भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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४/४२-४६ ] अमृतप्रवाह भाष्य-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-इन चार प्रकारके रसोंके भक्तोंमें प्रत्येकको अपने-अपने द्वारा कृष्णसुखास्वादन सर्वश्रेष्ठ लगता है, किन्तु तटस्थ अर्थात् निरपेक्ष होकर देखनेसे मधुर अर्थात् शृङ्गाररसकी माधुरी अन्य तीन रसोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ माननी होगी ॥ ४२-४४॥ दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें उत्तरोत्तर श्रीकृष्ण-सुखास्वादनका आधिक्य :- भक्तिरसामृतसिन्धु (२/५/३८)- यथोत्तरमसौ स्वादविशेषोल्लासमप्यपि। रतिर्वासनया स्वाद्धी भासते कापि कस्यचित् ॥ ४५ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४५ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-उल्लासमयी रति उत्तरोत्तर आस्वादन-विशेष प्रतीत होती है। वही रति स्थान-विशेषपर वासनाक्रमसे परमास्वादनीय होकर मधुर-रसरूपमें प्रकाश पाती है ॥ ४५ ॥ अनुभाष्य-असौ रतिः यथोत्तरम् (उत्तरोत्तरक्रमेण) स्वादविशेषोल्लासमयी (मधुरविशेषस्य आधिक्यवती) अपि वासनया (वासनाभेदेन) का अपि (रतिः) कस्यचित् (भक्तस्य) स्वाद्धी भासते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ४५ ॥ मधुर रसमें दो प्रकार स्थिति, स्वकीया और परकीया :- अतएव मधुर रस कहि तार नाम। स्वकीया-परकीया-रूपे द्विविध संस्थान ॥ ४६ ॥ अनुवाद-इसलिये इसका नाम मधुर रस है। यह दो प्रकारका होता है, एक स्वकीया और दूसरा परकीया ॥ ४६ ॥ अनुभाष्य-उज्ज्वलनीलमणिमें श्रीरूप गोस्वामीने स्वकीया और परकीयाकी इस प्रकार परिभाषा दी है। स्वकीया कृष्णवल्लभा- “करग्राह विधिं प्राप्ताः पत्युरादेशतत्पराः। पातिब्रत्यादविचलाः स्वकीयाः कथिता इह ॥ ” अर्थात् “शास्त्रकी विधिके अनुसार जिनका पाणिग्रहण हुआ है, पतिके आदेश पालनमें जो सदा तत्पर रहती हैं और पातिव्रत्य-धर्मसे कभी विचलित नहीं होतीं, रसशास्त्रमें उनको 'स्वकीया' नारी कहा गया है।” परकीया कृष्णवल्लभा,- “रागेणैवार्पितात्मानो लोकयुग्मानपेक्षिणा। धर्मेणास्वीकृता यास्तु परकीया भवन्ति ताः ॥” अर्थात् “पर-पुरुषके अनुरागसे आकृष्ट होकर जो आत्मसमर्पण करती हैं और इस प्रकारका यौनसम्बन्ध धर्मशास्त्रविधिके द्वारा अस्वीकृत जानकर भी इस लोक और परलोकमें किसी भी असुविधाकी चिन्ता नहीं करती हैं, उनको 'परकीया रमणी' कहा जाता है।”॥४६॥ अमृतानुकणिका-सभी अप्राकृत रसोंके मध्य श्रीकृष्णका मधुररस अपार, अतुल, असमोध्र्व है। किन्तु श्रीकृष्णके दो असीम गुण जीवके पक्षमें बड़े ही उपादेय हैं। एक-उनकी सर्वशक्तिमत्ता और दूसरा-उनकी निरङ्कुश इच्छा। अपनी सर्वशक्तिमत्ताके प्रभावसे वे अपार, असमोध्र्व तत्त्वको चौथा अध्याय | १६९