भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 214

[ ४/४६-५० सर्वज्ञा स्वरूपशक्तियाँ योगमायाके द्वारा अपने-अपने रसके आवेशमें उस-उस प्रत्ययको स्वीकार करते हैं; इससे रसका उत्कर्ष और स्वेच्छामय लीला-पुरुषोत्तमकी इच्छाशक्तिका परमोत्कर्ष लक्षित होता है। इस प्रकार उत्कर्ष वैकुण्ठ या द्वारकामें नहीं होता है। उज्ज्वलरसमें नायकचूड़ामणि श्रीकृष्ण ही विषयालम्बन अथवा नायक हैं। श्रीकृष्णके अतिरिक्त श्रीकृष्णके राम-नृसिंहादि अवतार अथवा नारायण उज्ज्वल रसके नायक नहीं हो सकते। श्रीकृष्णकी स्वरूपशक्ति गोपियाँ 'पर' अर्थात् परमपुरुष श्रीकृष्ण सम्बन्धी हैं। अद्वितीय भोक्ता श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कोई भी उनका भोक्ता नहीं हो सकता। योगमायाके प्रभावसे अभिमन्यु आदि मायाकल्पित अवतारगण उन सब गोपियोंमें अपनी विवाहिता पत्नीका अभिमान करते हैं। अभिमन्यु आदि कृष्णेतर-तत्त्वकी वञ्चना करना ही व्रजगोपियोंकी जड़-भोगरत कृष्णसेवाविमुख पतियोंकी वञ्चना है। इसलिये इस प्रकारके पतियोंकी वञ्चना करके एकमात्र पति श्रीकृष्णके सुखतात्पर्यका विधान करना ही व्रजगोपियोंकी पारकीयत्व अथवा श्रीकृष्ण-सम्बन्धमें नित्य अवस्थिति है। इसलिये गोलोकके पारकीय और स्वकीय रसका अचिन्त्य-भेदाभेद सम्बन्ध है। वहाँ पारकीय-सार जो स्वकीय-निवृत्ति है और जो स्वकीय-सार जो पारकीय-निवृत्तिरूप स्वरूपशक्ति-रमण है, दोनोंमें एक रस होकर दोनों वैचित्रताके आधाररूपमें विराजमान है। श्रीकृष्णमें धर्म-अधर्मशून्य पतित्व और उपपतित्व शुद्ध निर्मल रूपमें युगपत् अवस्थित है॥४६॥ इनमेंसे परकीय-भावका श्रीकृष्णप्रीतिका सर्वाधिक्य और केवलमात्र व्रजमें ही इसका अधिष्ठान :- परकीयभावे अति रसेर उल्लास। व्रज बिना इहार अन्यत्र नाहि वास॥४७॥ व्रजललनाओंमें पारकीय-भावका नित्यावस्थान और श्रीराधामें उसकी पराकाष्ठा :- व्रजवधूगणेर एइ भाव निरवधि। तार मध्ये श्रीराधार भावेर अवधि॥४८॥ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम सर्वोत्तम। कृष्णेर माधुर्य्यरस-आस्वाद-कारण॥४९॥ श्रीराधाका भाव अङ्गीकार करके श्रीगौररूपमें अपनी तीन वाञ्छाओंकी पूर्ति :- अतएव सेइ भाव अङ्गीकार करि' । साधिलेन निजवाञ्छा गौराङ्ग-श्रीहरि॥५०॥ अनुवाद-परकीया भावमें रसका अत्यन्त उल्लास होता है और व्रजके अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी इसका वास नहीं है। व्रजवधुओंमें यह भाव सब समय रहता है और उनमें श्रीराधामें इस भावकी चरमसीमा-मादनाख्या महाभाव तक है। उनका श्रीकृष्णैकसुख-तात्पर्यमय परिपक्व निर्मलभाव ही सर्वोत्तम प्रेम है और यही प्रेम श्रीकृष्णके द्वारा माधुर्यरसके आस्वादनका कारण है। इसलिये उसी भावको अङ्गीकार करके गौराङ्ग श्रीहरिने अपनी इच्छाएँ पूर्ण कीं॥४७-५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अन्य तीन रसोंसे शृङ्गार रसकी माधुरी अधिक होनेके कारण उसको 'मधुररस' कहा जाता है। वह मधुररस दो प्रकारका होता है-स्वकीय और पारकीय। श्रीकृष्णको १७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत