श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४/५२-५४ स्तवमाला द्वितीय चैतन्याष्टकमें (३)— अपारं कस्यापि प्रणयिजनवृन्दस्य कुतुकी रसस्तोमं हृत्वा मधुरमुपभोक्तु रुचं स्वामावव्रे द्युतिमिह तदीयां प्रकटयन् स देवश्चैतन्याकृतिरतितरां नः कृपयतु॥५२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो कौतुकी श्रीकृष्ण अपने प्रेमीजनोंके रसोंको आस्वादन करते हुए अपार (असीम) किसी एक प्रकारके मधुररसविशेषको भोग करनेके उद्देश्यसे अपने वर्णको गोपन करके श्रीराधाकी द्युति स्वीकारकर चैतन्याकृतिमें प्रकट हुए हैं, वे मेरे ऊपर विशेष कृपा करें॥५२॥ अनुभाष्य—कुतुकी (भावास्वादानन्दः) यः कस्य अपि प्रणयिजनवृन्दस्य (निजप्रीतिविग्रहस्य) कमपि [अनिर्वचनीयम्] अपारं मधुरं रसस्तोमं हृत्वा उपभोक्तुं (स्वयं तद्भावग्रहणेन आस्वादयितुं) तदीयां (तत्प्रणयिजनसम्बन्धिनीं) द्युतिं (शोभां) प्रकटयन् (प्रकाशयन्) स्वां (स्वकीयां घनश्यामरूपां द्युतिं ) आवव्रे (आवृतवान्) सः चैतन्याकृतिर्देवः (गोपीजनवल्लभः) नः (अस्मान्) अतितरां कृपयतु। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५२॥ भावग्रहणेर हेतु करिल धर्म स्थापन। तार मुख्य हेतु कहि, शुन सर्वजन॥५३॥ मूल हेतु आगे श्लोकेर कैल आभास। एबे कहि सेइ श्लोकेर अर्थ प्रकाश॥५४॥ अनुवाद—भावग्रहण ही वह मुख्य कारण जिसके लिये भगवान्ने अवतार लिया और युगधर्मकी स्थापना की। सभी लोग सुनो! अब उस मुख्य कारणको विस्तारसे कहूँगा। मैंने पूर्व श्लोकमें महाप्रभुके अवतारके मूल कारणका केवल आभास दिया, अब उसी श्लोकका वास्तविक अर्थ प्रकाश कर रहा हूँ॥५३-५४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—[श्रीचैतन्य महाप्रभु] श्रीराधाका भावग्रहणके आशयसे धर्मस्थापनके कार्यमें प्रवृत्त हुए थे। उस कार्यका जो मुख्य प्रयोजन है, वह अब वर्णन कर रहा हूँ। मूल कारणको बतलानेके लिये श्लोकके आभासका अभी तक वर्णन किया है॥५३-५४॥ अनुभाष्य—इन चार पंक्तियोंके स्थानपर किसी-किसी संस्करणमें ये छह पंक्तियाँ दिखायी देती हैं— “भावग्रहणेर हेतु करिल धर्मस्थापन। मूलहेतु आगे श्लोकेर करिब विवरण॥ भावग्रहणेर एइ शुनह प्रकार। ताहा लागि पञ्चम श्लोकेर करिये विचार॥ एइ त' पञ्चम श्लोकेर कहिल आभास। एबे कहि सेइ श्लोकेर अर्थ परकाश॥”५३-५४॥ १७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत