श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहित पति रूपमें ग्रहण करनेसे जो मधुररस उदित होता है, उसे स्वकीय-मधुररस कहते हैं। श्रीकृष्णको उपपति माननेसे जो मधुररस उदित होता है, उसे पारकीय-मधुररस कहा जाता है। मधुररस विचारकोंका यही एकमत है कि पारकीयभावमें मधुररसमें उल्लास अधिक है और व्रजके अतिरिक्त और यह भाव कहीं भी नहीं है। अनेक लोग ऐसा सोचते हैं कि श्रीकृष्ण तो गोलोकमें नित्य विहार करते हैं और उन्होंने केवल अल्प समयके लिये व्रजमें प्रकट होकर इस पारकीय-भावमें लीला की थी। हमारे पूर्व आचार्य गोस्वामियोंका यह मत नहीं है। उनके मतानुसार व्रजविहार भी नित्य है। नित्य चिन्मयधाम गोलोकके अति-अन्तरङ्ग प्रकोष्ठका नाम ही 'व्रज' है। जिस प्रकार प्रपञ्चावतारमें श्रीकृष्णकी लीलाएँ हुई हैं, नित्यधाम व्रजमें भी उसी प्रकार लीलाएँ नित्य विराजमान हैं। व्रजमें पारकीय रसका नित्य अवस्थान है। कविराज गोस्वामीने तीसरे अध्यायमें कहा है— “अष्टाविंश चतुर्युगे द्वापरेर शेषे। ब्रजेर सहिते हय कृष्णेर प्रकाशे॥” 'व्रजेर सहिते'- इस शब्दसे स्पष्ट रूपसे समझा जाता है कि चिन्मयधाममें 'व्रज' एक अचिन्त्य लीलीस्थली है, उसी लीलास्थलीके साथ श्रीकृष्ण अपनी चित्शक्तिबलसे प्रपञ्चमें अवतीर्ण हुए थे। गोलोकके अन्तःपुर उस नित्य व्रजके अतिरिक्त पारकीय रसकी अन्यत्र स्थिति नहीं है, क्योंकि वहाँपर गोलोककी अपेक्षा अनन्तगुणा श्रेष्ठ रसका अवस्थान है। प्रकटव्रजमें अप्रकटव्रजकी विचित्रता जीवकी आँखोंके समक्ष दिखलायी देती है, दोनोंमें यही मात्र अन्तर है। व्रजवधुओंके भावकी अवधि अर्थात् अन्तिम सीमा श्रीराधामें हैं। परिपक्व विमलभावरूप श्रीराधाका व्रजगत-प्रेम ही सर्वोत्तम है। श्रीकृष्णके माधुर्यरसका जहाँतक आस्वादन सम्भव है, उसकी प्राप्ति ही इस प्रेमका कारण है। इसलिये उस भावको अङ्गीकार करके गौराङ्ग-श्रीहरिने अपनी इच्छाएँ पूर्ण की॥४६-५०॥ स्तवमाला प्रथम चैतन्याष्टकमें (२)- सुरेशानां दुर्गं गतिरतिशयैनोपनिषदां मुनीनां सर्वस्वं प्रणतपटलीनां मधुरिमा। विनिर्यांसः प्रेम्णो निखिलपशुपालाम्बुजदृशां स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम्॥५१॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवताओंके लिये दुर्गम, उपनिषदोंके लिये कष्टगम्य, मुनियोंके सर्वस्व, शरणागत भक्तोंकी मधुरिमा, व्रजयुवतियोंके नयनोंके लिये प्रेमकी सार-वस्तु स्वरूप, वे चैतन्यचन्द्र क्या पुनः मेरे दृष्टिगोचर होंगे?॥५१॥ अनुभाष्य-सुरेशानां (महेन्द्रादीनां) दुर्गं (दुरधिगम्यः आश्रयः), उपनिषदं (वेदशिरोभागानाम्) अतिशयेन गतिः (लक्ष्यं), मुनीनां सर्वस्वं (जड़निर्विज्ञानां एकमात्रधनं), प्रणतपटलीनां (भक्तसमूहानां) मधुरिमा (सौन्दर्याश्रयः) निखिलपशुपालाम्बुजदृशां (समस्तव्रजवनितानां) प्रेम्णः विनिर्यांसः (सारः) स चैतन्यः पुनः अपि किं मे दृशोः पदं यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद-इन्द्रादि देवताओंके आश्रय, वेदोंके श्रेष्ठ भाग उपनिषदोंके प्रमुख लक्ष्य, जड़ासक्तिरहित मुनियोंका एकमात्र धन, भक्तोंके लिये सौन्दर्यके आश्रय और समस्त गोपियोंके प्रेमके सार, वे श्रीचैतन्यचन्द्र क्या पुनः मेरे दृष्टिपथपर प्राप्त होंगे ? ॥५१॥ चौथा अध्याय | १७३