्ष होकर हृदयमें यदि विचार किया जाय, तो सभी रसोंसे शृङ्गार (मधुर) रसमें माधुर्य अधिक है॥४२-४४॥

१६८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत