भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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अनायास ही प्रपञ्चमें ला सकते हैं। अपनी निरङ्कुश इच्छा-प्रभावसे वे तुच्छ प्रपञ्चमें उनके सर्वोत्कृष्ट तत्त्व प्रकाश करनेकी इच्छा करते हैं और प्रपञ्चकी हेयता और न्यूनतासे सम्पूर्ण रूपसे अस्पृष्ट रहकर भी ये सभी सर्वोत्कृष्ट तत्त्व प्रेमाञ्जनयुक्त भक्तिनेत्रोंवाले भक्तोंके अप्राकृत दर्शनके विषयीभूत होते हैं। विशेषतः कलियुगके जीवोंके सौभाग्यकी पराकाष्ठाकी बात तो सम्पूर्ण रूपसे कही नहीं जा सकती। क्योंकि इस युगमें स्वयं माधुर्य-विग्रह श्रीकृष्ण अपनी अपूर्व लीलारसका वितरण करनेके लिये औदार्यमय विग्रह रूपमें प्रकटित हुए हैं। और जीवोंके सौभाग्यका पथ इस युगमें ऐसे सहज भावसे आविष्कृत हुआ है कि स्वयं विषय (श्रीकृष्ण) सर्वश्रेष्ठ आश्रय (श्रीराधा) के भावोंको लेकर लोक-शिक्षक हुए हैं। 'आत्म' और 'पर'–ये दो तत्त्व हैं। आत्मनिष्ठ धर्म ही–आत्मारामता है, उसमें रसकी पृथक् सहायता नहीं है। किन्तु पररामता धर्ममें रसविचित्रता और रसोत्कर्षके लिये अनेक प्रकारकी पृथक् सहायताका अवस्थान है। आत्मारामता और पररामता, दोनों नित्य व्यापार हैं। श्रीकृष्ण एक ओर 'आत्माराम' और दूसरी ओर वैसे ही 'परराम' हैं। इस प्रकारके विरुद्धधर्मका समन्वय अचिन्त्यशक्तियुक्त लीलापुरुषोत्तमके पक्षमें स्वाभाविक ही है। श्रीकृष्णलीलाके एक केन्द्रमें आत्मारामता, और उसके विपरीत केन्द्रमें पररामताकी पराकाष्ठारूप परकीयता है। आत्मारामताकी दिशामें अग्रसर होनेसे क्रमशः रसकी निरपेक्षता और शुष्कता प्रकट होती है। और परकीयकी दिशामें अग्रसर होनेपर साथ-साथमें रसकी अधिकतर प्रफुल्लता प्रकट होती है। (भाः १०/३३/१६)–“रेमे रमेशो व्रजसुन्दरीभिर्यथार्भकः स्व-प्रतिबिम्ब-विभ्रमः॥” (भाः १०/३३/१९)–“रेमे स भगवान्स्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया॥” (भाः १०/३३/२५)–“सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतः”, इन भागवतीय वचनोंके द्वारा यह स्पष्ट ही प्रतीत होता है कि 'आत्मारामता' ही श्रीकृष्णका निजधर्म है। श्रीकृष्ण अद्वयतत्त्व हैं और उनकी शक्तियाँ अनन्त हैं (परस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते—श्वेताश्वतर ६/८)। वे सभी शक्तियाँ रूपवती होकर आत्माराम श्रीकृष्णको क्रीड़ा कराती हैं। श्रीकृष्णकी एक पराशक्ति ही रसविलासके लिये अनन्तशक्ति रूपमें प्रकाशित होती है। ये अनन्तशक्तियाँ पराशक्तिका कायव्यूह या विस्तार हैं। रासक्रीड़ामें श्रीकृष्ण जितनी संख्यामें हैं, गोपीशक्ति भी उसी संख्यामें प्रकाशित होती है। सभी श्रीकृष्ण ही हैं, किन्तु चित्शक्ति योगमाया श्रीकृष्णकी इच्छासे श्रीकृष्णको और गोपियोंको पृथक् प्रकट करती है, लीला-पोषणके लिये सभीको पृथक् भावसे सजाती है और रसपोषणके लिये परस्पर पारकीय सम्बन्धका ज्ञान प्रदान करती है। अचिन्त्य चित्शक्तिका यह अचिन्त्य कार्य क्षुद्रजीव अथवा ब्रह्मादि अधिकारिक देवताओंकी बुद्धिके भी अगम्य है। श्रीकृष्ण ऐश्वर्यमय चित्-जगत्में आत्मशक्तिको लक्ष्मीरूपमें प्रकट करके स्वकीय बुद्धिसे रमण करते हैं। यह स्वकीय बुद्धि प्रबल होनेसे दास्यरस पर्यन्त ही वहाँपर रसकी सुन्दर गति है अर्थात् उस स्थानका मधुररस-सादृश्य भी दास्यके स्तरपर स्थित है। और स्वकीय अभिमानसे रसकी अत्यन्त दुर्लभता और चमत्कारिता नहीं है, ऐसा देखकर श्रीकृष्ण आत्मशक्तिको लाखों गोपीरूपोंमें पृथक् करके विलास करते हैं।

१७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत