श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपारकीया रति ही परमा रति है, ऐसा कहते हुए श्रीरूप गोस्वामीने आलङ्कारिक भरतमुनिके वाक्यको उद्धृत किया है (उःनीः १/२०)— “बहु वार्यते यतः खलु यत्र प्रच्छन्नकामुकत्वं च। या च मिथो दुर्लभता सा मन्मथस्य परमा रतिः॥” अर्थात् “जिस रतिमें समाजगत और धर्मगत बहुत प्रकारके निवारण अर्थात् बाधाएँ रहती हैं, जिस रतिमें परस्पर प्रच्छन्न कामुकता होती है तथा परस्परके दर्शन, स्पर्शन और सम्भाषणके विषयमें भी दुर्लभता रहती है, उसीको कामकी श्रेष्ठ और परम शोभामयी रति (रमणीय या क्रिया) समझना चाहिये।” (उःनीः १/२१)— “लघुत्वमत्र यत्प्रोक्तं तत्तु प्राकृतनायके। न कृष्णे रसनिर्यास्स्वादार्थमवतारिणि॥” अर्थात् “किन्तु इस उपपतिभावकी जो लघुता बतलायी गयी है, वह केवल प्राकृत नायकोंके सम्बन्धमें ही प्रयोज्य है, स्वराट् लीला-पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके सम्बन्धमें नहीं। क्योंकि वे स्वयं-अवतारी हैं और मधुररस आस्वादनके लिये ही उनका अवतार हुआ है।” ‘पर’ शब्दसे एकमात्र श्रीकृष्णको ही समझना चाहिये। श्रीकृष्ण सम्बन्धीय वस्तु ही ‘पारकीय’ है। और श्रीकृष्ण ही जिस स्थानपर एकमात्र नायक हैं, उस स्थानपर परकीयताको कभी भी घृणास्पद अथवा व्यभिचार कहकर ग्रहण नहीं किया जा सकता। सामान्य कोई जीव जब ‘नायक’ पदवीको प्राप्त होता है, तब विषयके बहुत्व होनेके कारण धर्म और अधर्मका विचार आता है। गोलोकविहारी श्रीकृष्णचन्द्र जब अपने पर-रसको प्रपञ्चमें गोकुलके साथ लेकर आते हैं, तब गोपियोंके सम्बन्धमें जड़ालङ्कारगत अक्षज-विचारका वहाँ कोई स्थान नहीं होता है। श्रीउज्ज्वलनीलमणि ग्रन्थ (३/३२)में श्रीलरूपगोस्वामीपादने लिखा है— “मायाकलिततादृक्स्त्रीशीलनेनानसूयुभिः । न जातु व्रजदेवीनां पतिभिः सह सङ्गमः॥” अर्थात् “प्रकटलीलामें व्रजगोपियोंके पतिका अभिमान रखनेवाले केवल उन-उन भावोंके माया अवतार मात्र हैं। गान्धर्व-विवाहादि मायिक धारणामात्र है। मायाकल्पित विवाहित पतिका अभिमान रखनेवालोंके साथ श्रीकृष्ण-स्वरूपशक्ति व्रजगोपियोंका कभी भी मिलन नहीं होता है। वस्तुतः एकमात्र शक्तिमान् विग्रहकी स्वरूपगत शक्ति गोपियोंका अन्यत्र स्वरूपतः विवाह नहीं हैं, उनका उपपतित्व अथवा परदारत्व नहीं है।” तथापि परोढ़त्व अभिमान नित्य वर्तमान है। ऐसा ना होनेपर अपूर्व रसोदयका प्राकट्य कभी भी स्वभावतः नहीं होता। रसज्ञ व्यक्ति ही इस बातको अनुभव कर सकते है। दूसरे लोगोंके पक्षमें आलोचना प्रसार निष्प्रयोजनीय है। चित्शक्ति योगमाया गोलोकस्थ नित्य-मूल-स्वरूप परोढ़ा-अभिमानको श्रीकृष्णकी नित्य-स्वरूपशक्तियों (गोपियों) के साथ-साथ व्रजमें लाकर उस-उस अभिमानको पृथक् सत्तारूपमें (पतिरूपमें) स्थित करती है। उनके साथ गोपियोंका विवाह सम्पादन कराके श्रीकृष्णको नश्वर विषय-भोक्ता पतिके स्थानपर नित्यपति निर्देश करके योगमाया श्रीकृष्णको उनके नित्य अनुरागका विषय कहती हैं। सर्वज्ञ पुरुष श्रीकृष्ण और उनकी
चौथा अध्याय | १७१